3682 बाघ, 58 रिजर्व...फिर क्यों खतरे में हैं टाइगर, जानिए अंदर की कहानी
New Delhi: केंद्र सरकार ने देश के उन टाइगर रिजर्व की किस्मत बदलने का बड़ा प्लान तैयार किया है, जो इस समय संकट से जूझ रहे हैं।
राजस्थान के सरिस्का टाइगर रिजर्व में हाल ही में हुए सम्मेलन में सरकार ने दो नए आकलन जारी किए। पहला आकलन भविष्य में बाघों के प्रबंधन का रोडमैप है और दूसरा भारत में की गई 12 पुनर्वास पहलों से सीखे गए सबक को दर्शाता है।
यह सम्मेलन बाघों के पुनर्वास की 18वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया था। इसमें देश और विदेश के वन्यजीव विशेषज्ञ शामिल हुए।
बाघों के विस्थापन में मिलेगी मदद
यह तर्क दिया है कि केवल बाघों की कुल संख्या गिनने के बजाय मुख्य ध्यान उन राष्ट्रीय उद्यानों और रिजर्वों पर होना चाहिए, जहां बाघों की संख्या कम है।
बाघों की आबादी बेहतर बनाने में मदद करने के लिए खराब आवास और शिकार की कमी वाले पार्कों को भी इस योजना में शामिल किया गया है।
केंद्र का कहना है कि इससे उन जगहों से बाघों को नए आवासों में भेजने में भी मदद मिलेगी, जहां बाघों की संख्या उनकी अधिकतम क्षमता तक पहुंच चुकी है।
संख्या तो बढ़ी, लेकिन कुछ ही जगहों पर
अगर हम आंकड़े देखें तो भारत में बाघों की संख्या में लगातार सुधार हुआ है। साल 2006 में देश में सिर्फ 1,411 बाघ बचे थे, जो 2022 की रिपोर्ट में बढ़कर 3,682 हो गए।
ये बाघ देश के कुल 58 टाइगर रिजर्वों में रह रहे हैं। इनका क्षेत्रफल लगभग 85,000 वर्ग किलोमीटर है।
इस कामयाबी के पीछे एक कड़वा सच भी है, जिसे समझना जरूरी है:
वीआईपी जंगल: देश के कुल 58 रिजर्वों में से केवल 10 से 12 रिजर्व ऐसे हैं, जहाँ देश के 36% बाघ रहते हैं। यानी कुछ चुनिंदा जंगलों में बाघों की भरमार है।
खाली होते जंगल: इसके उलट, 12 टाइगर रिजर्व ऐसे हैं जहाँ बाघों की संख्या नाममात्र की (3 से भी कम) रह गई है। इनमें से तीन रिजर्व तो ऐसे हैं - कवल (तेलंगाना), कमलांग (अरुणाचल प्रदेश) और डम्पा (मिजोरम) - जहां बाघों की संख्या शून्य (0) हो चुकी है।
बाघों के सामने खड़ी दोहरी मुसीबत
इस असंतुलन की वजह से दो तरह की बड़ी समस्याएं खड़ी हो रही हैं। जिन जंगलों में बाघ बहुत ज्यादा हो गए हैं, वहां से निकलकर बाघ बफर जोन (जंगल के बाहरी हिस्सों) और इंसानी बस्तियों की तरफ भाग रहे हैं।
इसकी वजह से इंसान और बाघों के बीच टकराव बढ़ रहा है। बाघ गांवों के पालतू मवेशियों का शिकार कर रहे हैं। साथ ही, हाईवे, रेलवे लाइन और नहरों को पार करते वक्त हादसों में उनकी जान जा रही है, और शिकारियों का खतरा भी बढ़ गया है।
दूसरी तरफ कुछ जंगल ऐसे हैं, जहां पेड़-पौधे तो अच्छे हैं, लेकिन वहां बाघों के खाने के लिए छोटे जानवर ही नहीं बचे हैं। बिना भोजन के वहाँ बाघ सर्वाइव नहीं कर पा रहे हैं।
कामयाबी और नाकामी का मिला-जुला रिकॉर्ड
सरिस्का (राजस्थान): इस रिजर्व ने एक समय अपने सारे बाघ खो दिए थे। साल 2008 में यहां देश का पहला बाघ पुनर्वास शुरू हुआ, जो कामयाब रहा। इसके बाद 2009 में मध्य प्रदेश के पन्ना में भी ऐसा ही किया गया। तब से 10 और रिजर्व में बाघ भेजे गए हैं।
सतकोसिया (ओडिशा): यहां सरकार का प्लान फेल हो गया क्योंकि स्थानीय गांवों के लोगों ने इसका विरोध किया था।
मुकुंदरा हिल्स (राजस्थान): यहां बाघों को बसाने का काम बहुत ही कछुआ गति से और ढीला-ढाला चल रहा है।
सोर्स से सिंक तक का सफर
एक्सपर्ट्स का कहना है कि संरक्षण के लिए इस गैप को भरना जरूरी है। इसके लिए सरकार ने दो कैटगरी बनाई है:
सोर्स (Source): कॉर्बेट, बांदीपुर और काजीरंगा जैसे 13 बेहतरीन टाइगर रिजर्व हैं, जहां भरपूर शिकार, अच्छा जंगल और मजबूत बाघों की आबादी है। इन्हें और ज्यादा मजबूत किया जाएगा।
सिंक (Sink): ऐसे जंगल जो अलग-थलग पड़ चुके हैं, जहां नए बाघ पैदा नहीं हो पा रहे हैं।
सरकार ने ऐसे 25 कमजोर रिजर्व की पहचान की है, जहां तुरंत मदद की जरूरत है। इनमें वो रिजर्व भी शामिल हैं जहां 5 से कम बाघ बचे हैं। यहां बाहर से नए बाघ लाकर आबादी को दोबारा जिंदा किया जा सके।
इसलिए जंगलों को आपस में जोड़ना जरूरी?
देश में बाघों की आबादी हर साल 6% की रफ्तार से बढ़ रही है। लेकिन इस ग्रोथ का फायदा तभी होगा, जब बाघ सुरक्षित रहें।
आजकल शहर, सड़कें और मानवीय दखल बढ़ने से जंगल छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट गए हैं। इस वजह से बाघ एक जंगल से दूसरे जंगल आसानी से नहीं जा पाते।
आकलन रिपोर्ट में यह भी कहा है कि अगर भविष्य में बाघों को बचाना है तो हमें जंगलों के बीच कॉरिडोर बनाने होंगे ताकि अलग-अलग रिजर्व आपस में जुड़े रहें। इससे बाघों के बीच जेनेटिक एक्सचेंज होगा और वे बीमारियों या विलुप्त होने के खतरे से बच सकेंगे।
बाघों का भविष्य तीन चीज़ों के सही तालमेल पर टिका है। इसमें जंगल में पर्याप्त शिकार होना, रहने लायक उत्तम माहौल होना और बाघों का खुद नए और सुरक्षित जंगलों में जाकर अपनी नई दुनिया बसाना शामिल है।
FAQ
- बाघों के लिए कॉरिडोर क्यों जरूरी हैं?
शहरों और सड़कों के विकास के कारण जंगल छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट गए हैं। इससे बाघ एक से दूसरे जंगल में नहीं जा पाते। ऐसे में कॉरिडोर बनाने से अलग-अलग रिजर्व आपस में जुड़ जाएंगे। इससे बाघ नए जंगलों में सुरक्षित जा सकेंगे। इससे उनके बीच जेनेटिक एक्सचेंज होगा। वे बीमारियों या विलुप्त होने के खतरे से सुरक्षित रहेंगे। - क्या देश में बाघों की संख्या सभी जंगलों में बढ़ रही है?
कड़वा सच यह है कि देश में बाघों की आबादी का संतुलन बहुत खराब है। भारत के 36% बाघ सिर्फ 10 से 12 टाइगर रिजर्व में सिमटे हुए हैं। देश में 12 टाइगर रिजर्व ऐसे हैं, जहाँ बाघों की संख्या 3 से भी कम बची है। कवल, कमलांग और डम्पा में संख्या शून्य है। जहां बाघ ज्यादा हैं, वहां से इंसानी बस्तियों की तरफ भाग रहे हैं।
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