पुजारी, महंत या सरकार? जानिए किसके हाथ में होती है मंदिर की तिजोरी की चाबी

Jinesh Jain | Jul 02, 2026, 17:44 IST
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किसके हाथ में है मंदिरों की तिजोरी की चाबी?
किसके हाथ में है मंदिरों की तिजोरी की चाबी?

देश में मंदिरों के मैनेजमेंट को लेकर इन दिनों बहस छिड़ी है। देश में अभी मंदिरों के प्रबंधन की क्या व्यवस्था है? इसमें सरकार की भूमिका क्या रहती है? आइए यहां समझते हैं इस पूरे मामले को:

News Delhi: अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में दान के पैसों की हेराफेरी के आरोप लगे हैं। इस वजह से मंदिरों के मैनेजमेंट को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है।

सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद 5 फरवरी 2020 को केंद्र सरकार ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट बनाया था। इस ट्रस्ट को अब तक केवल कैश (नकद) में ही करीब 3,500 करोड़ रुपए का दान मिल चुका है।

मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने सलाह दी है कि ट्रस्ट का काम संभालने के लिए सीईओ (मुख्य कार्यकारी अधिकारी) नियुक्त किया जाए। दूसरी तरफ विश्व हिंदू परिषद (VHP) की मांग है कि देश के सभी मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया जाए।

​मंदिर और उनकी अकूत संपत्ति

​देश में हिंदू मंदिरों का कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है। एक अनुमान के मुताबिक देश में करीब 10 लाख मंदिर हैं।

​छोटे मंदिर: इनमें से ज्यादातर गांवों में छोटे या सामान्य मंदिर हैं। इन्हें स्थानीय लोग, परिवार या पुजारी संभालते हैं। दान का पैसा भी वही रखते हैं।

​बड़े मंदिर: कई बड़े मंदिरों के पास भारी संपत्ति है। उनके पास जमीन, आलीशान इमारतें और सोने-चांदी के गहने हैं। श्रद्धालुओं से उन्हें करोड़ों का दान मिलता है।

​प्रमुख क्षेत्र: अयोध्या, वाराणसी (काशी), हरिद्वार और दक्षिण भारत के शहरों में ऐसे अमीर मंदिरों की संख्या बहुत ज्यादा है।

​अक्सर चैरिटेबल ट्रस्ट इन मंदिरों को चलाते हैं। नियमों के मुताबिक रजिस्टर्ड ट्रस्ट को दिए गए दान पर टैक्स में छूट मिलती है। लेकिन कैश या सामान के रूप में मिलने वाला बड़ा दान अक्सर रिकॉर्ड में नहीं आ पाता।

kashi vishvnath temple
kashi vishvnath temple

​मंदिर मैनेजमेंट के 3 पारंपरिक तरीके

​देश में मंदिरों को संभालने के तीन मुख्य तरीके हैं। इनमें सरकार का दखल अलग-अलग स्तर पर होता है:

​1. पारिवारिक मैनेजमेंट (पंडा और पुजारी परिवार)

ज्यादातर मंदिरों को सदियों से खास पुजारी परिवार या उनके वंशज संभालते हैं। इन्हें पंडा या पुजारी कहा जाता है। मंदिर का चढ़ावा, दान और पूजा-पाठ की जिम्मेदारी इसी परिवार की होती है।
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रोटेशन व्यवस्था: जहां कई परिवार होते हैं, वहां बारी-बारी से जिम्मेदारी संभाली जाती है। यह बारी घंटों, दिनों या महीनों की हो सकती है।

​उदाहरण: कर्नाटक का उडुपी श्री कृष्ण मठ। इसे आठ मठ (अष्ट मठ) मिलकर चलाते हैं। हर मठ दो साल के लिए जिम्मेदारी संभालता है। इस तरह एक मठ का नंबर 16 साल बाद आता है।

Sabarimala temple
Sabarimala temple

​2. महंत व्यवस्था

इसमें पूरी ताकत एक मुख्य आध्यात्मिक गुरु के पास होती है। उन्हें महंत, मठाधीश या पीठाधीश्वर कहा जाता है। वही मंदिर की संपत्ति, दान और कामकाज के फैसले लेते हैं। महंत ही अपने उत्तराधिकारी को चुनते हैं।
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उदाहरण: गोरखपुर का प्रसिद्ध गोरखनाथ मठ। इसके मौजूदा मुखिया उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं। उन्हें दिवंगत महंत अवैद्यनाथ ने अपना उत्तराधिकारी चुना था। आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित शंकराचार्य मठों में भी यही व्यवस्था चलती है।

​3. अखाड़ा (पंचायती) व्यवस्था

​अखाड़े साधु-संतों के स्वतंत्र संगठन होते हैं। महाकुंभ के दौरान शाही स्नान को लेकर ये हमेशा चर्चा में रहते हैं। ये अखाड़े एक पंचायत की तरह काम करते हैं। इनके मुखिया आम सहमति या चुनाव से चुने जाते हैं।

आज देश में 13 मुख्य अखाड़े हैं। इन्हें तीन हिस्सों में बांटा गया है। 7 शैव (दशनामी), 3 वैष्णव (बैरागी) और 3 उदासीन अखाड़े।

​ये अखाड़े कई मंदिरों और आश्रमों को संभालते हैं। ये पुजारियों को नियुक्त करते हैं और दान-संपत्ति का हिसाब रखते हैं।

​मंदिरों के प्रबंधन में सरकार की भूमिका

मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण की शुरुआत अंग्रेजों के जमाने में हुई थी। अंग्रेजों ने 1863 में धार्मिक बंदोबस्त अधिनियम (Religious Endowments Act) बनाया था। इसके बाद 1925 में मद्रास हिंदू धार्मिक बंदोबस्त अधिनियम आया।

इसने सरकार को मंदिरों के मैनेजमेंट को अपने हाथ में लेने की ताकत दे दी। आजादी के बाद राज्यों ने इसी कानून को आधार बनाकर अपने-अपने नियम बनाए।

​संवैधानिक आधार: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25(2) सरकार को यह अधिकार देता है। इसके तहत सरकार धर्म से जुड़ी आर्थिक, वित्तीय या राजनीतिक गतिविधियों को कानून बनाकर नियंत्रित कर सकती है।

​अन्य धर्मों की स्थिति: इसके उलट मुस्लिम और ईसाई समुदाय अपने धार्मिक स्थलों को अपने कम्युनिटी बोर्ड या ट्रस्ट (जैसे वक्फ बोर्ड या चर्च संस्थाएं) के जरिए खुद संभालते हैं।

​सरकारी बोर्ड मंदिरों के पुजारियों को सैलरी देते हैं। वे दान के पैसे को बैंक खातों में जमा कराते हैं। बड़े मंदिरों की कमाई का एक हिस्सा उनके रखरखाव और गैर-धार्मिक कल्याणकारी कामों (जैसे स्कूल, अस्पताल) में भी खर्च होता है।


सरकारी नियंत्रण के कुछ बड़े उदाहरण

​तमिलनाडु: यहां का हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्त विभाग अकेले 40,000 से ज्यादा मंदिरों को संभालता है।

​आंध्र प्रदेश: यहां तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (TTD) एक स्वतंत्र ट्रस्ट है। यह प्रसिद्ध वेंकटेश्वर मंदिर को संभालता है। इसके बोर्ड और सीईओ की नियुक्ति सरकार ही करती है।
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केरल: यहां त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड सबरीमाला सहित एक हजार से ज्यादा मंदिरों का कामकाज देखता है।

​उत्तर प्रदेश: जनवरी 1983 में काशी विश्वनाथ मंदिर से सोने का अर्घ चोरी हो गया था। इसके बाद सरकार ने काशी विश्वनाथ मंदिर अधिनियम बनाया। अब एक सरकारी ट्रस्ट और CEO इसे संभालते हैं।

​जम्मू-कश्मीर: यहां की प्रसिद्ध वैष्णो देवी यात्रा और मंदिर का मैनेजमेंट सरकार द्वारा गठित श्राइन बोर्ड करता है।

राजस्थान: यहां का देवस्थान विभाग अकेले 48,466 मंदिरों को संभालता है। इनमें प्रबंधन के लिए सालाना सहायता भी दी जाती है।

FAQ

  1. क्या सरकार मंदिरों को नियंत्रित कर सकती है?
    हां, संविधान का अनुच्छेद 25(2) सरकार को यह अधिकार देता है कि वह धर्म से जुड़ी आर्थिक, वित्तीय या राजनीतिक गतिविधियों को कानून बनाकर नियंत्रित कर सकती है।

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