एनसीआरबी 2024ः हेट स्पीच डेटा गैप से NCRB के आंकड़ों की तस्वीर अधूरी
एनसीआरबी 2024 रिपोर्ट में हेट स्पीच का कोई अलग कॉलम नहीं है। साइबर क्राइम के आंकड़े मौजूद हैं, पर हेट स्पीच अलग से नहीं गिना जाता। कानून है, पर पुलिस केस सिर्फ धारा के आधार पर दर्ज करती है।
ऑनलाइन और ऑफलाइन नफरत के मामलों में कोई फर्क दर्ज नहीं होता। यही डेटा गैप नीति बनाने और सजा दिलाने में सबसे बड़ी बाधा है।
व्हाट्सऐप पर एक झूठा मैसेज घूमता है। कुछ घंटों में हजार बार फॉरवर्ड होता है। कहीं तनाव फैलता है, कहीं पुलिस को सड़कों पर उतरना पड़ता है। लेकिन साल के अंत में बड़ा क्राइम डेटाबेस बनता है। उसमें यह घटना दर्ज ही नहीं होती। कम से कम हेट स्पीच के नाम से तो नहीं।
ऐसे समय में जबकि Hate Speech के मामले गंभीर मुद्दा बन चुके हैं, इसका विधिवत रिकार्ड न होना बड़ी चिंता बन सकती है।
साइबर क्राइम के आंकड़े
एनसीआरबी की 2024 रिपोर्ट के मुताबिक साइबर क्राइम के कुल एक लाख एक हजार 928 मामले दर्ज हुए। यह संख्या 2023 से करीब 17.9% ज्यादा है। पहली बार यह आंकड़ा एक लाख के पार गया है।
इनमें सबसे बड़ी वजह धोखाधड़ी रही, करीब 72 से 73% मामलों में। सेक्सुअल एक्सप्लॉइटेशन का हिस्सा लगभग 3.1% रहा। एक्सटॉर्शन यानी जबरन उगाही का हिस्सा करीब 2.5% रहा।
लेकिन बाकी बचे हिस्से में भी हेट स्पीच का कोई जिक्र नहीं है। न कम्युनल हैट्रेड के नाम से, न हेट स्पीच के नाम से। रिपोर्ट सिर्फ फ्रॉड, एक्सप्लॉइटेशन और एक्सटॉर्शन जैसे मोटिव तक सीमित है।
कानून है, पर छिपा हुआ है
हेट स्पीच का डेटा न होने का मतलब यह नहीं कि कानून नहीं है। भारतीय न्याय संहिता, बीएनएस (BNS – Bharatiya Nyaya Sanhita) की धारा 196 अहम है। यह पहले आईपीसी (IPC – Indian Penal Code) की धारा 153A थी। यह धर्म, जाति या भाषा के आधार पर दुश्मनी फैलाने को अपराध मानती है। बीएनएस की धारा 299 पहले आईपीसी की धारा 295A थी। यह धार्मिक भावनाएं आहत करने पर लागू होती है।
लेकिन एनसीआरबी इन मामलों को साइबर क्राइम में नहीं गिनता। इन्हें पब्लिक ट्रैंक्विलिटी के खिलाफ अपराध नाम की अलग कैटेगरी में रखा जाता है। यह डेटा यह भी नहीं बताता कि अपराध ऑनलाइन हुआ या ऑफलाइन।
असली समस्या: वर्गीकरण
एनसीआरबी का डेटा एफआईआर (FIR – First Information Report) की धारा पर आधारित है। यह मोटिव या माध्यम के आधार पर काम नहीं करता। पुलिस धारा 196 या 353 दर्ज करती है। पर प्लेटफॉर्म का नाम कहीं दर्ज नहीं होता।
सरकार साइबर क्राइम को अलग खतरा मानती है, इसीलिए इसकी अलग टेबल है। पर हेट स्पीच के लिए ऐसा वर्गीकरण अब तक नहीं बना। तीन वजहें साफ हैं। मोटिव कैटेगरी की कमी, धारा-आधारित रिकॉर्डिंग और प्लेटफॉर्म डेटा का न जुड़ना।
डेटा गैप का असली असर
जो समस्या मापी नहीं जाती, उसके लिए बजट नहीं बनता। न पॉलिसी बनती है, न जवाबदेही तय होती है। डिजिटल हेट स्पीच कई बार सामुदायिक तनाव और मॉब वायलेंस तक पहुंच जाती है।
तहसीन पूनावाला मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में आदेश दिया था। राज्यों को नोडल अफसर नियुक्त करने को कहा गया था। पर बुनियादी डेटा के बिना नोडल अफसर काम कैसे करेंगे? धारा 153A में सजा दर बहुत कम बताई जाती है, करीब 20%। यह आंकड़ा अभी एनसीआरबी के मूल डेटा से पूरी तरह वेरीफाई नहीं हुआ है।
कम सजा दर का मतलब है सबूत जुटाने में कमजोरी। स्क्रीनशॉट, मेटाडेटा और आईपी लॉग जैसे डिजिटल सबूत अदालत में टिक नहीं पाते।
दुनिया कैसे निपट रही है
जर्मनी का नेटवर्क एनफोर्समेंट एक्ट सख्त है। यह प्लेटफॉर्म्स को 24 घंटे में हेट स्पीच हटाने को कहता है। न हटाने पर भारी जुर्माना लगता है। यूरोपीय संघ का डिजिटल सर्विसेज एक्ट भी प्लेटफॉर्म्स से सालाना रिपोर्टिंग मांगता है।
भारत में आईटी रूल्स 2021 शिकायत अधिकारी रखने को कहते हैं। पर केंद्रीकृत हेट स्पीच डेटा का कोई तंत्र अब तक नहीं बना।
समाधान की संभावना
एनसीआरबी चाहे तो मौजूदा टेबल में एक नई मोटिव कैटेगरी जोड़ सकता है। एफआईआर दर्ज करते वक्त प्लेटफॉर्म का नाम भी जोड़ा जा सकता है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में साइबर क्राइम सेल पहले से मौजूद हैं। इन्हें टैगिंग सिस्टम मिले तो राज्य स्तर पर तस्वीर साफ हो सकती है।
सीसीटीएनएस (CCTNS – Crime and Criminal Tracking Network and Systems) एक बड़ा नेटवर्क है। यह पंद्रह हजार से ज्यादा थानों को पहले से जोड़ता है। इसमें नया फील्ड जोड़ना बड़ा तकनीकी काम नहीं है। यह सिर्फ प्रशासनिक इच्छाशक्ति का सवाल है।
एक जरूरी तथ्य
ज्यादातर लोग मानते हैं कि हेट स्पीच पर कानून कमजोर है। असल में कानून पहले से ज्यादा मजबूत हुआ है। बीएनएस की धाराएं अब इलेक्ट्रॉनिक कम्युनिकेशन तक साफ लागू होती हैं। समस्या कानून में नहीं, नजर रखने के तरीके में है।
आगे क्या होगा
अगर एनसीआरबी अगली रिपोर्ट में अलग वर्गीकरण जोड़ता है, तो यह बड़ा बदलाव होगा। इससे पता चलेगा कि कितनी नफरत ऑनलाइन शुरू होती है। यह भी पता चलेगा कि किन राज्यों में समस्या ज्यादा गंभीर है।
जब तक यह वर्गीकरण नहीं बनता, नीति बनाने वाले अंदाजों पर निर्भर रहेंगे। और अंदाजों पर बनी नीति अक्सर अधूरी साबित होती है।
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