कैसे भारतीयों के डेटा, पैसों और मजबूरियों पर खड़ा हुआ वीजा सेंटर का अरबों का खेल, जानिए पूरा मामला
यूरोप घूमना अब भारतीय मध्यम वर्ग का नया सपना बन चुका है। कोई हनीमून के लिए पेरिस जाना चाहता है, कोई इटली की गलियों में घूमना चाहता है, तो कोई स्पेन और स्विट्जरलैंड की खूबसूरती देखने का सपना लेकर महीनों पहले से तैयारी करता है।
लेकिन इस सपने की शुरुआत एयरपोर्ट से नहीं, बल्कि एक ऐसे कमरे से होती है, जहां लोग हाथ में फाइलें लेकर घंटों अपनी बारी का इंतजार करते हैं। यह जगह होती है वीजा सेंटर।
भारत में यूरोप जाने वाले ज्यादातर लोगों के लिए यह दरवाजा वीएफएस ग्लोबल नाम की कंपनी के जरिए खुलता है। वही कंपनी जो शेंगेन वीजा प्रक्रिया संभालती है। लेकिन अब इसी कंपनी को लेकर यूरोप की कई एजेंसियों और दूतावासों की रिपोर्ट्स ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
'इंडियन एक्सप्रेस' में विभिन्न ऑडिट रिपोर्ट्स के आधार पर छपी रिपोर्ट के अनुसार वीएफएस ग्लोबल (VFS Global) के कामकाज में भारी खामियां पाई गई हैं, जो गंभीर सवाल खड़े करती हैं।
आरोप केवल तकनीकी गड़बड़ियों के नहीं हैं, बल्कि लोगों के निजी डेटा, फर्जी अपॉइंटमेंट, संदिग्ध अतिरिक्त शुल्क और एजेंटों के नेटवर्क तक पहुंचते हैं।
यूरोप जाने वालों की रिकॉर्ड भीड़
पिछले कुछ साल में भारतीयों के बीच यूरोप यात्रा का क्रेज तेजी से बढ़ा है। महामारी के बाद विदेश यात्राओं में जबरदस्त उछाल आया। यूरोपियन देशों के लिए शेंगेन वीजा आवेदन करने वालों की संख्या लगातार बढ़ती गई।
आंकड़ों के मुताबिक हर साल 10 लाख से अधिक भारतीय शेंगेन वीजा (Schengen Visa) के लिए लंबी कतारों में खड़े होते हैं।
यह एक ऐसा वीजा है, जो यूरोप के 27 देशों में निर्बाध प्रवेश का रास्ता खोलता है। पिछले पांच साल में यह संख्या दोगुनी से भी अधिक हो गई है।
इसका मुख्य कारण भारतीयों की बढ़ती आय, यात्रा का बढ़ता शौक और नई पीढ़ी के पर्यटकों द्वारा यूरोप के अनछुए और सुदूर कोनों को एक्सप्लोर करने की चाहत है।
इस विशाल और आकर्षक बाजार के केंद्र में एक ही नाम सबसे ऊपर आता है-वीएफएस ग्लोबल (VFS Global)। ज्यूरिख और दुबई में मुख्यालय वाली यह दिग्गज आउटसोर्सिंग कंपनी भारत और यूरोप के बीच प्रवेश द्वार (Gateway) के रूप में कार्य करती है।
भारत से यूरोप जाने वाले लगभग सभी वीजा आवेदनों की स्क्रीनिंग, बायोमेट्रिक संग्रह और दस्तावेजीकरण का जिम्मा इसी कंपनी के पास है।
लेकिन जैसे-जैसे आवेदन बढ़े, वैसे-वैसे शिकायतें भी बढ़ने लगीं। लोगों ने कहना शुरू किया कि अपॉइंटमेंट मिलना मुश्किल हो गया है।
वेबसाइट पर स्लॉट नहीं दिखते, लेकिन एजेंट पैसे लेकर तुरंत स्लॉट दिला देते हैं। कई लोगों ने अतिरिक्त सेवाओं के नाम पर भारी रकम वसूले जाने की शिकायत भी की।
पहले यह बातें केवल सोशल मीडिया और ट्रैवल फोरम तक सीमित थीं, लेकिन अब यूरोपियन निरीक्षण रिपोर्ट्स ने इन्हें आधिकारिक रूप से दर्ज करना शुरू कर दिया है। यानी पहली बार इस वैश्विक गेटवे की विश्वसनीयता पर बेहद गंभीर और चौंकाने वाले सवाल उठे हैं।
रिपोर्ट्स में क्या-क्या सामने आया
पड़ताल में 40 से अधिक सूचना का अधिकार (FOI) के माध्यम से यूरोपियन देशों से प्राप्त 150 से अधिक गोपनीय निरीक्षण रिपोर्टों का विश्लेषण किया गया है। इन रिपोर्ट्स में वीएफएस सेंटरों को लेकर कई गंभीर बातें सामने आईं।
सबसे बड़ा सवाल डेटा सुरक्षा को लेकर उठा। कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया कि आवेदकों की निजी जानकारी सुरक्षित तरीके से स्टोर नहीं की जा रही थी। कहीं दस्तावेज खुले पड़े मिले तो कहीं डेटा प्रबंधन में गंभीर लापरवाही दिखाई दी।
कई निरीक्षणों में यह भी पाया गया कि कुछ सेंटरों में आवेदकों के दस्तावेज इस तरह रखे गए थे कि दूसरे लोग उन्हें देख सकते थे। यह बेहद गंभीर मामला माना जाता है, क्योंकि वीजा आवेदन में पासपोर्ट, बैंक स्टेटमेंट, नौकरी की जानकारी, आय प्रमाण और निजी पहचान संबंधी दस्तावेज शामिल होते हैं।
कुछ जगहों पर यह भी पाया गया कि पुराने दस्तावेज सही तरीके से नष्ट नहीं किए गए। रिपोर्ट्स के अनुसार हजारों समाचारपत्रों या डिस्कों में आवेदन संबंधी डेटा मौजूद था। यानी जिन जानकारियों को पूरी तरह मिटा दिया जाना चाहिए था, वे सिस्टम में बनी हुई थीं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि कुछ रिपोर्ट्स में पासपोर्ट तक समय पर लौटाए नहीं जाने का जिक्र किया गया। एक देश की निरीक्षण रिपोर्ट में कहा गया कि 2020 में भेजे गए कई पासपोर्ट लंबे समय तक वापस नहीं मिले और बाद में भी यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि वे आखिर गए कहाँ।
वीजा शॉपिंग और एजेंटों का नेटवर्क
रिपोर्ट्स में वीजा शॉपिंग शब्द का भी इस्तेमाल किया गया। इसका मतलब है कि लोग उस देश का वीजा लेने की कोशिश करते हैं जहां प्रक्रिया आसान हो, भले ही उनका असली यात्रा गंतव्य दूसरा देश हो।
लेकिन इससे भी बड़ा सवाल एजेंटों के नेटवर्क को लेकर उठा। कई जगहों पर पाया गया कि असली आवेदकों को स्लॉट नहीं मिल रहे थे, जबकि एजेंटों के पास तुरंत अपॉइंटमेंट उपलब्ध थे। आरोप लगे कि फर्जी अपॉइंटमेंट ब्लॉक किए जा रहे थे और बाद में उन्हें बेच दिया जाता था।
यानी आम आदमी वेबसाइट रिफ्रेश करता रह जाता था, लेकिन एजेंटों के जरिए पैसा देकर काम जल्दी हो जाता था। इससे यह धारणा मजबूत हुई कि सिस्टम के भीतर कहीं न कहीं गंभीर गड़बड़ी है।
कई ट्रैवल एजेंट खुलेआम दावा करते हैं कि वे प्रीमियम स्लॉट दिला सकते हैं। सवाल यह है कि यदि स्लॉट वास्तव में उपलब्ध नहीं हैं, तो फिर एजेंटों को वे कैसे मिल जाते हैं?
यही वह जगह है जहाँ संदेह गहराता है और पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठने लगते हैं।
अतिरिक्त सेवाओं के नाम पर कमाई का खेल
वीजा सेंटरों में जाने वाले लोगों का एक और बड़ा अनुभव ऐड-ऑन सर्विस से जुड़ा होता है। आवेदकों को कई अतिरिक्त सेवाएं ऑफर की जाती हैं - प्रीमियम लाउंज, जल्दी प्रोसेसिंग, एसएमएस अपडेट, कुरियर सेवा, फोटो सेवा, प्रिंटिंग सेवा और दस्तावेज सहायता जैसी सुविधाएं।
समस्या तब शुरू होती है जब कई आवेदकों को यह स्पष्ट नहीं बताया जाता कि ये सेवाएँ वैकल्पिक हैं। कई लोगों का दावा रहा कि उन्हें लगा ये सेवाएँ लेना जरूरी है, वरना उनका आवेदन प्रभावित हो सकता है।
यूरोपियन निरीक्षण रिपोर्ट्स में भी यह बात सामने आई कि अतिरिक्त सेवाओं को लेकर पर्याप्त पारदर्शिता नहीं थी। कुछ जगहों पर जानकारी साफ तरीके से प्रदर्शित नहीं की गई थी। इससे आवेदकों के बीच भ्रम की स्थिति बनी।
दरअसल, विदेश यात्रा का सपना देखने वाला व्यक्ति पहले से ही तनाव में होता है। उसे डर रहता है कि कहीं कोई दस्तावेज गलत न हो जाए या आवेदन खारिज न हो जाए। ऐसे में अतिरिक्त सेवाओं के लिए दबाव महसूस होना स्वाभाविक है।
सबसे बड़ा सवाल - निजी डेटा आखिर कितना सुरक्षित?
आज के दौर में डेटा ही सबसे बड़ी संपत्ति माना जाता है। किसी व्यक्ति का पासपोर्ट, बैंक डिटेल, यात्रा इतिहास, नौकरी और परिवार संबंधी जानकारी बेहद संवेदनशील होती है। यदि यह जानकारी गलत हाथों में चली जाए, तो उसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
इसी वजह से यूरोपियन यूनियन ने डेटा सुरक्षा को लेकर बेहद सख्त कानून बनाए हैं। लेकिन जब निरीक्षण रिपोर्ट्स में यह सामने आने लगा कि आवेदकों का डेटा सुरक्षित तरीके से प्रबंधित नहीं हो रहा, तो मामला और गंभीर हो गया।
कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया कि डेटा वाले दस्तावेज सामान्य कूड़े में मिले। कहीं कंप्यूटर स्क्रीन इस तरह थीं कि दूसरी तरफ बैठे लोग निजी जानकारी देख सकते थे। कुछ मामलों में डेटा को सही समय पर डिलीट नहीं किया गया।
यह केवल तकनीकी गलती नहीं मानी जा सकती। यह सीधे-सीधे उन लोगों की निजता से जुड़ा मामला है जिन्होंने भरोसे के साथ अपने दस्तावेज सिस्टम को सौंपे थे।
किस देश ने क्या कमियां पाईं?
यूरोपीय संघ के विभिन्न सदस्य देशों द्वारा समय-समय पर किए गए ऑन-साइट निरीक्षणों में वीएफएस केंद्रों की जो हकीकत सामने आई है, वह डराने वाली है:
1. लक्समबर्ग (Luxembourg): असुरक्षित डेटा और फर्जी अपॉइंटमेंट्स का खेल
लक्समबर्ग का दूतावास भारत में वीएफएस ग्लोबल द्वारा संचालित 13 वीज़ा आवेदन केंद्रों के माध्यम से काम करता है। इस दूतावास ने वीएफएस के कामकाज पर सबसे विस्तृत और तीखी चिंताएं उठाई हैं।
हालांकि, दूतावास ने यह भी खुलासा किया कि उसने वीएफएस के साथ वर्ष 2024 से 2027 के लिए एक नए तीन-वर्षीय अनुबंध पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसमें पिछला एकमात्र अपडेट केवल व्यक्तिगत डेटा सुरक्षा नियमों से संबंधित था।
वर्ष 2022 में किए गए निरीक्षण के निष्कर्ष 2023 की एक कार्यान्वयन रिपोर्ट में प्रकाशित हुए थे। ये बताते हैं कि आवेदकों के बायोमेट्रिक पहचानकर्ताओं (Biometric Identifiers) को अनएन्क्रिप्टेड कॉम्पैक्ट डिस्क (CDs) पर सहेज कर रखा जा रहा था। इन डिस्कों को वीएफएस कार्यालयों से वाणिज्य दूतावासों में स्थानांतरित करने के लिए सामान्य कूरियर की तरह इस्तेमाल किया जा रहा था।
स्कैन किए गए आवेदन दस्तावेजों को एक अलग असुरक्षित डिस्क पर सहेजा गया था।
वीएफएस द्वारा बायोमेट्रिक डेटा भेजने के दौरान, यदि कोई त्रुटि (error) आती थी, तो डेटा को सामान्य और असुरक्षित ईमेल के माध्यम से भेज दिया जाता था, जो साइबर हमलों के प्रति बेहद संवेदनशील है।
ऑडिटर्स ने पाया कि स्कैन किए गए आवेदनों और बायोमेट्रिक डेटा वाली इन कॉम्पैक्ट डिस्कों को काम पूरा होने के बाद नियमों के अनुसार नष्ट नहीं किया जा रहा था। केंद्र पर एक भी सीडी श्रेडर (CD Shredder) उपलब्ध नहीं था। निरीक्षण के दौरान 18 महीने से अधिक पुराने आवेदकों के डेटा वाली सीडी बरामद की गईं, जो यूरोपीय संघ के डेटा नियमों का सीधा उल्लंघन है।
इसके अलावा, वर्ष 2024 की नई दिल्ली निरीक्षण रिपोर्ट में फर्जी वीएफएस अपॉइंटमेंट्स और मुख्य रूप से ट्रैवल एजेंटों द्वारा की जाने वाली वीजा शॉपिंग की समस्याओं को रेखांकित किया गया। नकली
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि वीएफएस केंद्रों पर प्रति माह भारी संख्या में नो-शो (आवेदकों का न पहुंचना) होता है, विशेष रूप से अहमदाबाद, चंडीगढ़ और जालंधर में, जहां यह दर कभी-कभी 50% या उससे अधिक तक पहुंच जाती है।
दूतावास अभी भी उन फाइलों का पता लगा रहा है जो लक्समबर्ग को एक गंतव्य के रूप में दिखाने के लिए बनाई गई थीं, जबकि वास्तविक मुख्य गंतव्य स्पष्ट रूप से कोई अन्य सदस्य देश था। रिपोर्ट में इसके लिए सीधे तौर पर ट्रैवल एजेंटों को जिम्मेदार ठहराया गया, न कि वीएफएस ग्लोबल को।
2. स्वीडन (Sweden): मुंबई में डेटा गोपनीयता और प्रतिस्पर्धा का उल्लंघन
स्वीडिश मिशन द्वारा 2023 में मुंबई स्थित वीएफएस कार्यालय के अचानक किए गए निरीक्षण (Spot-Check) में 19 पन्नों की एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की गई। इस रिपोर्ट में दो मुख्य चिंताएं उठाई गईं:
गोपनीयता का अभाव: पहली चिंता यह थी कि वास्को (Vasco) नाम की एक अन्य वीजा सेवा प्रदाता कंपनी उसी मंजिल पर काम कर रही थी। ऑडिटर्स ने नोट किया कि वीएफएस को वास्को से खुद को अलग करने के लिए और अधिक उपाय करने की आवश्यकता है, ताकि आवेदकों को यह स्पष्ट हो सके कि वास्को एक स्वतंत्र कंपनी है और इसका वीएफएस से कोई संबंध नहीं है। हालांकि, बाद में वास्को वहां से शिफ्ट हो गया।
आवेदकों की निजता से खिलवाड़: दूसरी गंभीर चिंता आवेदकों की व्यक्तिगत गोपनीयता को लेकर थी। आवेदन काउंटर आपस में जुड़े हुए थे और उन्हें केवल कम ऊंचाई वाले डिवाइडर (Low Dividers) द्वारा अलग किया गया था।
इसका मतलब यह था कि जब कोई आवेदक स्टाफ से बात कर रहा होता था, तो उसकी संवेदनशील वित्तीय और व्यक्तिगत जानकारी पास खड़ा कोई भी दूसरा व्यक्ति आसानी से सुन सकता था। ऑडिटर्स ने स्पष्ट लिखा कि वीएफएस स्टाफ के साथ आवेदकों की बातचीत निजी नहीं थी।
हालांकि, 2025 तक स्वीडिश मिशन के निरीक्षण में पाया गया कि मुंबई कार्यालय ने 15 में से 14 श्रेणियों में नियमों का अनुपालन किया था। जो एकमात्र विफलता पाई गई, वह वैल्यू ऐडेड सर्विसेज (VAS) के पारदर्शी संचालन को लेकर थी।
3. स्विट्जरलैंड (Switzerland): अलमारियों में बंद लावारिस पासपोर्ट और रिफंड की गड़बड़ी
स्विट्जरलैंड के मिशन द्वारा 2023 में नई दिल्ली स्थित वीएफएस केंद्र के निरीक्षण में एक अनुपालन तालिका (Compliance Table) तैयार की गई, जिसमें संचालन के 33 क्षेत्रों को शामिल किया गया था। इस ऑडिट में वीएफएस को छह क्षेत्रों में गैर-अनुपालन (Non-Compliant) पाया गया।
वीएफएस ने आवेदन काउंटरों या अपनी वेबसाइट पर शेंगेन और व्यक्तिगत डेटा (Schengen and Personal Data) से संबंधित फैक्टशीट उपलब्ध नहीं कराई थी। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि निरीक्षण के दौरान वीएफएस कार्यालय में ऐसे पासपोर्ट पाए गए जिन्हें साल 2020 में ही वापस भेजा जाना था, लेकिन वे कभी आवेदकों को लौटाए ही नहीं गए।
4. हंगरी (Hungary): डेटा रिटेंशन नियमों की सरेआम धज्जियां
हंगेरियन वाणिज्य दूतावास की 2025 की एक रिपोर्ट में नई दिल्ली में वीएफएस ग्लोबल के 2021 के ऑन-साइट निरीक्षण का हवाला दिया गया। इस निरीक्षण के दौरान ऑडिटर्स ने पाया कि वीएफएस के सिस्टम में एक महीने से अधिक पुराने आवेदकों के डेटा अभी भी पूरी तरह सुलभ और सक्रिय (Accessible) थे।
शेंगेन वीजा नियमों (Schengen Visa Code) के तहत ऐसे सभी डेटा को ट्रांसमिशन के सात दिन के भीतर वीएफएस के सिस्टम से पूरी तरह से हटा (Delete) दिया जाना चाहिए। निरीक्षण के दौरान वीएफएस के कर्मचारियों को इस अनिवार्य आवश्यकता की याद दिलाई गई।
हालांकि, रिपोर्ट में यह भी नोट किया गया है कि बाद में हंगरी की आईटी टीम की सहायता से इस समस्या का समाधान कर लिया गया था और अब "डेटा प्रतिधारण नियमों (Data Retention Rules) का पूरी तरह से सम्मान किया जा रहा है।
कंपनी का यह आया बयान
वीएफएस ग्लोबल ने एक आधिकारिक बयान जारी कर कहा कि वीएफएस ग्लोबल दुनिया की सबसे बड़ी वीजा आउटसोर्सिंग कंपनी है। हम 160 से अधिक देशों में काम करते हैं और 71 ग्राहक सरकारों (Client Governments) के लिए एक विश्वसनीय भागीदार हैं।
साल 2001 में अपनी स्थापना के बाद से हमने आधी अरब (500 मिलियन) से अधिक वीजा आवेदनों को सफलतापूर्वक प्रोसेस किया है।"
कंपनी ने दावा किया कि उनकी सेवाएं पूरी तरह से पारदर्शी हैं, उनका कड़ा ऑडिट किया जाता है और वे सख्त और निरंतर सरकारी निरीक्षण (Rigorous and Continuous Government Oversight) के अधीन काम करते हैं।
कंपनी के प्रवक्ताओं का कहना है कि वे विभिन्न दूतावासों द्वारा समय-समय पर दिए जाने वाले सुझावों के आधार पर अपनी तकनीकी और परिचालन प्रणालियों में लगातार सुधार करते हैं। डेटा सुरक्षा को लेकर किसी भी स्तर पर समझौता नहीं किया जाता है।
लेकिन सवाल यह है कि यदि सबकुछ नियमों के मुताबिक है, तो फिर इतनी बड़ी संख्या में निरीक्षण रिपोर्ट्स में कमियाँ क्यों दर्ज हुईं? यही कारण है कि यह मामला अब केवल शिकायत भर नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर की बहस बनता जा रहा है।
आम भारतीय के लिए सबसे बड़ी परेशानी
इन सबके बीच सबसे ज्यादा परेशान आम आवेदक होता है। वह व्यक्ति जो पहली बार विदेश जाने की तैयारी कर रहा है। जिसने महीनों की बचत के बाद टिकट और होटल बुक किए हैं। जिसे डर है कि वीजा देर से आया तो पूरी यात्रा खराब हो जाएगी।
वह घंटों लाइन में खड़ा रहता है। बार-बार दस्तावेज जांच करवाता है। वेबसाइट पर स्लॉट खोजता रहता है। फिर भी उसे भरोसा नहीं होता कि उसका काम समय पर होगा या नहीं।
कई लोग तो केवल इस डर से एजेंटों का सहारा लेते हैं कि कहीं आवेदन में गलती न हो जाए। यही डर एक पूरी समानांतर व्यवस्था को जन्म देता है, जहाँ जानकारी और पहुंच रखने वाले लोग फायदा उठाने लगते हैं।
डिजिटल सिस्टम, लेकिन भरोसे का संकट
तकनीक ने वीजा प्रक्रिया को पहले से आसान जरूर बनाया है, लेकिन पूरी तरह पारदर्शी नहीं। आज आवेदन ऑनलाइन हो जाते हैं, दस्तावेज डिजिटल अपलोड हो जाते हैं, लेकिन अंतिम स्तर पर वही पुरानी समस्या बनी रहती है -जानकारी का असंतुलन।
आवेदक को यह नहीं पता होता कि सिस्टम के भीतर क्या चल रहा है। उसे केवल इतना दिखता है कि स्लॉट नहीं हैं, तारीख नहीं मिल रही, या अतिरिक्त सेवाएँ सुझाई जा रही हैं। यही अस्पष्टता अविश्वास पैदा करती है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि वीजा प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाना है, तो अपॉइंटमेंट सिस्टम, अतिरिक्त शुल्क और डेटा प्रबंधन को लेकर स्पष्ट नियम और निगरानी जरूरी होगी।
सपना अभी भी जिंदा है, लेकिन सवाल भी
यूरोप जाने का सपना देखने वालों की संख्या कम नहीं होगी। आने वाले वर्षों में यह और बढ़ेगी। लेकिन इसी के साथ यह सवाल भी बढ़ता जाएगा कि क्या वीजा प्रक्रिया वास्तव में उतनी सुरक्षित और पारदर्शी है जितनी दिखाई जाती है?
वीएफएस और यूरोपियन एजेंसियों के बीच चल रही यह बहस केवल एक कंपनी की कहानी नहीं है। यह उस पूरी व्यवस्था की कहानी है जहां आम आदमी अपने सपनों के बदले सिस्टम पर भरोसा करता है। लेकिन जब उसी सिस्टम पर सवाल उठने लगें, तो चिंता केवल तकनीकी नहीं रहती।
वीएफएस ग्लोबल ने 'द सूत्र' को भेजा अपना पक्ष
"VFS Global दुनिया भर की सरकारों के लिए भरोसेमंद पार्टनर है। हमारा काम वीजा से जुड़े प्रशासनिक काम देखना है। हम हर देश में वहां के कड़े नियमों और सुरक्षा के दायरे में काम करते हैं। पिछले 25 साल से हम सरकारों को सुरक्षित और बेहतर तरीके से बड़े पैमाने पर वीजा सर्विस देने में मदद कर रहे हैं।
हमारे इस काम के लिए बकायदा रेगुलर टेंडर निकाले जाते हैं। हम धोखाधड़ी, डेटा का गलत इस्तेमाल या किसी भी ऐसी लापरवाही को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करते, जो हमारे क्लाइंट्स और आवेदकों के भरोसे को ठेस पहुंचाए।
हमारी जो भी वेल्यू एडेड सेवा हैं, वे सभी सरकारों की सलाह और उनकी मंजूरी के बाद ही तय होती हैं। वे इस पर कड़ी नजर भी रखते हैं। कोई आवेदक इन सेवाओं को चुनता है या नहीं, इसका उनके वीजा के फैसले पर कोई असर नहीं पड़ता। वीजा देना या न देना पूरी तरह से सरकारों का काम है। हम इस बात का पूरा ध्यान रखते हैं कि आवेदकों को हर जगह साफ-साफ पता रहे कि ये सर्विस पूरी तरह से ऑप्शनल हैं।"
- जानवी सेठ, प्रवक्ता, वीएफएस ग्लोबल
FAQ
- शेंगेन वीजा क्या है, यह किस काम आता है?
शेंगेन वीजा एक ऐसा यात्रा दस्तावेज है, जो किसी भी भारतीय को 27 यूरोपियन देशों में स्वतंत्र रूप से यात्रा की अनुमति देता है। - शेंगेन वीजा की क्या प्रक्रिया है?
भारत में शेंगेन वीजा के लिए आवेदन प्रक्रिया वीएफएस ग्लोबल (वीएफएस ग्लोबल) के माध्यम से होती है। यह एक तरह से भारत और यूरोपियन देशों के बीच गेटवे का काम करती है। - क्या वीएफएस ग्लोबल पर भरोसा किया जा सकता है?
वीफएस ग्लोबल आउटसोर्स कंपनी है। हाल ही विभिन्न यूरोपियन देशों की निरीक्षण रिपोर्ट्स में इस कंपनी के कामकाज पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। - भारत में शेंगेन वीजा के लिए कितने लोग आवेदन करते हैं?
आंकड़ों के मुताबिक हर साल 10 लाख से अधिक भारतीय शेंगेन वीजा (Schengen Visa) के लिए लंबी कतारों में खड़े रहते हैं। पिछले पांच साल में विशेष रूप से कोरोना काल के बाद यह संख्या दोगुनी से भी अधिक हो गई है।
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