विचार मंथन: महिला आरक्षण नहीं, परिसीमन है असली मुद्दा, सोनिया गांधी, कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष
The Sootr | Apr 13, 2026, 13:09 IST
sonia gandhi attack central govt women reservation
सरकार के विशेष सत्र पर घमासान शुरू हो गया है। महिला आरक्षण में देरी, जनगणना को टालने और जातिगत जनगणना पर प्रधानमंत्री के बदलते स्टैंड को लेकर कांग्रेस सांसद सोनिया गांधी ने अब मोदी सरकार पर निशाना साधा है।
कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने एक लेख के जरिए सोमवार 13 अप्रैल को मोदी सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि विशेष सत्र का असली मुद्दा महिला आरक्षण नहीं, बल्कि परिसीमन है। उन्होंने इस प्रस्ताव को खतरनाक और संविधान पर हमला बताया। सोनिया ने जोर दिया कि लोकसभा सीटें बढ़ाने वाला परिसीमन केवल गणितीय नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से भी न्यायसंगत होना चाहिए।
प्रधानमंत्री विपक्षी दलों से अपील कर रहे हैं कि वे उन विधेयकों का समर्थन करें, जिन्हें सरकार संसद के एक विशेष सत्र में जबरदस्ती पास कराना चाहती है। यह तब हो रहा है जब तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार अपने चरम पर है।
इस असाधारण जल्दबाजी की एक ही वजह हो सकती है- राजनीतिक फायदा उठाना और विपक्ष को बचाव की मुद्रा में डालना। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हमेशा की तरह सच्चाई से आंखें चुरा रहे हैं।
![असल मुद्दा महिलाओं के लिए आरक्षण नहीं, बल्कि परिसीमन है: सोनिया गांधी - the real issue is not reservation for women but delimitation sonia gandhi-mobile]()
संसद ने सितंबर 2023 के विशेष सत्र में सर्वसम्मति से नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 पारित किया। इस अधिनियम में संविधान में अनुच्छेद 334-A जोड़ा गया, जो लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करता है। लेकिन यह आरक्षण तभी लागू होगा जब अगली जनगणना और उस पर आधारित परिसीमन प्रक्रिया पूरी होगी।
इस पर राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने जोरदार मांग की थी कि यह आरक्षण 2024 के लोकसभा चुनावों से ही लागू किया जाए, लेकिन सरकार ने यह नहीं माना। अब बताया जा रहा है कि अनुच्छेद 334-A में संशोधन करके महिला आरक्षण को 2029 से लागू किया जाएगा। अब सवाल यह है- प्रधानमंत्री को यह यू-टर्न लेने में 30 महीने क्यों लगे? और अब कुछ ही हफ्तों में विशेष सत्र बुलाने की क्या जरूरत है?
विपक्षी नेताओं ने सरकार को एक नहीं, तीन बार पत्र लिखकर यह मांग की कि पश्चिम बंगाल में चुनाव का अंतिम चरण समाप्त होने के बाद, 29 अप्रैल को एक सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए। लेकिन इस उचित मांग को ठुकरा दिया गया।
इसके बजाय प्रधानमंत्री अखबारों में लेख लिखने, राजनीतिक दलों से अपीलें करने और सम्मेलन आयोजित करने में लगे हैं। यह प्रधानमंत्री की अहंकारी कार्यशैली को दर्शाने वाली एक पिछले दरवाजे की रणनीति है।
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73वें और 74वें संविधान संशोधन विधेयक अप्रैल 1993 और जून 1993 में संसद में पारित हुए थे। इन विधेयकों पर करीब पांच साल तक चर्चा और बहस हुई, जिसके बाद पंचायतों और नगर पालिकाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण कानून बना। यह स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी की एक असाधारण उपलब्धि थी।
आज ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों में लगभग 15 लाख निर्वाचित महिला प्रतिनिधि हैं, जो कुल प्रतिनिधियों का 40% से अधिक है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 इसी उपलब्धि की नींव पर खड़ा है।
हर दस साल में होने वाली जनगणना 2021 में होनी थी, लेकिन मोदी सरकार इसे टालती रही। इसका एक नतीजा यह हुआ कि 10 करोड़ से अधिक लोग राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के तहत अपने कानूनी हकों से वंचित हो गए, जो प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना का आधार है।
जनगणना कार्य पांच साल की अकारण देरी के बाद अब शुरू हुआ है। सरकार गर्व से दावा कर रही है कि यह डिजिटल जनगणना है और इसकी डिजिटल प्रकृति के कारण अधिकांश जनसंख्या गणना के आंकड़े 2027 तक उपलब्ध हो जाएंगे। ऐसे में इस सत्र को बुलाने और परिसीमन करने की जल्दबाजी बेमानी है।
करीब एक साल पहले प्रधानमंत्री ने 2027 की जनगणना को जातिगत जनगणना के रूप में कराने की घोषणा की थी। यह फैसला तब आया जब वे पहले ही सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर इसका विरोध कर चुके थे। इसके साथ ही उन्होंने पूर्व में संसद के भीतर भी जातिगत जनगणना की मांग को स्पष्ट रूप से नकार दिया था।
यहां तक कि जब कांग्रेस नेता जातिगत जनगणना की मांग कर रहे थे, तो प्रधानमंत्री ने इसे शहरी नक्सल मानसिकता कहकर खारिज किया था। बिहार और तेलंगाना अपने-अपने राज्यों में व्यापक जातिगत सर्वेक्षण करा चुके हैं और इसमें छह महीने से अधिक नहीं लगे।
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विशेष सत्र 16 अप्रैल से शुरू होने वाला है। अब तक सरकार ने सांसदों के साथ कोई आधिकारिक प्रस्ताव साझा नहीं किया है कि वह सत्र में वास्तव में क्या पास कराना चाहती है। ऐसा लगता है कि परिसीमन के लिए कोई फॉर्मूला सुझाया जा रहा है।
किसी भी परिसीमन से पहले जनगणना होना जरूरी है- जैसा पहले भी होता आया है। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि लोकसभा की सीटें बढ़ाने वाला कोई भी परिसीमन सिर्फ संख्यात्मक नहीं, बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी न्यायसंगत होना चाहिए।
परिवार नियोजन में अग्रणी और छोटे राज्यों को पूर्ण या आपेक्षिक नुकसान में नहीं डाला जाना चाहिए। आनुपातिक वृद्धि से वास्तव में सापेक्षिक प्रभाव का नुकसान हो सकता है, क्योंकि पूर्ण संख्या का अंतर और बढ़ जाता है।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 में आरक्षण के भीतर आरक्षण का प्रावधान है। इसका अर्थ है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित एक-तिहाई सीटें भी महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
सितंबर 2023 की बहस में राज्यसभा में विपक्ष के नेताओं ने मांग की थी कि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की महिलाओं को भी आरक्षण मिलना चाहिए। OBC के लिए उच्च शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण पहले से लागू है।
मानसून सत्र मध्य जुलाई में शुरू होगा। अगर सरकार 29 अप्रैल के बाद सर्वदलीय बैठक बुलाए, अपने प्रस्तावों पर सार्वजनिक बहस का मौका दे और फिर मानसून सत्र में संविधान संशोधन विधेयक लाए तो कोई आसमान नहीं टूटेगा।
इस जल्दबाजी में अत्यंत दूरगामी संवैधानिक बदलाव थोपने का कोई औचित्य नहीं है। सिवाय इसके कि मुश्किल वक्त में कहानी को दूसरी दिशा में मोड़ा जाए। यह प्रक्रिया गहरे रूप से त्रुटिपूर्ण और अलोकतांत्रिक है। दरअसल, महिला आरक्षण यहां असली मुद्दा नहीं है, वह तो पहले ही तय हो चुका है।
NOTE: (इस लेख में लेखक के निजी विचार हैं।)
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प्रधानमंत्री विपक्षी दलों से अपील कर रहे हैं कि वे उन विधेयकों का समर्थन करें, जिन्हें सरकार संसद के एक विशेष सत्र में जबरदस्ती पास कराना चाहती है। यह तब हो रहा है जब तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार अपने चरम पर है।
इस असाधारण जल्दबाजी की एक ही वजह हो सकती है- राजनीतिक फायदा उठाना और विपक्ष को बचाव की मुद्रा में डालना। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हमेशा की तरह सच्चाई से आंखें चुरा रहे हैं।
असल मुद्दा महिलाओं के लिए आरक्षण नहीं, बल्कि परिसीमन है: सोनिया गांधी - the real issue is not reservation for women but delimitation sonia gandhi-mobile
नारी शक्ति वंदन अधिनियम की असलियत
इस पर राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने जोरदार मांग की थी कि यह आरक्षण 2024 के लोकसभा चुनावों से ही लागू किया जाए, लेकिन सरकार ने यह नहीं माना। अब बताया जा रहा है कि अनुच्छेद 334-A में संशोधन करके महिला आरक्षण को 2029 से लागू किया जाएगा। अब सवाल यह है- प्रधानमंत्री को यह यू-टर्न लेने में 30 महीने क्यों लगे? और अब कुछ ही हफ्तों में विशेष सत्र बुलाने की क्या जरूरत है?
विपक्षी नेताओं ने सरकार को एक नहीं, तीन बार पत्र लिखकर यह मांग की कि पश्चिम बंगाल में चुनाव का अंतिम चरण समाप्त होने के बाद, 29 अप्रैल को एक सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए। लेकिन इस उचित मांग को ठुकरा दिया गया।
इसके बजाय प्रधानमंत्री अखबारों में लेख लिखने, राजनीतिक दलों से अपीलें करने और सम्मेलन आयोजित करने में लगे हैं। यह प्रधानमंत्री की अहंकारी कार्यशैली को दर्शाने वाली एक पिछले दरवाजे की रणनीति है।
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महिला आरक्षण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
आज ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों में लगभग 15 लाख निर्वाचित महिला प्रतिनिधि हैं, जो कुल प्रतिनिधियों का 40% से अधिक है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 इसी उपलब्धि की नींव पर खड़ा है।
जनगणना में जानबूझकर देरी
जनगणना कार्य पांच साल की अकारण देरी के बाद अब शुरू हुआ है। सरकार गर्व से दावा कर रही है कि यह डिजिटल जनगणना है और इसकी डिजिटल प्रकृति के कारण अधिकांश जनसंख्या गणना के आंकड़े 2027 तक उपलब्ध हो जाएंगे। ऐसे में इस सत्र को बुलाने और परिसीमन करने की जल्दबाजी बेमानी है।
करीब एक साल पहले प्रधानमंत्री ने 2027 की जनगणना को जातिगत जनगणना के रूप में कराने की घोषणा की थी। यह फैसला तब आया जब वे पहले ही सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर इसका विरोध कर चुके थे। इसके साथ ही उन्होंने पूर्व में संसद के भीतर भी जातिगत जनगणना की मांग को स्पष्ट रूप से नकार दिया था।
यहां तक कि जब कांग्रेस नेता जातिगत जनगणना की मांग कर रहे थे, तो प्रधानमंत्री ने इसे शहरी नक्सल मानसिकता कहकर खारिज किया था। बिहार और तेलंगाना अपने-अपने राज्यों में व्यापक जातिगत सर्वेक्षण करा चुके हैं और इसमें छह महीने से अधिक नहीं लगे।
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परिसीमन पर सावधानी जरूरी है
किसी भी परिसीमन से पहले जनगणना होना जरूरी है- जैसा पहले भी होता आया है। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि लोकसभा की सीटें बढ़ाने वाला कोई भी परिसीमन सिर्फ संख्यात्मक नहीं, बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी न्यायसंगत होना चाहिए।
परिवार नियोजन में अग्रणी और छोटे राज्यों को पूर्ण या आपेक्षिक नुकसान में नहीं डाला जाना चाहिए। आनुपातिक वृद्धि से वास्तव में सापेक्षिक प्रभाव का नुकसान हो सकता है, क्योंकि पूर्ण संख्या का अंतर और बढ़ जाता है।
सोच-समझकर फैसला करने की जरूरत
सितंबर 2023 की बहस में राज्यसभा में विपक्ष के नेताओं ने मांग की थी कि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की महिलाओं को भी आरक्षण मिलना चाहिए। OBC के लिए उच्च शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण पहले से लागू है।
मानसून सत्र मध्य जुलाई में शुरू होगा। अगर सरकार 29 अप्रैल के बाद सर्वदलीय बैठक बुलाए, अपने प्रस्तावों पर सार्वजनिक बहस का मौका दे और फिर मानसून सत्र में संविधान संशोधन विधेयक लाए तो कोई आसमान नहीं टूटेगा।
इस जल्दबाजी में अत्यंत दूरगामी संवैधानिक बदलाव थोपने का कोई औचित्य नहीं है। सिवाय इसके कि मुश्किल वक्त में कहानी को दूसरी दिशा में मोड़ा जाए। यह प्रक्रिया गहरे रूप से त्रुटिपूर्ण और अलोकतांत्रिक है। दरअसल, महिला आरक्षण यहां असली मुद्दा नहीं है, वह तो पहले ही तय हो चुका है।
NOTE: (इस लेख में लेखक के निजी विचार हैं।)
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