परीक्षा से रोजगार तक... युवा के टूटते भरोसे की असली कहानी
भारत में जब भी युवा सड़कों पर उतरते हैं, सरकारें अक्सर उनके आंदोलन को किसी एक घटना, किसी एक परीक्षा या किसी एक राजनीतिक दल के चश्मे से देखने की भूल करती हैं। आंदोलन के पीछे छिपी बेचैनी को समझने के बजाए उसकी तत्काल वजह को समझ लेना आसान होता है। कभी किसी परीक्षा का पेपर लीक होता है, कभी रिजल्ट में गड़बड़ी का आरोप लगता है, कभी आरक्षण को लेकर विवाद खड़ा होता है और कभी भर्ती परीक्षा की प्रक्रिया वर्षों तक पूरी नहीं हो पाती। इन सभी घटनाओं को अलग-अलग समस्याओं की तरह देखा जाता है, लेकिन असल सवाल यह है कि क्या ये वास्तव में अलग-अलग घटनाएं हैं? शायद नहीं। दरअसल, देश के एक बड़े हिस्से का युवा जिस संकट से गुजर रहा है, वह किसी एक परीक्षा का संकट नहीं है। यह उस भविष्य का संकट है, जिसके लिए वह वर्षों तक मेहनत करता है, जिसके लिए परिवार अपनी जमा पूंजी खर्च करता है और जिसके लिए माता-पिता अपनी इच्छाओं तक को कुर्बान कर देते हैं। यह उस व्यवस्था पर भरोसे का संकट है, जिसमें सफलता का रास्ता लगातार लंबा, महंगा और अनिश्चित होता जा रहा है।
NEET जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर उठे सवालों ने इस असंतोष को आवाज जरूर दी है, लेकिन इसकी जड़ें कहीं ज्यादा गहरी हैं। यह उन लाखों छात्रों की बेचैनी है, जिन्हें लगता है कि वे जितनी मेहनत कर रहे हैं, उसके अनुपात में उनके सामने अवसर नहीं बढ़ रहे। यह उन परिवारों की चिंता है, जो बच्चों की शिक्षा पर लाखों रुपए खर्च करने के बावजूद यह सुनिश्चित नहीं कर पा रहे कि उन्हें एक सम्मानजनक करियर मिलेगा ही। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस बेचैनी को केवल विपक्षी राजनीति या किसी एक विचारधारा के समर्थन से जोड़कर खारिज नहीं किया जा सकता। असंतोष का भूगोल राजनीति से कहीं बड़ा होता है।
एक परीक्षा के पीछे छिपी हजारों कहानियां
भारत में प्रतियोगी परीक्षा केवल परीक्षा नहीं होती। यह करोड़ों परिवारों के लिए सामाजिक और आर्थिक तरक्की का सबसे बड़ा रास्ता होती है। एक मध्यमवर्गीय परिवार का बच्चा जब डॉक्टर, इंजीनियर, सरकारी अधिकारी या किसी प्रतिष्ठित पेशे में जाने का सपना देखता है, तो उसके पीछे केवल उसका व्यक्तिगत सपना नहीं होता। उसमें पूरे परिवार की उम्मीदें जुड़ी होती हैं। एक बच्चा वर्षों तक पढ़ाई करता है और कोचिंग लेता है। परिवार अपनी जमा पूंजी खर्च करता है। कई बार माता-पिता कर्ज तक लेते हैं। छोटे शहरों और कस्बों से बच्चे बड़े शहरों में जाते हैं। कमरे का किराया, कोचिंग फीस, किताबें, टेस्ट सीरीज और दूसरी सुविधाओं पर लगातार पैसा खर्च होता है। परिवार को उम्मीद रहती है कि यह निवेश एक दिन बच्चे के बेहतर भविष्य में बदल जाएगा। फिर परीक्षा आती है। छात्र अपनी पूरी तैयारी और वर्षों की मेहनत के साथ परीक्षा देता है, लेकिन इसके बाद यदि पेपर लीक, परीक्षा प्रक्रिया में गड़बड़ी, रिजल्ट विवाद या किसी अन्य तरह की अनिश्चितता सामने आती है तो छात्र को केवल एक परीक्षा में नुकसान नहीं होता। उसे लगता है कि उसके वर्षों के परिश्रम की कीमत ही नहीं रही। यही वह बिंदु है, जहां व्यक्तिगत निराशा धीरे-धीरे सामूहिक आक्रोश में बदलने लगती है। सरकारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे इस आक्रोश को केवल तत्काल राजनीतिक विरोध के रूप में न देखें। यदि एक परीक्षा खत्म होने के बाद भी असंतोष खत्म नहीं होता और अलग-अलग मुद्दों पर युवा बार-बार सड़कों पर आते हैं, तो इसका अर्थ है कि समस्या परीक्षा से आगे निकल चुकी है।
मध्यवर्गीय युवा सबसे ज्यादा बेचैन
भारत के सामाजिक ढांचे में मध्यवर्ग हमेशा से बदलाव का सबसे बड़ा वाहक रहा है। यह वर्ग न तो इतना गरीब है कि सरकारी सहायता पर पूरी तरह निर्भर हो और न ही इतना संपन्न कि शिक्षा और रोजगार की हर चुनौती को पैसे के दम पर हल कर सके। मध्यवर्ग अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देना चाहता है, प्रतियोगिता में शामिल होता है, टैक्स देता है और नियमों का पालन करता है। बदले में वह केवल एक चीज चाहता है केवल और केवल निष्पक्ष अवसर। यहीं से असंतोष पैदा होता है। जब उसे लगता है कि प्रवेश परीक्षाओं में पारदर्शिता नहीं है, सरकारी नौकरियों में भर्ती की प्रक्रिया वर्षों तक अटकी रहती है, निजी क्षेत्र में रोजगार की गुणवत्ता कमजोर है और शिक्षा लगातार महंगी होती जा रही है, तो उसके भीतर एक गहरी असुरक्षा पैदा होती है। यह असुरक्षा केवल छात्र की नहीं होती। यह उसके माता-पिता की भी होती है। आज का मध्यवर्गीय परिवार अपने बच्चे से कहता है कि पढ़ाई करो, मेहनत करो और आगे बढ़ो, लेकिन बच्चा जब पूछता है कि अगर मेहनत के बाद भी अवसर नहीं मिला तो क्या होगा, तब यह सवाल धीरे-धीरे केवल एक परिवार का सवाल नहीं रह जाता। यह पूरे समाज का सवाल बन जाता है। यही कारण है कि आज युवा केवल अपनी परीक्षा को लेकर चिंतित नहीं है। वह अपने पूरे भविष्य को लेकर आशंकित है।
NEET से आगे की कहानी
NEET विवाद ने एक महत्वपूर्ण बात सामने रखी है। प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता केवल प्रशासनिक विषय नहीं है, बल्कि यह सामाजिक विश्वास का सवाल है। जब लाखों बच्चे एक परीक्षा में बैठते हैं, तो उनके लिए परीक्षा का निष्पक्ष होना सबसे महत्वपूर्ण होता है। उन्हें यह भरोसा होना चाहिए कि प्रश्नपत्र सुरक्षित है, परीक्षा प्रक्रिया पारदर्शी है और परिणाम योग्यता के आधार पर आएगा, लेकिन जब परीक्षा प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं, तो समस्या केवल परीक्षा केंद्र तक सीमित नहीं रहती। इसके बाद सवाल उठता है कि क्या व्यवस्था वास्तव में प्रतिभा को अवसर दे रही है? क्या मेहनत करने वाला छात्र और संसाधनों से संपन्न छात्र एक ही मैदान पर खड़े हैं? क्या ग्रामीण और छोटे शहरों के छात्रों को भी वही अवसर मिल रहे हैं, जो बड़े कोचिंग हब में पढ़ने वाले छात्रों को मिलते हैं? और सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या शिक्षा अब प्रतिभा और मेहनत का रास्ता है या आर्थिक क्षमता का? इन सवालों का कोई आसान जवाब नहीं है, लेकिन इन्हें टालना भी संभव नहीं है। परीक्षा व्यवस्था पर भरोसा केवल छात्रों की सफलता के लिए जरूरी नहीं है। यह पूरे समाज को यह विश्वास दिलाने के लिए जरूरी है कि व्यवस्था में मेहनत और योग्यता का सम्मान होता है।
कोचिंग का कारोबार और सपनों की अर्थव्यवस्था
आज भारत में शिक्षा के आसपास एक विशाल कोचिंग उद्योग खड़ा हो चुका है। लाखों परिवार अपने बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोचिंग दिलाते हैं। बड़े शहरों में कोचिंग संस्थानों का पूरा इकोसिस्टम बन चुका है और छोटे शहरों के बच्चे भी अपने सपनों को पूरा करने के लिए इन केंद्रों की ओर देखते हैं, लेकिन इस व्यवस्था का एक दूसरा पहलू भी है। एक तरफ कुछ छात्रों को बेहतर तैयारी के अवसर मिलते हैं, वहीं दूसरी तरफ ऐसे परिवार भी हैं जिनके लिए महंगी कोचिंग फीस आर्थिक बोझ बन जाती है। एक छात्र की सफलता अब केवल उसकी मेहनत पर निर्भर नहीं रह गई है। उसके पास अच्छे शिक्षक हैं या नहीं, डिजिटल संसाधन हैं या नहीं, टेस्ट सीरीज की सुविधा है या नहीं और वह किस शहर में पढ़ रहा है...ये सभी कारक उसकी तैयारी को प्रभावित करते हैं। यानी प्रतियोगिता बढ़ रही है, लेकिन मैदान पूरी तरह बराबर नहीं है। यही कारण है कि जब किसी परीक्षा की प्रक्रिया पर सवाल उठता है, तो उसका असर केवल परीक्षा देने वाले छात्रों तक सीमित नहीं रहता। यह उस पूरी व्यवस्था पर सवाल बन जाता है, जिसमें लाखों परिवार अपने बच्चों का भविष्य दांव पर लगाते हैं।
आरक्षण का सवाल और बढ़ती बेचैनी
शिक्षा व्यवस्था से जुड़े विवादों में आरक्षण का मुद्दा भी लगातार सामने आता है। भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में आरक्षण सामाजिक न्याय का एक महत्वपूर्ण साधन रहा है, लेकिन इसके साथ-साथ सामान्य वर्ग और अन्य समुदायों के छात्रों के बीच अवसरों को लेकर असंतोष भी मौजूद है। यहां समस्या केवल आरक्षण नहीं है। असली समस्या यह है कि अवसरों की संख्या सीमित है और प्रतियोगिता लगातार बढ़ रही है। जब लाखों छात्र सीमित सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, तो हर वर्ग में असुरक्षा पैदा होती है। ऐसे में यदि सरकारें केवल एक समूह की नाराजगी को दूसरे समूह के खिलाफ खड़ा करके देखने लगती हैं, तो समस्या और जटिल हो जाती है। जरुरत इस बात की है कि अवसरों का विस्तार किया जाए। मेडिकल कॉलेज बढ़ें, सरकारी विश्वविद्यालय मजबूत हों, तकनीकी शिक्षा की गुणवत्ता बेहतर हो और रोजगार के नए अवसर पैदा हों। यदि अवसर बढ़ेंगे, तो प्रतियोगिता का तनाव भी कम होगा। यदि अवसर सीमित रहेंगे और प्रतियोगिता लगातार बढ़ती जाएगी, तो असंतोष स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा।
शिकायत नहीं सवाल है यह
जब छात्र आंदोलन करते हैं, तो सरकार अक्सर उनकी तत्काल मांग पर ध्यान देती है। कोई समिति बनती है, जांच का आदेश होता है, बयान जारी होते हैं और कुछ समय बाद मामला शांत हो जाता है। इससे क्या समस्या वास्तव में खत्म हो जाती है? शायद नहीं। अगली बार कोई दूसरा मुद्दा सामने आ जाता है। कहीं भर्ती परीक्षा का परिणाम अटक जाता है, कहीं पेपर लीक हो जाता है, कहीं नौकरी की उम्र निकल जाती है, कहीं परीक्षा का कैलेंडर बदल जाता है और कहीं फीस इतनी बढ़ जाती है कि गरीब और मध्यवर्गीय परिवार पीछे हटने लगते हैं। इसलिए समस्या किसी एक परीक्षा या एक मंत्रालय की नहीं है। यह शिक्षा, रोजगार और सामाजिक अवसरों की पूरी श्रृंखला से जुड़ी हुई है। सरकार को यह समझना होगा कि युवा केवल शिकायत नहीं कर रहा। वह अपने भविष्य को लेकर सवाल पूछ रहा है।
राजनीतिक मजबूरियां
जब युवा सड़कों पर उतरता है, तो राजनीतिक दलों के लिए उसमें अवसर दिखाई देता है। विपक्ष आंदोलन के समर्थन में आता है और सरकार आंदोलन के राजनीतिक चरित्र पर सवाल उठाती है। यह लोकतंत्र की सामान्य प्रक्रिया है। हर आंदोलन को राजनीति कहकर खारिज करना उतना ही गलत है, जितना हर आंदोलन को राजनीतिक परिवर्तन का संकेत मान लेना। सच्चाई दोनों के बीच कहीं है। राजनीतिक दल आंदोलन को अपने पक्ष में इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि आंदोलन के पीछे की समस्या नकली है। यदि हजारों युवा परीक्षा व्यवस्था को लेकर चिंतित हैं, तो उनकी चिंता वास्तविक है। यदि लाखों परिवार रोजगार को लेकर परेशान हैं, तो उनकी परेशानी वास्तविक है। यदि मध्यवर्गीय परिवार अपने बच्चों के भविष्य को लेकर आशंकित है, तो उस आशंका को केवल राजनीतिक साजिश बताकर खत्म नहीं किया जा सकता। राजनीति उस असंतोष को दिशा दे सकती है, लेकिन असंतोष पैदा नहीं करती। कम से कम हमेशा नहीं।
यह आंदोलन नहीं, पीढ़ियों के बीच बढ़ता तनाव
आज का युवा अपने माता-पिता से अलग दुनिया में बड़ा हुआ है। उसने इंटरनेट देखा है, दुनिया को करीब से देखा है, दूसरे देशों में उपलब्ध अवसरों को देखा है और सोशल मीडिया पर सफलता की कहानियां देखी हैं। इसी के साथ उसने बेरोजगारी, परीक्षा की अनिश्चितता और बढ़ती प्रतिस्पर्धा का दबाव भी महसूस किया है। इसलिए उसकी अपेक्षाएं भी बड़ी हैं। वह केवल नौकरी नहीं चाहता। वह सम्मानजनक नौकरी चाहता है। वह केवल डिग्री नहीं चाहता। वह डिग्री के बाद अवसर चाहता है। वह केवल परीक्षा नहीं देना चाहता। वह निष्पक्ष परीक्षा देना चाहता है। वह केवल सरकार से आश्वासन नहीं चाहता। वह परिणाम चाहता है। यही वजह है कि आज की युवा पीढ़ी पहले की तुलना में अधिक मुखर है। उसके पास सोशल मीडिया है, डिजिटल प्लेटफॉर्म हैं और अपनी बात कहने के कई रास्ते हैं। इसलिए अब किसी असंतोष को लंबे समय तक दबाकर रखना आसान नहीं है।
क्या होगा इसका राजनीतिक असर
यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। किसी भी लोकतंत्र में युवाओं का असंतोष अंततः राजनीतिक प्रभाव पैदा करता है। यह जरूरी नहीं कि उसका असर तुरंत दिखाई दे। एक छात्र आज परीक्षा व्यवस्था से नाराज है। कल वह नौकरी के मुद्दे पर वोट करेगा। उसके बाद वह महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा को लेकर अपना निर्णय लेगा। यानी आज की छोटी-सी नाराजगी भविष्य के राजनीतिक व्यवहार को प्रभावित कर सकती है। राजनीतिक दलों के लिए भी यह एक चेतावनी है। युवा वर्ग को केवल चुनावी भाषणों में याद करना पर्याप्त नहीं होगा। उसे शिक्षा नीति, रोजगार नीति और परीक्षा सुधारों में वास्तविक बदलाव चाहिए। नई पीढ़ी केवल वादों से प्रभावित नहीं होती। वह सवाल पूछती है, तुलना करती है, आंकड़े देखती है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह अपनी असफलता का कारण केवल खुद को मानने के लिए तैयार नहीं है।
सरकार के सामने असली चुनौती
सरकार के सामने चुनौती केवल एक परीक्षा को निष्पक्ष बनाने की नहीं है। चुनौती उस पूरे सिस्टम को विश्वसनीय बनाने की है, जिसमें एक छात्र अपना भविष्य तलाशता है। प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए मजबूत और सुरक्षित डिजिटल सिस्टम बनाना होगा। पेपर लीक और परीक्षा अनियमितताओं पर कठोर कार्रवाई करनी होगी। भर्ती परीक्षाओं का कैलेंडर समयबद्ध करना होगा और सरकारी नौकरियों की रिक्तियों को तेजी से भरना होगा। उच्च शिक्षा की सीटें बढ़ानी होंगी और कोचिंग पर निर्भरता कम करने के लिए सरकारी शिक्षा संस्थानों को मजबूत करना होगा। इन सबके साथ एक और चीज सबसे ज्यादा जरूरी है-युवाओं के साथ संवाद। जब सरकार और युवा के बीच संवाद खत्म होता है, तो उसकी जगह अफवाहें और अविश्वास लेने लगते हैं। सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है, जब उम्मीद खत्म होने लगे किसी भी देश के लिए बेरोजगारी से ज्यादा खतरनाक है भविष्य को लेकर निराशा। बेरोजगार युवा एक अवसर मिलने पर फिर से प्रयास कर सकता है, लेकिन जिस युवा को यह विश्वास हो जाए कि व्यवस्था में मेहनत का कोई अर्थ नहीं है, उसके भीतर का भरोसा टूट जाता है। जब बड़ी संख्या में युवाओं का भरोसा टूटने लगे, तो यह केवल आर्थिक संकट नहीं रहता। यह सामाजिक संकट बन जाता है। यह राजनीतिक संकट बन जाता है। इसलिए आज NEET हो या कोई दूसरी परीक्षा, सरकारों को इन घटनाओं को केवल प्रशासनिक समस्या की तरह नहीं देखना चाहिए। हर परीक्षा के पीछे एक परिवार है। हर रिजल्ट के पीछे एक सपना है। हर नौकरी के पीछे एक उम्मीद है और हर आंदोलन के पीछे एक बेचैनी है।
ज्यादा जरूरी बारूद को हटाना
किसी भी आंदोलन को खत्म करना आसान है। बातचीत कीजिए, आश्वासन दीजिए, जांच बैठाइए और समय के साथ मामला शांत हो जाएगा, लेकिन समस्या की जड़ नहीं बदली, तो अगली चिंगारी फिर उठेगी। आज एक परीक्षा है, कल दूसरी परीक्षा होगी। आज मेडिकल प्रवेश का सवाल है, कल सरकारी भर्ती का होगा और परसों विश्वविद्यालयों में दाखिले का सवाल सामने आ सकता है। हर बार यदि सरकार केवल उस समय की आग बुझाने में लगी रही, तो असंतोष की जमीन और मजबूत होती जाएगी। इसलिए जरूरत है एक व्यापक राष्ट्रीय संवाद की। यह संवाद शिक्षा पर, रोजगार पर, प्रतियोगी परीक्षाओं पर, आरक्षण पर, कोचिंग व्यवस्था पर और उस मध्यवर्गीय परिवार पर जो अपने बच्चे के भविष्य के लिए अपनी पूरी जिंदगी की कमाई लगा देता है उस पर होना चाहिए। भारत की युवा पीढ़ी को केवल भाषण नहीं चाहिए। उसे भरोसा चाहिए। उसे निष्पक्षता चाहिए। उसे अवसर चाहिए और सबसे बढ़कर उसे यह विश्वास चाहिए कि अगर वह मेहनत करेगा, तो उसकी मेहनत का कोई अर्थ जरूर होगा। असली संकट तब शुरू नहीं होता जब युवा सड़क पर उतरता है। असली संकट तब शुरू होता है, जब युवा सड़क पर उतरने से पहले ही यह मान ले कि उसकी आवाज कहीं नहीं सुनी जाएगी। आज की बेचैनी को इसी नजरिए से समझना होगा। यह किसी एक परीक्षा का आक्रोश नहीं है। यह उस पीढ़ी की बेचैनी है, जो पढ़ी-लिखी है, महत्वाकांक्षी है, डिजिटल रूप से जागरूक है और अपने भविष्य को लेकर पहले से कहीं ज्यादा सजग है।
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