खिलाड़ियों के पैसे से अफसरों की कॉलोनियों में सजे खेल के मैदान, खेल फंड में धांधलियों पर बड़ा खुलासा
नई दिल्ली। लुटियंस दिल्ली के आलीशान इलाके न्यू मोती बाग की ऊंची दीवारों के पीछे अफसरों की एक अलग ही दुनिया है। यहां एक चमकता हुआ स्विमिंग पूल है, जिसका तापमान नियंत्रित रहता है। ऊपर एक पारदर्शी छत (कैनोपी) लगी है। पास ही एक किशोर टेनिस कोर्ट पर फोरहैंड शॉट्स का अभ्यास कर रहा है। बाहर से देखने पर ये सुविधाएं किसी सार्वजनिक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स जैसी लगती हैं, लेकिन गेट पर खड़े गार्ड यह तय करते हैं कि अंदर पैर कौन रखेगा।
यहां से महज 3 किलोमीटर दूर सिविल सर्विसेज ऑफिसर्स इंस्टीट्यूट (CSOI) में स्क्वैश कोर्ट दोपहर के समय खाली पड़ा है, लेकिन दीवारों पर लगे रगड़ के निशान बताते हैं कि शाम को यहां रसूखदार अफसरों की भीड़ उमड़ती है। बाहर बोर्ड पर साफ लिखा है - बिना आईडी प्रवेश वर्जित।
'इंडियन एक्सप्रेस' की पड़ताल में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि अफसरों के लिए इन आलीशान सुविधाओं को बनाने और चमकाने पर जिस पैसे का इस्तेमाल हुआ, वह असल में देश के खिलाड़ियों के लिए था। यह पैसा नेशनल स्पोर्ट्स डेवलपमेंट फंड (NSDF) से आया है। एक ऐसा फंड, जिसका मकसद एथलीटों को ट्रेनिंग देना और खेल का बुनियादी ढांचा तैयार करना था।
अफसरों की क्लब लाइफ पर छह करोड़ खर्च
आरटीआई (RTI) से प्राप्त डेटा और सरकारी अधिकारियों के इंटरव्यू के आधार पर पाया कि कैसे खेल के बजट का एक हिस्सा अफसरों की संस्थाओं और उनकी रिहायशी कॉलोनियों में मोड़ दिया गया।
2021 से 2025 के बीच NSDF से 6.2 करोड़ रुपए से अधिक की राशि CSOI, केंद्रीय सिविल सेवा सांस्कृतिक एवं खेल बोर्ड (CCSCSB) और न्यू मोती बाग रेजिडेंशियल कॉम्प्लेक्स को दी गई।
खेल के नाम पर अफसरों का वेलफेयर
न्यू मोती बाग कॉलोनी में बना स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स किसी भी विश्वस्तरीय अकादमी को टक्कर दे सकता है। यहां लकड़ी के फर्श वाले बैडमिंटन कोर्ट, स्क्वैश कोर्ट, जिम, बिलियर्ड्स रूम और टेनिस कोर्ट हैं।
रिकॉर्ड के मुताबिक 2019 में खेलो इंडिया योजना के तहत यहां 2.8 करोड़ रुपए दिए गए थे। इसके पांच साल बाद जून 2024 में NSDF से फिर 2.2 करोड़ रुपए मंजूर किए गए। जब फंड की कमी थी, तब भी इसकी दूसरी किस्त (88 लाख रुपए) जारी की गई।
खिलाड़ियों का हक और अफसरों की पसंद
एनएसडीएफ को एथलीट्स की ट्रेनिंग के लिए बनाया गया था। इसके जरिए ओलंपिक की तैयारी करने वाले खिलाड़ियों को मदद मिलती है। लेकिन पिछले पांच साल के आंकड़े कुछ और ही कहते हैं। अफसरों की एक कमेटी ने खुद के लिए पैसे पास किए
बचाव में ये दिए तर्क
न्यू मोती बाग आरडब्ल्यूए के अध्यक्ष और केंद्र शासित प्रदेशों के चुनाव आयुक्त सुधांशु पांडे का कहना है कि यह सरकार को तय करना है कि पैसा कहां से आएगा। उन्होंने तर्क दिया, सरकारी कॉलोनियां भी कल्याणकारी गतिविधियों का हिस्सा हैं। खेल सुविधाएं भावनात्मक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी हैं, जिससे अप्रत्यक्ष रूप से स्वास्थ्य खर्च बचता है। हालांकि, उन्होंने संसदीय समिति की आपत्तियों पर कोई टिप्पणी नहीं की।
विदेशी क्रिकेट बोर्ड को महंगे तोहफे
हैरानी की बात यह है कि पैसा सिर्फ दिल्ली में नहीं बंटा। भारत के सरकारी खजाने से विदेशों में भी तोहफे भेजे गए। भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) ने मालदीव, जमैका और सेंट विंसेंट जैसे देशों के क्रिकेट बोर्डों को क्रिकेट किट उपहार में देने के लिए करीब 1.08 करोड़ रुपए खर्च कर दिए।
सरकारी रिकॉर्ड में इसे अंतरराष्ट्रीय सहयोग बताया गया है।
कई पूर्व अधिकारियों ने इस पर सवाल उठाए हैं। भारत सरकार खुद देश में क्रिकेट को फंड नहीं देती। फिर विदेशी बोर्ड को पैसे देना समझ से बाहर है। टैक्स भरने वालों की कमाई का यह गलत इस्तेमाल है। इससे खेल जगत में काफी नाराजगी देखी जा रही है।
खास संस्थाओं और राज्यों पर मेहरबानी
फंड का एक बड़ा हिस्सा खास संस्थाओं को भी मिला। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में आरएसएस समर्थित दो संस्थाओं को टूर्नामेंट कराने और बुनियादी ढांचे के लिए करीब 2.66 करोड़ रुपए दिए गए।
उदयपुर में संघ से जुड़ी वनवासी कल्याण परिषद को निर्माण कार्यों के लिए 2.41 करोड़ रुपए मिले। इसी तरह छत्तीसगढ़ के जशपुर में वनवासी कल्याण समिति को भी 25 लाख रुपए बांटे गए।
2021-22 में जब किरेन रिजिजू खेल मंत्री थे, तब उनके गृह राज्य अरुणाचल प्रदेश के 26 जिला मुख्यालयों में ओपन-एयर जिम और बैडमिंटन हॉल के लिए 5.93 करोड़ रुपए मंजूर किए गए।
नियम कहते हैं कि पैसा सिर्फ काबिल खिलाड़ियों पर खर्च हो। लेकिन यहां क्षेत्रीय और राजनीतिक पसंद साफ दिख रही है।
जब फंड घटा, तब अपनों पर मेहरबानी बढ़ी
हैरानी की बात यह है कि यह फिजूलखर्ची तब हुई, जब NSDF में आने वाले योगदान में भारी गिरावट आई। 2023-24 में यह फंड 85.26 करोड़ रुपए था, जो 2025-26 तक गिरकर महज 37.02 करोड़ रुपए रह गया।
संसदीय समिति ने लगाई कड़ी फटकार
लोकसभा में पेश एक रिपोर्ट में इस पर नाराजगी जताई गई। समिति ने कहा कि खेल का पैसा आवासीय कॉलोनियों में न दें। इसे तुरंत रोकने की सलाह भी सरकार को दी गई है। सरकारी अफसरों की क्लब लाइफ के लिए बजट नहीं है।
फंड में योगदान देने वाली कंपनियों की संख्या भी घटी है। जब पैसा सही जगह नहीं लगेगा, तो कोई दान क्यों देगा? साल 2023 के मुकाबले फंड की राशि आधी रह गई है। यह भारतीय खेलों के भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं है।
नैतिकता पर सवाल
NSDF के नियमों के मुताबिक यह फंड उन संस्थाओं को दिया जाना चाहिए जो विशेष रूप से खेल को बढ़ावा देती हैं और जहाँ सुविधाएं एक बड़े जनसमूह के लिए उपलब्ध हों।
एक पूर्व खेल मंत्रालय अधिकारी ने फंड को अन्य कामों में उपयोग लेने के तरीके को अनैतिक करार दिया। उन्होंने कहा कि टैक्सपेयर्स के पैसे का इस्तेमाल उन जगहों के लिए करना जो आम जनता के लिए बंद हैं, पूरी तरह गलत है।
फंड का प्रबंधन मंत्री के हाथों में
एनएसडीएफ का प्रबंधन केंद्रीय खेल मंत्री के तहत 12 सदस्यीय परिषद द्वारा किया जाता है। लेकिन अनुदान प्रस्तावों को मंजूरी देने वाली संस्था खेल मंत्रालय के अधिकारियों की छह सदस्यीय समिति है, यानी उसी व्यवस्था के लोग जो इन अनुदानों से लाभान्वित होते हैं।
यह है एनएसडीएफ का मकसद
खेल मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार एनएसडीएफ 1998 में चैरिटेबल एंडोमेंट्स एक्ट 1890 के तहत स्थापित किया गया था। इसका उद्देश्य खेल विकास के लिए सरकार के साथ ही गैर-सरकारी संगठनों और व्यक्तियों से संसाधन जुटाना है।
इसके जरिए विशिष्ट खेल अनुशासनों को बढ़ावा देने और प्रमुख अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में भारतीय खेल प्रदर्शन सुधारने के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए जाते हैं। खेल से जुड़ी संस्थाएं, सरकारी और गैर-सरकारी संगठन तथा उत्कृष्ट क्षमता वाले व्यक्तिगत खिलाड़ी एनएसडीएफ से विशिष्ट परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता के पात्र होते हैं।
एनएसडीएफ खिलाड़ियों को उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराता है। इससे खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय ख्याति के कोचों के तहत प्रशिक्षण, तकनीकी, वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक समर्थन तथा अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में एक्सपोजर मिलता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
नेशनल स्पोर्ट्स डेवलपमेंट फंड (NSDF) क्या है और इसका उद्देश्य क्या है?
नेशनल स्पोर्ट्स डेवलपमेंट फंड यानी NSDF की स्थापना 1998 में हुई थी। इसका मुख्य उद्देश्य भारत में खेलों को बढ़ावा देना है। इस फंड में सरकार और निजी कंपनियां पैसा दान करती हैं। इस पैसे का उपयोग खिलाड़ियों की अंतरराष्ट्रीय ट्रेनिंग, कोचों की फीस और आधुनिक उपकरण खरीदने के लिए किया जाता है। यह विशेष रूप से उन एथलीट्स के लिए है जो ओलंपिक और एशियाई खेलों जैसे बड़े आयोजनों में भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं।
दिल्ली की ब्यूरोक्रेट कॉलोनियों में खेल फंड का उपयोग क्यों गलत माना जा रहा है?
NSDF के नियमों के अनुसार, वित्तीय सहायता उन संस्थानों को मिलनी चाहिए जो जनता के लिए खेल सुविधाएं बनाते हैं। न्यू मोती बाग और CSOI जैसे संस्थान केवल सरकारी अधिकारियों के लिए हैं। यहां आम जनता या गरीब खिलाड़ियों का प्रवेश वर्जित है। जब खिलाड़ियों के लिए बना पैसा ऐसी जगहों पर जिम और पूल बनाने में खर्च होता है, तो इसे फंड का दुरुपयोग और अनैतिक माना जाता है। संसदीय समिति ने भी इस पर रोक लगाने की सिफारिश की है।
क्या विदेशी क्रिकेट बोर्ड को फंड देना NSDF के नियमों के खिलाफ है?
NSDF का प्राथमिक लक्ष्य भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन सुधारना है। हालांकि, नियमों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग की बात कही गई है, लेकिन टैक्सपेयर्स के पैसे से दूसरे देशों को क्रिकेट किट गिफ्ट करना विवादों में है। आलोचकों का तर्क है कि जब भारत सरकार घरेलू क्रिकेट को वित्तीय सहायता नहीं देती, तो विदेशों में दान देना तर्कसंगत नहीं है। यह विशेष रूप से तब और गंभीर हो जाता है जब फंड की कुल राशि में गिरावट आ रही हो।
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