RTI में सच्चाई उजागर: IIT-IIM में 7 हजार से ज्यादा पोस्ट खाली
देश के टॉप तकनीकी संस्थानों में 35% फैकल्टी गायब
आप जिस IIT या NIT को देश की शान कहते हैं, वहां हर तीन में से एक प्राध्यापक की कुर्सी खाली पड़ी है। सूचना के अधिकार (आरटीआई एक्ट) के तहत मांगे गए जवाब में यह सच्चाई सामने आई है।
79 केंद्रीय तकनीकी संस्थानों (CFTI) में स्वीकृत 20 हजार 279 शिक्षक पदों में से 7 हजार 132 पद खाली हैं। यह 35.2% है। यानी हर तीन में से एक प्राध्यापक की पोस्ट ही नहीं भरी।
समझें क्या है मामला
The Hindu ने शिक्षा मंत्रालय (MoE) से सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी है। इनमें 122 में से सिर्फ 79 संस्थानों ने जवाब दिया। इन 79 में 20 IIT, 19 NIT, 18 IIM, 17 IIIT और 5 IISER शामिल थे।
कुल 7 हजार 132 पद खाली निकले, 16 संस्थानों में 50% से ज्यादा पद खाली थे और 14 में 40% से ज्यादा। IIITs की स्थिति सबसे खराब रही। इसके अलावा 17 IIITs में 53.5% यानी 665 पद खाली मिले।
यह आपसे क्यों जुड़ा है?
अगर आपके घर में कोई JEE की तैयारी कर रहा है या आप खुद अभियांत्रिकी कर रहे हैं तो यह खबर सीधे आपसे जुड़ी है। जब प्राध्यापक कम होते हैं, तो एक-एक शिक्षक पर बोझ बढ़ता है। शोध कम होता है और मार्गदर्शन कम मिलता है।
साथ ही जो शुल्क आप लाखों में भरते हैं, उसके बदले में जो मिलना चाहिए, वो नहीं मिलता। यानी भले ही आपको ऊपर से लगे कि हमें सीधे तौर पर फर्क नहीं पड़ता, मगर फर्क बहुत ज्यादा पड़ता है।
पहले क्या था
यह कोई नई समस्या नहीं है। 2018 में भी सरकारी आंकड़ों में IITs में 2 हजार 612 और NITs में 3 हजार 552 पद खाली थे। तब कुल स्वीकृत पदों के मुकाबले रिक्तियां 50% तक पहुंच गई थीं। उस वक्त भी सरकार ने कहा था - भर्ती एक सतत प्रक्रिया है।
आज 2025 में भी जवाब वही है। फर्क बस इतना है- अब सूचना के अधिकार ने पूरा हिसाब सामने रख दिया है।
क्या हुआ और क्यों
सोचिए एक बार, IIT में एक सहायक प्राध्यापक की शुरुआती वेतन लगभग 98 हजार 200 रुपए है। ऊपर से महंगाई भत्ता, मकान किराया भत्ता, यात्रा भत्ता सब मिलाकर कुल वेतन करीब 1.5 से 1.8 लाख रुपए बनती है। यह सुनने में अच्छी लगती है।
लेकिन वही उम्मीदवार अगर किसी निजी तकनीकी कंपनी में जाए Google, Microsoft, या किसी नए उद्यम में तो पहले साल में ही 25 से 40 लाख का पैकेज मिल सकता है। शोध उपाधि लेकर IIT जॉइन करना और उद्योग में जाना, दोनों में आसमान-जमीन का फर्क है।
यहीं से असली समस्या शुरू होती है।
हर साल IIT स्नातकों का लगभग एक तिहाई हिस्सा देश छोड़ देता है। शीर्ष 100 वरीयता प्राप्त छात्रों में से 62% विदेश चले जाते हैं। जो शोध उपाधि लेते हैं, उनमें से भी बड़ा हिस्सा या तो विदेश में शोध-अध्येतावृत्ति के लिए जाता है या उद्योग में। वापस IIT में शिक्षक बनने का रास्ता बहुत कम लोग चुनते हैं।
अब आते हैं असली सवाल पर नए IIT और NIT पिछले 15 साल में बहुत बढ़े हैं। साल 2008 में 7 IIT थे, अब 23 हैं। सीटें बढ़ीं, विद्यार्थी बढ़े, लेकिन शिक्षक उसी रफ्तार से नहीं बढ़े। नतीजा? पुराने और नए दोनों तरह के संस्थान एक साथ शिक्षक की कमी से जूझ रहे हैं।
IIMs की स्थिति भी अलग नहीं है। 18 IIMs में 32.3% पद खाली निकले। IIM मुंबई में 130 में से 77 पद भरे ही नहीं थे यानी 59% रिक्तियां।
सीधे तौर पर किसकी जिम्मेदारी है?
शिक्षा मंत्रालय (ministry of education) नीति बनाता है और बजट देता है। IIT/NIT की शासी परिषदें भर्ती करती हैं, लेकिन प्रक्रिया लंबी और नौकरशाही वाली है। शोध छात्रों और युवा अनुसंधानकर्ताओं के पास बेहतर विकल्प हैं, तो वे शिक्षा जगत को आखिरी विकल्प मानते हैं। विद्यार्थी सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। लेकिन उनकी आवाज सबसे कम सुनी जाती है।
संसदीय स्थायी समिति ने अपनी 2025-26 की रिपोर्ट में कहा कि सभी भर्ती प्रक्रियाएं पारदर्शी, योग्यता-आधारित और भेदभाव-रहित होनी चाहिए, लेकिन यह सिफारिश कागज पर है।
अब दोनों पक्षों की बात
सरकार का पक्ष यह है कि शिक्षक भर्ती एक गतिशील प्रक्रिया है। सेवानिवृत्ति, इस्तीफे और बढ़ती छात्र संख्या के साथ रिक्तियां स्वाभाविक रूप से बनती रहती हैं। शिक्षा मंत्रालय के संसद में दिए जवाब के मुताबिक, NIT और IIT में शिक्षक-छात्र अनुपात क्रमशः 1:12 और 1:10 तय है, और यह अनुपात गतिशील समीक्षा के अधीन है। संस्थान अतिथि, सहायक और संविदा शिक्षकों से काम चला रहे हैं।
दूसरी तरफ आलोचकों का तर्क है कि प्रक्रिया चल रही है कहना काफी नहीं है। जब 16 संस्थानों में आधे से ज्यादा पद खाली हों, तो यह व्यवस्थागत विफलता है। संविदा शिक्षक स्थायी शिक्षक का विकल्प नहीं हो सकते। वे न शोध मार्गदर्शन दे सकते हैं, न दीर्घकालिक परामर्श।
अब बात मध्य प्रदेश के हालात की
मध्य प्रदेश में आईआईटी इंदौर और MANIT (मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान) भोपाल समेत IIIT भोपाल जैसे संस्थान हैं। सूचना के अधिकार में इन संस्थानों के संस्थानवार विवरण की जानकारी अभी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। लेकिन राष्ट्रीय औसत देखें तो मध्य प्रदेश के इन संस्थानों में भी शिक्षकों की कमी का स्वरूप अलग नहीं होगा।
IIIT भोपाल तो अभी भी चलती विज्ञप्ति पर शिक्षक भर्ती कर रहा है, स्थायी नियुक्ति की जगह संविदा आधार पर।
तो आगे क्या होगा
अल्पकाल में कुछ खास बदलाव की उम्मीद नहीं है। अतिथि और सहायक शिक्षकों से काम चलता रहेगा। दीर्घकाल में असर यह होगा कि शोध उत्पादन कमजोर होगा, अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में गिरावट आएगी और जो विद्यार्थी लाखों की फीस देकर IIT का ब्रांड खरीद रहे हैं, उन्हें वो मूल्य नहीं मिलेगा जिसकी उम्मीद है।
संसदीय समिति की सिफारिश लागू हो, भर्ती प्रक्रिया छोटी हो, और शैक्षणिक वेतन को उद्योग के करीब लाने की कोशिश हो, तभी कुछ बदल सकता है।
एक बात जो आप नहीं जानते थे
ज्यादातर लोग सोचते हैं कि IIT में शिक्षक बनना प्रतिष्ठित है। इसलिए लोग कतार में खड़े होंगे। लेकिन एक अनुमान के मुताबिक लगभग 67% योग्य प्राध्यापक भारत में पढ़ाने की बजाय विदेश की नौकरी को प्राथमिकता देते हैं।
यानी समस्या आपूर्ति की नहीं, प्रोत्साहन की है। जब तक अध्यापन का पेशा आर्थिक और व्यावसायिक रूप से उद्योग के बराबर नहीं होगा कुर्सियां खाली रहेंगी।
तो अब आप क्या करें
अगर आप या आपका बच्चा किसी केंद्रीय तकनीकी संस्थान में पढ़ता है, तो अपने महाविद्यालय के शिक्षक-छात्र अनुपात की जानकारी सूचना के अधिकार से मांगें। क्योंकि हाल ही में संसद में यह मुद्दा उठ चुका है। जनदबाव असर करता है।
यह खबर क्यों जरूरी है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21A शिक्षा को मौलिक अधिकार मानता है। जब केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित संस्थानों में 35% से ज्यादा faculty पद खाली रहते हैं, तो यह सीधे तौर पर उस अधिकार को कमजोर करता है।
यह सिर्फ administrative failure नहीं है, एक नैतिक सवाल भी है। जो परिवार लाखों रुपए और बरसों की मेहनत लगाकर IIT-NIT भेजते हैं, वे पूरी शिक्षा के हकदार हैं। RTI से यह जानकारी सामने आना लोकतंत्र की ताकत है।
FAQ
- IIT और NIT में फैकल्टी की कितनी कमी है?
RTI डेटा के मुताबिक 79 केंद्रीय तकनीकी संस्थानों में 20,279 स्वीकृत पदों में से 7,132 खाली हैं। यह करीब 35% है। 16 संस्थानों में 50% से ज्यादा पद रिक्त हैं। - IIT, IIM में फैकल्टी पद क्यों नहीं भरे जाते?
इसके मुख्य कारण हैं- industry की तुलना में कम वेतन, PhD graduates का विदेश जाना, और लंबी bureaucratic भर्ती प्रक्रिया। नए IIT-NIT की तेज expansion के बाद faculty supply उसी रफ्तार से नहीं बढ़ी।
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