वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब रिपोर्ट: देश की 44 प्रतिशत जमीन पर सिर्फ 10 प्रतिशत लोगों का कब्जा

Rajesh Lahoti | Apr 10, 2026, 17:13 IST
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वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब की नई रिपोर्ट के मुताबिक भारत के ग्रामीण इलाकों में टॉप 10 प्रतिशत परिवारों के पास 44 प्रतिशत जमीन है। वहीं 46 प्रतिशत ग्रामीण परिवार पूरी तरह भूमिहीन हैं। बिहार और पंजाब में जमीन की असमानता सबसे ज्यादा है।

वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब ने भारत की जमीन असमानता पर नई रिपोर्ट जारी की है। ग्रामीण भारत में टॉप 10 प्रतिशत परिवारों के पास कुल जमीन का 44 प्रतिशत हिस्सा है। करीब 46 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के पास खुद की कोई जमीन नहीं है। बिहार और पंजाब में भूमि असमानता सबसे गंभीर स्तर पर है। यह रिसर्च 2011 की जाति-आर्थिक जनगणना के डेटा पर आधारित है।



जमीन की असमानता का सच

पेरिस स्थित वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब ने हाल ही में एक वर्किंग पेपर जारी किया है। इसे अर्थशास्त्रियों नितिन कुमार भारती, डेविड ब्लेकस्ली और समरीन मलिक ने मिलकर लिखा है। रिपोर्ट के नतीजे भारत की ग्रामीण जमीन व्यवस्था की एक चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं।



रिपोर्ट (Land inequality Report) के अनुसार टॉप 10 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के पास कुल जमीन का 44 प्रतिशत है। टॉप 5 प्रतिशत परिवारों के पास 32 प्रतिशत जमीन है। और सिर्फ टॉप 1 प्रतिशत परिवारों के कब्जे में 18 प्रतिशत जमीन है। इसके उलट करीब 46 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के पास जमीन का एक टुकड़ा भी नहीं है।



किस राज्य में कितनी असमानता?

राज्यवार आंकड़े और भी दिलचस्प हैं। उत्तर प्रदेश में सबसे बड़े जमींदार के पास औसतन गांव की 7.3 प्रतिशत जमीन है। वहीं बिहार में यह आंकड़ा 20.1 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। यानी बिहार में एक ही परिवार गांव की पांचवीं जमीन का मालिक हो सकता है।



भूमिहीनता के मामले में पंजाब सबसे ऊपर है। वहां 73 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के पास कोई जमीन नहीं है। खेती पर ज्यादा निर्भर राज्यों में मध्य प्रदेश में 51 प्रतिशत और बिहार में 59 प्रतिशत परिवार भूमिहीन हैं। राजस्थान (34 प्रतिशत) और उत्तर प्रदेश (39 प्रतिशत) में यह स्थिति थोड़ी बेहतर है।



जिनी गुणांक एक ऐसा पैमाना है जो असमानता नापता है। इसमें 100 का अंक सबसे ज्यादा असमानता दर्शाता है। इस पैमाने पर केरल का जिनी गुणांक 90 है, जो सर्वाधिक है। बिहार, पंजाब, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल लगभग 80 के करीब हैं। कर्नाटक और राजस्थान में यह 65 से कम है।



डेटा कहां से आया

रिपोर्ट के लिए 2011 की सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना का इस्तेमाल किया गया। इस सर्वे में देश के 10 बड़े राज्यों के करीब 2 लाख 70 हजार गांवों और 65 करोड़ लोगों का डेटा शामिल था। इन राज्यों में पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल शामिल हैं। ये राज्य मिलकर देश की 75 प्रतिशत ग्रामीण आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं।



भूमि असमानता के कारण

रिपोर्ट यह भी बताती है कि जमीन की असमानता सिर्फ आर्थिक नहीं, ऐतिहासिक और सामाजिक भी है। जिन गांवों में खेती के लिए जमीन ज्यादा उपजाऊ है, वहां जमीन की असमानता भी ज्यादा है। इसके अलावा जहां अनुसूचित जाति की आबादी ज्यादा है, वहां भूमिहीनता भी ज्यादा है। बाजार तक पहुंच की बात करें, तो जो गांव शहरों, बड़े हाईवे और रेलवे स्टेशनों के करीब हैं, वहां भी जमीन असमानता ज्यादा है। बैंक या कृषि मंडी वाले गांवों में भी असमानता अधिक देखी गई है।



इतिहास का असर आज भी

रिपोर्ट का एक और अहम पहलू है और वह है ऐतिहासिक जमींदारी प्रथा का असर। जिन इलाकों में अंग्रेजों के समय जमींदारी व्यवस्था थी, वहां आज भी जमीन असमानता 3-4 प्रतिशत ज्यादा है। इसके उलट जो इलाके देसी रियासतों के अधीन थे, वहां जमीन असमानता अपेक्षाकृत 2-3 प्रतिशत कम है। इसका कारण भी रिपोर्ट में बताया गया है।



जमींदारी इलाकों में छोटे किसानों की संख्या घट गई और बड़े जमींदारों का दबदबा बढ़ा। रियासतों में यह असंतुलन उतना तीव्र नहीं था। कुल मिलाकर कृषि उपयुक्तता, बाजार तक पहुंच और ऐतिहासिक ढांचे मिलकर जमीन असमानता में 18.3 प्रतिशत भिन्नता की व्याख्या करते हैं।



गांव की जमीन पर किसका कब्जा

एक आंकड़ा और है जो सोचने पर मजबूर करता है। औसतन एक गांव में सबसे बड़े जमींदार के पास 12.4 प्रतिशत जमीन होती है। और करीब 3.8 प्रतिशत गांवों में तो एक ही व्यक्ति गांव की आधी से ज्यादा जमीन का मालिक है।



जिन किसानों के पास जमीन है, उनकी औसत जोत 6.2 हेक्टेयर है। लेकिन सिर्फ 0-1 हेक्टेयर वाले परिवारों के पास 28.9 प्रतिशत जमीन है और 1-2 हेक्टेयर वालों के पास 48.6 प्रतिशत जमीन है। यह दिखाता है कि बड़ा हिस्सा छोटे किसानों में बंटा है, पर असली ताकत बड़े जमींदारों के हाथ में है।



यह खबर क्यों जरूरी है

यह रिपोर्ट भारत की उस असमानता की तरफ ध्यान खींचती है जो सीधे संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) से जुड़ी है। जब आधे से ज्यादा परिवारों के पास जमीन नहीं है, तो उनकी आजीविका, सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक सुरक्षा खतरे में रहती है।



यह डेटा नीति-निर्माताओं के लिए एक सीधा संकेत है कि भूमि सुधार अभी भी अधूरे हैं। अनुसूचित जाति और भूमिहीन समुदायों पर असमानता का बोझ सबसे भारी है। यह सामाजिक न्याय, डिजिटल समावेश और कृषि नीति तीनों के लिहाज से जरूरी बहस है। यह रिपोर्ट ऐसे वक्त आई है जब कृषि और किसान आंदोलन देश की राजनीति के केंद्र में हैं।



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