मोदी के मास्टर स्ट्रोक से क्यों नाराज हैं दक्षिण के धुरंधर, लोकसभा की 850 सीटें हुईं तो क्या बदलेगा?
5 प्वाइंट में समझें क्या है पूरा मामला
- केंद्र सरकार ने लोकसभा सीटें 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव दिया है।
- 2011 की जनगणना को आधार बनाने से दक्षिणी राज्यों की सीटें घटेंगी।
- तमिलनाडु को 11 और केरल को 8 लोकसभा सीटें गंवानी पड़ सकती हैं।
- उत्तर प्रदेश को 13 अतिरिक्त सीटें मिलने का अनुमान है।
- दक्षिण के चार मुख्यमंत्रियों ने इसे संघवाद पर हमला बताया है।
लोकसभा में 850 सीटें क्यों?
भारत की संसद में एक बड़ा बदलाव आने वाला है। केंद्र सरकार ने लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव रखा है। इसके लिए संविधान (131वां संशोधन) विधेयक और परिसीमन (Delimitation) विधेयक के ड्राफ्ट जारी किए गए हैं। 16-17 अप्रैल 2026 के विशेष संसद सत्र में ये विधेयक पेश होने की योजना है।
सरकार का आधिकारिक उद्देश्य महिला आरक्षण अधिनियम (Women Reservation Act), 2023 को लागू करना है। इस कानून को पहले से परिसीमन से जोड़ा गया था। इसलिए बिना परिसीमन के महिला आरक्षण लागू नहीं हो सकता। लेकिन इसी विधेयक में एक और बड़ा प्रावधान छिपा है, जो दक्षिण भारत को सबसे ज्यादा चुभ रहा है।
1971 से 2026 तक का सफर
भारत में लोकसभा सीटों का बंटवारा जनसंख्या के हिसाब से होता है। लेकिन 1971 की जनगणना के बाद इंदिरा गांधी सरकार ने एक खास फैसला किया था। उन्होंने तय किया कि सीटों की संख्या को "फ्रीज" यानी स्थिर रखा जाएगा। मकसद यह था कि जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों को राजनीतिक नुकसान न उठाना पड़े।
साल 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने यह फ्रीज 2026 तक बढ़ा दिया। अनुच्छेद 82 (Article 82) के तहत यह व्यवस्था "2026 के बाद प्रकाशित पहली जनगणना तक" लागू रहनी थी। 2021 की जनगणना कोविड की वजह से अभी तक अटकी हुई है। इसलिए मोदी सरकार 2011 के आंकड़ों को आधार बना रही है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना और पंजाब ने इस फ्रीज को 25 और साल बढ़ाने की मांग की थी, लेकिन केंद्र ने उस मांग को अनसुना कर दिया।
दक्षिण को क्या होगा नुकसान?
यह समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा। 1971 के बाद से देश की जनसंख्या का नक्शा बदल गया है। उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान जैसे हिंदी भाषी राज्यों में आबादी तेजी से बढ़ी। वहीं, दक्षिणी राज्यों ने परिवार नियोजन (Family Planning) के कार्यक्रम बेहद सफलतापूर्वक लागू किए।
अभी 543 सीटों में दक्षिण भारत की हिस्सेदारी 24.3 फीसदी है। 2011 की जनगणना के हिसाब से 850 सीटें बंटीं, तो यह हिस्सेदारी घटकर 20.7 फीसदी रह जाएगी। दूसरी तरफ हिंदी हार्टलैंड (Hindi Heartland) की हिस्सेदारी 38.1 से बढ़कर 43.1 फीसदी हो जाएगी।
2019 की एक रिसर्च के अनुमान और चौंकाने वाले हैं। उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 14.73 फीसदी से बढ़कर 16.24 फीसदी होगी। केरल की 3.68 से घटकर 2.7 फीसदी और तमिलनाडु की 7.18 से घटकर 5.88 फीसदी रह जाएगी। अभी पांचों दक्षिणी राज्यों के पास कुल 129 सीटें (Lok Sabha seats) हैं। इनमें तमिलनाडु की 39, कर्नाटक की 28, आंध्र प्रदेश की 25, केरल की 20 और तेलंगाना की 17 सीटें शामिल हैं।
सरकार और विपक्ष क्या कह रहे हैं?
केंद्र सरकार का कहना है कि यह कदम महिला आरक्षण लागू करने के लिए जरूरी है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने साफ कहा है कि किसी भी दक्षिणी राज्य की मौजूदा सीटें नहीं घटेंगी। प्रस्तावित संशोधन के तहत महिलाओं के लिए करीब 273 सीटें आरक्षित होंगी। अनुसूचित जाति (SC) की सीटें 84 से बढ़कर 136 और अनुसूचित जनजाति (ST) की 47 से बढ़कर 70 होने की बात है। सरकार का तर्क है कि जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है।
लेकिन विपक्ष इस दलील से बिल्कुल सहमत नहीं है। कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी का कहना है कि विधेयकों में कहीं भी यह लिखित गारंटी नहीं है कि राज्यों के सीट-अनुपात में बदलाव नहीं होगा। पार्टी ने इसे महिला आरक्षण की आड़ में उत्तर-दक्षिण असंतुलन को हवा देने की कोशिश बताया है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इसे भारत को बांटने की कोशिश करार दिया है।
दक्षिण के नेता क्यों भड़के?
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने इस प्रस्ताव को केंद्र की साजिश बताया। उन्होंने पूरे राज्य में काला झंडा आंदोलन का ऐलान किया। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने एक अलग रास्ता सुझाया। उन्होंने कहा कि आधी सीटें जनसंख्या के आधार पर और आधी आर्थिक प्रदर्शन के आधार पर बांटी जाएं। केरल के पिनाराई विजयन और कर्नाटक के सिद्धारमैया ने भी कड़ा एतराज जताया है।
CPI (M) (Communist Party of India- Marxist) सांसद जॉन ब्रिटास ने तो इसे सीधे "संघीय भारत के लिए मौत का वारंट" कह दिया। संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि बिना बहुदलीय परामर्श और संसदीय समिति को भेजे इतने बड़े विधेयक लाना लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ है।
NDA में भी सब एक नहीं
खास बात यह है कि एनडीए (National Democratic Alliance) के अंदर भी सहमति नहीं है। सरकार की सहयोगी तेलुगू देशम पार्टी (TDP) ने परिसीमन में निष्पक्षता की मांग की है। हालांकि उसने केंद्र से सीधा टकराव टालने की कोशिश की है। तेलंगाना की विपक्षी पार्टी BRS (Bharat Rashtra Samithi) ने चेतावनी दी है कि यह दक्षिण भारत में बड़े जनआंदोलन को जन्म दे सकता है।
आगे क्या होगा?
अल्पकालिक तौर पर संसद में गतिरोध लगभग तय है। दक्षिण के राज्य सड़क पर उतरने की तैयारी में हैं। विधेयकों को बिना संसदीय समिति के पारित करना आसान नहीं होगा क्योंकि विपक्ष एकजुट दिख रहा है। भाजपा के लिए दक्षिण में पहले से सीमित पकड़ और कमजोर हो सकती है।
दीर्घकालिक नजरिए से देखें तो तस्वीर और भी जटिल है। अगर यह कानून बन गया, तो दक्षिण भारत की राजनीतिक ताकत स्थायी रूप से कमजोर हो जाएगी। नीति-निर्माण में उत्तर भारत का दबदबा बढ़ेगा और केंद्र-राज्य संबंधों (Centre-State Relations) में नई दरारें पड़ेंगी। तमिलनाडु में DMK (Dravida Munnetra Kazhagam) इसे द्रविड़ पहचान की राजनीति में बदल रही है।
अगर आप दक्षिण भारत के मतदाता हैं, तो आपके एक सांसद पर जनसंख्या का बोझ और बढ़ेगा। यानी संसद में आपकी आवाज और कमजोर होगी। उत्तर भारत के मतदाताओं को ज्यादा प्रतिनिधित्व मिलेगा, इसलिए उनके इलाके की मांगें केंद्र में ज्यादा सुनी जाएंगी। विपक्ष का सवाल यह है कि कोई सीट नहीं कटेगी का आश्वासन काफी नहीं। असली सवाल यह है कि नई सीटों का बंटवारा किस अनुपात में होगा।
यह खबर क्यों जरूरी है?
यह खबर भारतीय संविधान की बुनियादी संरचना से जुड़ी है। लोकसभा सीटों का परिसीमन और उनकी संख्या में बदलाव सीधे तौर पर नागरिकों के मताधिकार को प्रभावित करता है। भारत का संविधान हर नागरिक को समान राजनीतिक प्रतिनिधित्व की गारंटी देता है। यह खबर इसलिए अहम है क्योंकि इससे दक्षिणी राज्यों के करोड़ों मतदाताओं का संसद में प्रतिनिधित्व घट सकता है, जबकि इन राज्यों ने देश की जनसंख्या नीति का ईमानदारी से पालन किया है। यह संघवाद, न्याय और लोकतांत्रिक समानता के सवाल उठाती है।
FAQ
- लोकसभा सीटें 543 से 850 क्यों की जा रही हैं और इसका आधार क्या है?
केंद्र सरकार ने संविधान (131वां संशोधन) विधेयक के जरिए लोकसभा सीटें 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 करने का प्रस्ताव दिया है। इसमें 815 सीटें राज्यों के लिए और 35 केंद्रशासित प्रदेशों के लिए होंगी। इसका मुख्य आधार 2011 की जनगणना को बनाया जा रहा है क्योंकि 2021 की जनगणना कोविड महामारी की वजह से अभी तक नहीं हो पाई है। सरकार का कहना है कि यह कदम महिला आरक्षण अधिनियम 2023 को लागू करने के लिए जरूरी है क्योंकि वह कानून परिसीमन से जुड़ा हुआ है। - दक्षिण भारतीय राज्यों को इस परिसीमन से क्या नुकसान होगा?
2011 की जनगणना को आधार बनाने पर दक्षिणी राज्यों की लोकसभा में हिस्सेदारी 24.3 फीसदी से घटकर 20.7 फीसदी रह जाएगी। अनुमान है कि तमिलनाडु को करीब 11 और केरल को 8 सीटें गंवानी पड़ सकती हैं। दरअसल, दक्षिणी राज्यों ने दशकों पहले परिवार नियोजन कार्यक्रम सफलतापूर्वक लागू किए, जिससे उनकी जनसंख्या वृद्धि धीमी रही। अब उसी कम जनसंख्या के आधार पर उन्हें संसद में कम प्रतिनिधित्व मिलेगा, जबकि अधिक आबादी वाले उत्तरी राज्यों को ज्यादा सीटें मिलेंगी। - क्या अमित शाह का यह आश्वासन सच है कि दक्षिणी राज्यों की कोई सीट नहीं घटेगी?
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि किसी भी दक्षिणी राज्य की मौजूदा सीटें नहीं घटेंगी। यानी तमिलनाडु की 39, केरल की 20 और अन्य दक्षिणी राज्यों की मौजूदा सीटें बरकरार रहेंगी। लेकिन विपक्ष का तर्क है कि असली सवाल यह नहीं है। सवाल यह है कि 850 सीटों के नए बंटवारे में दक्षिणी राज्यों की कुल हिस्सेदारी का अनुपात घट जाएगा। कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी के मुताबिक विधेयकों में कोई लिखित गारंटी नहीं है कि राज्यों के सीट-अनुपात में कोई बदलाव नहीं होगा।
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