कोटा की परछाई से अलग बनाई पहचान, क्या NEET पेपर लीक का दाग मिटा पाएगा लातूर?
Jinesh Jain | May 23, 2026, 18:22 IST
Photograph: (the sootr)
NEET पेपर लीक के जो छींटे देश के नक्शे पर बिखरे हैं, उसकी आंच लातूर भी पहुंची है। कोटा ने जहां सीधे तौर पर कोचिंग संस्थानों के दम पर अपनी पहचान बनाई, वहीं लातूर की कहानी अलग रही। दुर्भाग्य यह है कि नीट विवाद के बाद आज लातूर एक दोराहे पर खड़ा है।
शाम के करीब 9 बजे हैं। महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में स्थित लातूर शहर का उदयोग भवन इलाका आम दिनों की तरह ही आज भी पूरी तरह से जागा हुआ है। यहां की हवाओं में धूल के महीन कणों के साथ-साथ किताबों के पन्नों की गंध, चाय की टपरियों से उठता धुआं और हजारों आंखों में तैरते डॉक्टर-इंजीनियर बनने के सपने घुले हुए हैं।
इस चौराहे पर खड़े होकर यदि आप चारों तरफ नजर दौड़ाएं तो आपको केवल पीठ पर भारी-भरकम स्पाइरल बाइंडिंग वाले नोट्स के बैग टांगे, हाथों में रंग-बिरंगे हाइलाइटर्स लिए युवाओं के झुंड के झुंड नजर आएंगे। कोई 16 साल का बच्चा दौड़ते हुए सड़क पार कर रहा है ताकि उसकी रात की डाउट क्लास न छूट जाए तो कोई सड़क किनारे खड़े होकर हाथ में पकड़ी चाय की प्याली के साथ फिजिक्स के मैकेनिक्स के किसी कठिन फॉर्मूले पर अपने साथी से बहस कर रहा है।
यह लातूर का ट्यूशन एरिया है। यह वह इलाका है जिसने देश को लातूर पैटर्न जैसा शब्द दिया। एक ऐसा पैटर्न, जिसने कभी मुंबई और पुणे जैसे बड़े शहरों के शैक्षिक एकाधिकार को चुनौती दी थी। लेकिन आज, जब देश में साल 2026 की भीषण गर्मियां अपने चरम पर हैं, इस कोचिंग हब की धड़कनें कुछ थमी हुई हैं। हवा में एक अजीब सी बेचैनी है। राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) के पेपर लीक के जो छींटे देश के नक्शे पर बिखरे हैं, उनकी आंच इस शांत और पढ़ाई में डूबे शहर तक भी पहुंची है।
आज लातूर भले ही बड़े-बड़े कोचिंग कॉर्पोरेट्स और चमचमाती इमारतों का शहर नजर आता हो, लेकिन इसकी शुरुआत कॉर्पोरेट बोर्डरूम्स में नहीं, बल्कि सरकारी और अर्ध-सरकारी जूनियर कॉलेजों के क्लासरूम में हुई थी।
राजस्थान के कोटा ने जहां सीधे तौर पर कोचिंग संस्थानों के दम पर अपनी पहचान बनाई, वहीं लातूर की कहानी अलग थी। 1970 और 1980 के दशक में यहां के दो प्रतिष्ठित संस्थानों राजर्षि शाहू कॉलेज और दयानंद कॉलेज के कुछ दूरदर्शी शिक्षकों ने महसूस किया कि मराठवाड़ा जैसे पिछड़े और सूखे की मार झेलने वाले क्षेत्र के बच्चे केवल इसलिए पीछे रह जाते हैं क्योंकि उन्हें बड़े शहरों जैसी गाइडेंस नहीं मिलती।
शाहू कॉलेज के पूर्व छात्र और आज के सफल नागरिक बाबूराव किशनराव गोमसाले इस सफर की जीती-जागती मिसाल हैं। वे याद करते हैं, मैं एक बेहद गरीब परिवार से था। दसवीं के बाद मेरे परिवार के पास पढ़ाने के पैसे नहीं थे, इसलिए मैंने पढ़ाई छोड़ दी थी और एक गैरेज में काम करने लगा था।
एक दिन शाहू कॉलेज के दो शिक्षक मेरे गांव आए, मुझे ढूंढा और मेरे माता-पिता को मनाया। उन्होंने कहा कि पैसे की चिंता मत करो, बस लड़के को पढ़ने भेजो। उन्होंने मुझे कमाओ और सीखो योजना के तहत कॉलेज में रहने और काम करने की जगह दी। आज मैं ओएनजीसी (ONGC) से एक क्लास-वन ऑफिसर के पद से सेवानिवृत्त हूँ। यह लातूर की ताकत थी।
1990 और 2000 के दशक की शुरुआत में महाराष्ट्र बोर्ड के मेरिट लिस्ट में लातूर का नाम एकतरफा चमकने लगा। 10वीं और 12वीं के नतीजों में पहले 10 स्थानों में से 7 या 8 बच्चे लातूर के ही होते थे। इसी सफलता को नाम दिया गया लातूर पैटर्न।
कठोर अनुशासन: सुबह से लेकर देर रात तक पढ़ाई का चक्र।
सघन टेस्ट सीरीज: हर हफ्ते परीक्षाओं का आयोजन ताकि कमियां तुरंत पकड़ी जा सकें।
निजी निगरानी: शिक्षकों द्वारा हर बच्चे की कॉपियों की खुद जांच करना और काउंसलिंग करना।
लातूर में एक अस्पताल चलाने वाले डॉक्टर सोपान जटाल कहते हैं, लातूर पैटर्न कोई कोचिंग क्लास का धंधा नहीं था। यह एक संस्कृति थी, जो कॉलेजों और शिक्षकों की कड़ी मेहनत से पैदा हुई थी।
वक्त बदला और साल 2000 के बाद जब देश में मेडिकल और इंजीनियरिंग के लिए राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाएं (जैसे NEET और JEE) अनिवार्य होने लगीं, तो सिर्फ बोर्ड परीक्षा के भरोसे रहना मुमकिन नहीं था।
लातूर ने भी खुद को बदला। जो शिक्षक पहले कॉलेजों में पढ़ाते थे, उन्होंने अपनी प्राइवेट कोचिंग क्लासेस शुरू कीं। देखते ही देखते, लातूर की यह पढ़ाई 500 करोड़ रुपए की सालाना इकोनॉमी में तब्दील हो गई।
आज लातूर में हर साल देश भर से (विशेषकर ग्रामीण महाराष्ट्र और पड़ोसी राज्यों से) 40,000 से अधिक छात्र आते हैं। यहां की पूरी अर्थव्यवस्था हॉस्टल, मेस, बुक डिपो, ऑटो रिक्शा और यहां तक कि कपड़े धोने वाले धोबियों का धंधा भी पूरी तरह से इन छात्रों पर निर्भर है।
शाहू कॉलेज के पास ही जूस की दुकान चलाने वाले महादेव कहते हैं, साहब, ये बच्चे हैं तो हमारा घर चलता है। जब परीक्षाओं के बाद दो महीने के लिए ये अपने घर जाते हैं, तो पूरे शहर में सन्नाटा पसर जाता है। दुकानें बंद होने की नौबत आ जाती है।
कोटा और
जब भी देश में कोचिंग हब्स की बात होती है तो राजस्थान का कोटा और हालिया वर्षों में उभरा सीकर चर्चा के केंद्र में आ जाते हैं। लेकिन लातूर इन दोनों से स्वभाव और संस्कृति में काफी अलग है।
जहां राजस्थान का सीकर इन दिनों राष्ट्रीय स्तर पर पेपर लीक और अन्य प्रशासनिक विवादों के चलते सुर्खियों में है। वहां का माहौल बेहद तनावपूर्ण हो चुका है, वहीं लातूर ने खुद को एक सुरक्षित और अधिक मानवीय विकल्प के रूप में बनाए रखने की कोशिश की है।
सीकर की चर्चा करते हुए लातूर के एक कोचिंग संचालक नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, सीकर ने बहुत कम समय में व्यावसायिक तरक्की तो की, लेकिन वहां की व्यवस्था पेपर लीक जैसे गंभीर विवादों के चक्रव्यूह में फंस गई है, जिससे छात्रों का भरोसा डिगा है। लातूर में हम आज भी उस शिक्षक-छात्र के पवित्र रिश्ते को बचाने की कोशिश कर रहे हैं जो हमारी नींव थी।
लातूर के हॉस्टलों का माहौल भी कोटा या सीकर जितना मैकेनिकल नहीं है। यहां कई हॉस्टल आज भी स्थानीय परिवारों द्वारा चलाए जाते हैं, जहां छात्रों को घर जैसा खाना और माहौल देने की कोशिश की जाती है।
हिंगोली जिले के रहने वाले एक छात्र के पिता नामदेव मुंडे कहते हैं, कोटा भेजने की हमारी हैसियत नहीं थी और वहां का माहौल बच्चों पर बहुत दबाव डालता है। लातूर हमारे पास भी है, यहां खर्च कम है (सालाना करीब 85,000 रुपए में पढ़ाई और रहना दोनों हो जाता है) और यहां के लोग बच्चों का ध्यान रखते हैं।
लेकिन, इतिहास कितना भी गौरवशाली क्यों न हो, वर्तमान की हकीकत बेहद कड़वी है। साल 2026 की NEET परीक्षा को लेकर जो देशव्यापी बवाल मचा है, उसने लातूर की इस शांत रीढ़ को भी हिलाकर रख दिया है।
सीबीआई (CBI) की जांच के तार जब लातूर से जुड़े, तो यहां के दो प्रोफेसरों को गिरफ्तार किया गया है। इस खबर ने शहर के माथे पर एक ऐसा दाग लगा दिया है जिसे धोने में लंबा वक्त लगेगा।
उदयोग भवन के एक सुनसान कोने में स्थित एक कोचिंग इंस्टिट्यूट के बाहर खड़े होकर 24 वर्षीय छात्र सुखवीर सिंह अपनी निराशा छिपा नहीं पाते। गंगा नगर के रहने वाले सुखवीर का यह दूसरा प्रयास था। वे कहते हैं, जब पेपर लीक की खबरें आईं, तो मैं अपने हॉस्टल के कमरे में बैठा था। मुझे लगा जैसे मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई।
मेरे माता-पिता ने अपनी जमीन का एक हिस्सा गिरवी रखकर मुझे यहाँ भेजा है ताकि मैं डॉक्टर बन सकूं। अब परीक्षा दोबारा होगी या क्या होगा, कुछ पता नहीं। इस अनिश्चितता के माहौल में पढ़ना नरक जैसा है।
उनके साथ खड़े नरेंद्र कुमार कहते हैं, मुझे दोबारा उन्हीं किताबों को, उसी कमरे में बैठकर पढ़ने की इच्छा नहीं हो रही है। ऐसा लगता है जैसे हमारी पूरी मेहनत किसी और के भ्रष्टाचार की वजह से बेकार चली गई।
आमतौर पर मई और जून के महीनों में लातूर के कोचिंग संस्थान नए बैच के छात्रों से खचाखच भरे होते थे। लेकिन इस बार नजारा बदला हुआ है। राजर्षि शाहू कॉलेज के कोऑर्डिनेटर डीके देशमुख बताते हैं, आमतौर पर हमारे पास उपलब्ध सीटों से तीन गुना अधिक आवेदन आते हैं।
इस साल भी बच्चे आ रहे हैं, लेकिन उनके और उनके अभिभावकों के चेहरों पर वह उत्साह नहीं है। हर कोई डरा हुआ है। हर अभिभावक का पहला सवाल यही होता है कि क्या परीक्षा निष्पक्ष होगी?
इस अनिश्चितता और विवादों के बीच भी लातूर के कुछ संस्थान अपने पुराने मूल्यों को बचाने की जद्दोजहद में लगे हैं। शाहू कॉलेज का साइंस विंग इसका एक बड़ा उदाहरण है। यहां करीब 1200 छात्र पढ़ते हैं, जो सुबह से लेकर शाम तक कॉलेज परिसर के भीतर ही रहते हैं।
यहां का एक सख्त नियम है- नो स्मार्टफोन (No Smartphone)। कॉलेज परिसर या हॉस्टल के कमरों में छात्रों को एंड्रॉइड या आईफोन रखने की सख्त मनाही है। यदि किसी छात्र को अपने घर पर बात करनी है, तो हॉस्टल की दीवारों पर लगे वॉल-माउंटेड बेसिक कीपैड वाले फोन ही एकमात्र जरिया हैं। हर छात्र को दो नंबर रजिस्टर कराने होते हैं, जिन पर वे हफ्ते में केवल एक या दो बार ही बात कर सकते हैं।
हॉस्टल चलाने वाले 30 वर्षीय विक्रम भाम्भू कहते हैं, यह नियम बच्चों को सोशल मीडिया और रील्स की आभासी दुनिया के भटकाव से दूर रखने के लिए है। हमारे यहां बच्चे अपना 10% समय ही फोन पर बिताते हैं, वह भी सिर्फ घर बात करने के लिए। बाकी समय वे या तो पढ़ रहे होते हैं या सो रहे होते हैं। लातूर में सफलता का यही एक सीक्रेट है — फोकस।
इस डिजिटल डिटॉक्स का असर बच्चों की पढ़ाई पर भी दिखता है। लातूर के छात्र आज भी ग्रुप स्टडी (Group Study) पर बहुत भरोसा करते हैं। शाम के समय हॉस्टलों के कॉमन रूम में 4-4, 5-5 बच्चों के ग्रुप बैठकर एक-दूसरे के डाउट्स क्लियर करते नजर आते हैं। यह दृश्य कोटा जैसे शहरों से बिल्कुल अलग है, जहां हर बच्चा अपने कमरे में अकेला, एक द्वीप की तरह जी रहा है।
जैसे-जैसे रात गहराती है, उदयोग भवन की बत्तियां और तेज चमकने लगती हैं। लेकिन इस चमक के पीछे एक पुरानी यादों की टीस भी है। शिक्षाविद सचिन बांगड़ कहते हैं, आज का लातूर वह लातूर नहीं है जो 20 साल पहले था।
पहले यहां व्यावसायिकता नहीं थी, एक मिशन था। शिक्षकों को पता होता था कि उनके क्लास के आखिरी बेंच पर बैठे बच्चे के घर की माली हालत क्या है। आज जब बड़ी-बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों ने यहां पैर पसारे हैं, तो व्यक्तिगत जुड़ाव थोड़ा कम हुआ है।
इसके बावजूद, लातूर की मिट्टी में कुछ ऐसा है जो इसे टूटने नहीं देता। यहां के बच्चे आज भी जानते हैं कि उनके लिए शिक्षा कोई शौक नहीं, बल्कि गरीबी के दलदल से बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता है। लातूर के बाहरी इलाके से आई एक छात्रा प्रणिता कहती है, मेरे पिता किसान हैं। हमारे यहां पानी की भारी किल्लत है। खेती से घर नहीं चल सकता। मेरे पास सिर्फ यह किताबें ही हैं। अगर मैं इस साल NEET क्रैक नहीं कर पाई, तो मेरे पास कोई प्लान-बी नहीं है।
रात के 11:30 बज चुके हैं। लातूर की सड़कों पर ऑटो की आवाजाही कम हो गई है, लेकिन स्टडी रूम्स (Study Rooms) की खिड़कियों से आती पीली रोशनी अभी भी बरकरार है। देश के शिक्षा तंत्र पर लगे पेपर लीक के दागों ने भले ही इन बच्चों के चेहरों की मुस्कान छीन ली हो, लेकिन उनकी हिम्मत को पूरी तरह से नहीं तोड़ पाए हैं।
लातूर आज एक दोराहे पर खड़ा है। एक तरफ उसका गौरवशाली अतीत और उसकी खुद की बनाई मानवीय शिक्षण पद्धति है, तो दूसरी तरफ आधुनिक कोचिंग इंडस्ट्री की अंधी दौड़ और उसके साथ आने वाली विकृतियां। यह शहर इस बात का गवाह है कि कैसे भारत के छोटे शहरों के बच्चे अपनी आंखों में आसमान समेटे हुए संघर्ष करते हैं।
विवादों के इस दौर में भी लातूर की ये चमकती खिड़कियां इस बात का सुबूत हैं कि जब तक देश में प्रणिता और सुखवीर जैसे बच्चे अपनी किस्मत बदलने के लिए रातों को जागने को तैयार हैं, तब तक इस देश के लर्निंग हब्स की प्रासंगिकता कभी खत्म नहीं होगी। जरूरत सिर्फ इतनी है कि देश का सिस्टम इन बच्चों के भरोसे और मेहनत के साथ न्याय करना सीख ले।
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इस चौराहे पर खड़े होकर यदि आप चारों तरफ नजर दौड़ाएं तो आपको केवल पीठ पर भारी-भरकम स्पाइरल बाइंडिंग वाले नोट्स के बैग टांगे, हाथों में रंग-बिरंगे हाइलाइटर्स लिए युवाओं के झुंड के झुंड नजर आएंगे। कोई 16 साल का बच्चा दौड़ते हुए सड़क पार कर रहा है ताकि उसकी रात की डाउट क्लास न छूट जाए तो कोई सड़क किनारे खड़े होकर हाथ में पकड़ी चाय की प्याली के साथ फिजिक्स के मैकेनिक्स के किसी कठिन फॉर्मूले पर अपने साथी से बहस कर रहा है।
यह लातूर का ट्यूशन एरिया है। यह वह इलाका है जिसने देश को लातूर पैटर्न जैसा शब्द दिया। एक ऐसा पैटर्न, जिसने कभी मुंबई और पुणे जैसे बड़े शहरों के शैक्षिक एकाधिकार को चुनौती दी थी। लेकिन आज, जब देश में साल 2026 की भीषण गर्मियां अपने चरम पर हैं, इस कोचिंग हब की धड़कनें कुछ थमी हुई हैं। हवा में एक अजीब सी बेचैनी है। राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) के पेपर लीक के जो छींटे देश के नक्शे पर बिखरे हैं, उनकी आंच इस शांत और पढ़ाई में डूबे शहर तक भी पहुंची है।
जहां जूनियर कॉलेजों ने लिखी थी इबारत
राजस्थान के कोटा ने जहां सीधे तौर पर कोचिंग संस्थानों के दम पर अपनी पहचान बनाई, वहीं लातूर की कहानी अलग थी। 1970 और 1980 के दशक में यहां के दो प्रतिष्ठित संस्थानों राजर्षि शाहू कॉलेज और दयानंद कॉलेज के कुछ दूरदर्शी शिक्षकों ने महसूस किया कि मराठवाड़ा जैसे पिछड़े और सूखे की मार झेलने वाले क्षेत्र के बच्चे केवल इसलिए पीछे रह जाते हैं क्योंकि उन्हें बड़े शहरों जैसी गाइडेंस नहीं मिलती।
शाहू कॉलेज के पूर्व छात्र और आज के सफल नागरिक बाबूराव किशनराव गोमसाले इस सफर की जीती-जागती मिसाल हैं। वे याद करते हैं, मैं एक बेहद गरीब परिवार से था। दसवीं के बाद मेरे परिवार के पास पढ़ाने के पैसे नहीं थे, इसलिए मैंने पढ़ाई छोड़ दी थी और एक गैरेज में काम करने लगा था।
एक दिन शाहू कॉलेज के दो शिक्षक मेरे गांव आए, मुझे ढूंढा और मेरे माता-पिता को मनाया। उन्होंने कहा कि पैसे की चिंता मत करो, बस लड़के को पढ़ने भेजो। उन्होंने मुझे कमाओ और सीखो योजना के तहत कॉलेज में रहने और काम करने की जगह दी। आज मैं ओएनजीसी (ONGC) से एक क्लास-वन ऑफिसर के पद से सेवानिवृत्त हूँ। यह लातूर की ताकत थी।
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लातूर पैटर्न का उदय
इस पैटर्न की खासियतें बेहद बुनियादी थीं:
सघन टेस्ट सीरीज: हर हफ्ते परीक्षाओं का आयोजन ताकि कमियां तुरंत पकड़ी जा सकें।
निजी निगरानी: शिक्षकों द्वारा हर बच्चे की कॉपियों की खुद जांच करना और काउंसलिंग करना।
लातूर में एक अस्पताल चलाने वाले डॉक्टर सोपान जटाल कहते हैं, लातूर पैटर्न कोई कोचिंग क्लास का धंधा नहीं था। यह एक संस्कृति थी, जो कॉलेजों और शिक्षकों की कड़ी मेहनत से पैदा हुई थी।
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200 करोड़ की इकोनॉमी और नया चेहरा
लातूर ने भी खुद को बदला। जो शिक्षक पहले कॉलेजों में पढ़ाते थे, उन्होंने अपनी प्राइवेट कोचिंग क्लासेस शुरू कीं। देखते ही देखते, लातूर की यह पढ़ाई 500 करोड़ रुपए की सालाना इकोनॉमी में तब्दील हो गई।
आज लातूर में हर साल देश भर से (विशेषकर ग्रामीण महाराष्ट्र और पड़ोसी राज्यों से) 40,000 से अधिक छात्र आते हैं। यहां की पूरी अर्थव्यवस्था हॉस्टल, मेस, बुक डिपो, ऑटो रिक्शा और यहां तक कि कपड़े धोने वाले धोबियों का धंधा भी पूरी तरह से इन छात्रों पर निर्भर है।
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शाहू कॉलेज के पास ही जूस की दुकान चलाने वाले महादेव कहते हैं, साहब, ये बच्चे हैं तो हमारा घर चलता है। जब परीक्षाओं के बाद दो महीने के लिए ये अपने घर जाते हैं, तो पूरे शहर में सन्नाटा पसर जाता है। दुकानें बंद होने की नौबत आ जाती है।
कोटा और सीकर की परछाई
जहां राजस्थान का सीकर इन दिनों राष्ट्रीय स्तर पर पेपर लीक और अन्य प्रशासनिक विवादों के चलते सुर्खियों में है। वहां का माहौल बेहद तनावपूर्ण हो चुका है, वहीं लातूर ने खुद को एक सुरक्षित और अधिक मानवीय विकल्प के रूप में बनाए रखने की कोशिश की है।
सीकर की चर्चा करते हुए लातूर के एक कोचिंग संचालक नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, सीकर ने बहुत कम समय में व्यावसायिक तरक्की तो की, लेकिन वहां की व्यवस्था पेपर लीक जैसे गंभीर विवादों के चक्रव्यूह में फंस गई है, जिससे छात्रों का भरोसा डिगा है। लातूर में हम आज भी उस शिक्षक-छात्र के पवित्र रिश्ते को बचाने की कोशिश कर रहे हैं जो हमारी नींव थी।
लातूर के हॉस्टलों का माहौल भी कोटा या सीकर जितना मैकेनिकल नहीं है। यहां कई हॉस्टल आज भी स्थानीय परिवारों द्वारा चलाए जाते हैं, जहां छात्रों को घर जैसा खाना और माहौल देने की कोशिश की जाती है।
हिंगोली जिले के रहने वाले एक छात्र के पिता नामदेव मुंडे कहते हैं, कोटा भेजने की हमारी हैसियत नहीं थी और वहां का माहौल बच्चों पर बहुत दबाव डालता है। लातूर हमारे पास भी है, यहां खर्च कम है (सालाना करीब 85,000 रुपए में पढ़ाई और रहना दोनों हो जाता है) और यहां के लोग बच्चों का ध्यान रखते हैं।
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NEET विवाद की आंच और थम गई रफ्तार
सीबीआई (CBI) की जांच के तार जब लातूर से जुड़े, तो यहां के दो प्रोफेसरों को गिरफ्तार किया गया है। इस खबर ने शहर के माथे पर एक ऐसा दाग लगा दिया है जिसे धोने में लंबा वक्त लगेगा।
उदयोग भवन के एक सुनसान कोने में स्थित एक कोचिंग इंस्टिट्यूट के बाहर खड़े होकर 24 वर्षीय छात्र सुखवीर सिंह अपनी निराशा छिपा नहीं पाते। गंगा नगर के रहने वाले सुखवीर का यह दूसरा प्रयास था। वे कहते हैं, जब पेपर लीक की खबरें आईं, तो मैं अपने हॉस्टल के कमरे में बैठा था। मुझे लगा जैसे मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई।
मेरे माता-पिता ने अपनी जमीन का एक हिस्सा गिरवी रखकर मुझे यहाँ भेजा है ताकि मैं डॉक्टर बन सकूं। अब परीक्षा दोबारा होगी या क्या होगा, कुछ पता नहीं। इस अनिश्चितता के माहौल में पढ़ना नरक जैसा है।
उनके साथ खड़े नरेंद्र कुमार कहते हैं, मुझे दोबारा उन्हीं किताबों को, उसी कमरे में बैठकर पढ़ने की इच्छा नहीं हो रही है। ऐसा लगता है जैसे हमारी पूरी मेहनत किसी और के भ्रष्टाचार की वजह से बेकार चली गई।
क्लासरूम के भीतर का सन्नाटा
इस साल भी बच्चे आ रहे हैं, लेकिन उनके और उनके अभिभावकों के चेहरों पर वह उत्साह नहीं है। हर कोई डरा हुआ है। हर अभिभावक का पहला सवाल यही होता है कि क्या परीक्षा निष्पक्ष होगी?
डिजिटल डिटॉक्स और अनूठी जीवनशैली
यहां का एक सख्त नियम है- नो स्मार्टफोन (No Smartphone)। कॉलेज परिसर या हॉस्टल के कमरों में छात्रों को एंड्रॉइड या आईफोन रखने की सख्त मनाही है। यदि किसी छात्र को अपने घर पर बात करनी है, तो हॉस्टल की दीवारों पर लगे वॉल-माउंटेड बेसिक कीपैड वाले फोन ही एकमात्र जरिया हैं। हर छात्र को दो नंबर रजिस्टर कराने होते हैं, जिन पर वे हफ्ते में केवल एक या दो बार ही बात कर सकते हैं।
हॉस्टल चलाने वाले 30 वर्षीय विक्रम भाम्भू कहते हैं, यह नियम बच्चों को सोशल मीडिया और रील्स की आभासी दुनिया के भटकाव से दूर रखने के लिए है। हमारे यहां बच्चे अपना 10% समय ही फोन पर बिताते हैं, वह भी सिर्फ घर बात करने के लिए। बाकी समय वे या तो पढ़ रहे होते हैं या सो रहे होते हैं। लातूर में सफलता का यही एक सीक्रेट है — फोकस।
इस डिजिटल डिटॉक्स का असर बच्चों की पढ़ाई पर भी दिखता है। लातूर के छात्र आज भी ग्रुप स्टडी (Group Study) पर बहुत भरोसा करते हैं। शाम के समय हॉस्टलों के कॉमन रूम में 4-4, 5-5 बच्चों के ग्रुप बैठकर एक-दूसरे के डाउट्स क्लियर करते नजर आते हैं। यह दृश्य कोटा जैसे शहरों से बिल्कुल अलग है, जहां हर बच्चा अपने कमरे में अकेला, एक द्वीप की तरह जी रहा है।
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क्या खो गया लातूर पैटर्न का वह पुराना अध्यात्म?
पहले यहां व्यावसायिकता नहीं थी, एक मिशन था। शिक्षकों को पता होता था कि उनके क्लास के आखिरी बेंच पर बैठे बच्चे के घर की माली हालत क्या है। आज जब बड़ी-बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों ने यहां पैर पसारे हैं, तो व्यक्तिगत जुड़ाव थोड़ा कम हुआ है।
इसके बावजूद, लातूर की मिट्टी में कुछ ऐसा है जो इसे टूटने नहीं देता। यहां के बच्चे आज भी जानते हैं कि उनके लिए शिक्षा कोई शौक नहीं, बल्कि गरीबी के दलदल से बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता है। लातूर के बाहरी इलाके से आई एक छात्रा प्रणिता कहती है, मेरे पिता किसान हैं। हमारे यहां पानी की भारी किल्लत है। खेती से घर नहीं चल सकता। मेरे पास सिर्फ यह किताबें ही हैं। अगर मैं इस साल NEET क्रैक नहीं कर पाई, तो मेरे पास कोई प्लान-बी नहीं है।
अनिश्चित भविष्य और उम्मीद की आखिरी किरण
लातूर आज एक दोराहे पर खड़ा है। एक तरफ उसका गौरवशाली अतीत और उसकी खुद की बनाई मानवीय शिक्षण पद्धति है, तो दूसरी तरफ आधुनिक कोचिंग इंडस्ट्री की अंधी दौड़ और उसके साथ आने वाली विकृतियां। यह शहर इस बात का गवाह है कि कैसे भारत के छोटे शहरों के बच्चे अपनी आंखों में आसमान समेटे हुए संघर्ष करते हैं।
विवादों के इस दौर में भी लातूर की ये चमकती खिड़कियां इस बात का सुबूत हैं कि जब तक देश में प्रणिता और सुखवीर जैसे बच्चे अपनी किस्मत बदलने के लिए रातों को जागने को तैयार हैं, तब तक इस देश के लर्निंग हब्स की प्रासंगिकता कभी खत्म नहीं होगी। जरूरत सिर्फ इतनी है कि देश का सिस्टम इन बच्चों के भरोसे और मेहनत के साथ न्याय करना सीख ले।
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