कनाडाई सपना: बिखरती उम्मीदें-खाली जेबें, आखिर पंजाब के युवाओं का भविष्य क्या

Jinesh Jain | Apr 09, 2026, 15:15 IST
Photograph: (the sootr)
पंजाब के युवाओं के लिए कनाड़ा जाने का रास्ता दूर होता जा रहा है। यहां अब युवाओं में ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन या जर्मनी जाने की बात हो रही है। लेकिन, इन देशों की राह भी आसान नहीं है।

​Chandigarh: पंजाब में लुधियाना के एक छोटे से कोचिंग सेंटर के कमरे में शीतल बैठी है। उसके हाथ में एक पेंसिल है, जिसे वह बेमन से कागज़ पर घुमा रही है। आसपास के छात्र शोर मचा रहे हैं। कोई सिडनी की बात कर रहा है, तो कोई लंदन की। लेकिन शीतल शांत है। वह थक चुकी है।



​शीतल की उम्र मात्र 20 साल है, लेकिन उसकी आंखों में वो चमक नहीं है, जो इस उम्र के युवाओं में होती है। उसने पिछले दो साल सिर्फ कनाडा जाना के एक ही सपने के पीछे लगा दिए।



उसने मेहनत की, IELTS Exam (इंटरनेशनल इंग्लिश लैंग्वेज टेस्टिंग सिस्टम) पास किया और 2025 में वीजा लगाया। रिजेक्ट हो गया। 2026 में फिर कोशिश की। फिर रिजेक्ट हो गया। वजह दी गई-प्रोफाइल मजबूत नहीं है। शीतल रुआंसी होकर कहती है, मेरे सब जानने वाले कनाडा में बस गए हैं, बस मैं ही यहां रह गई हूं।



शीतल की यह कहानी आज पंजाब के घर-घर की कहानी बन चुकी है। कभी मिनी पंजाब कहा जाने वाला कनाडा अब दूर का ढोल सुहावना होता जा रहा है।



जब मेपल लीफ का रंग फीका पड़ा

दशकों से टोरंटो, सरे या ब्रैम्पटन की गलियां पंजाब के गांवों का विस्तार मानी जाती थीं। लेकिन कनाडा सरकार ने अचानक नियम बदल दिए हैं। जनवरी 2024 में एक बड़ा नीतिगत बदलाव हुआ। गारंटीड इन्वेस्टमेंट सर्टिफिकेट (GIC), जो छात्रों को यह दिखाने के लिए जमा करना पड़ता है कि उनके पास पहले साल का खर्च है, उसे 10,000 डॉलर से बढ़ाकर 22,000 डॉलर (लगभग 32 लाख रुपये) से अधिक कर दिया गया। एक औसत मध्यमवर्गीय पंजाबी परिवार के लिए यह रकम जुटाना जमीन बेचने या भारी कर्ज लेने जैसा है।



'द प्रिंट' में छपी रिपोर्ट के अनुसार कनाडा की महालेखा परीक्षक करेन होगन की मार्च 2026 की रिपोर्ट एक डरावनी तस्वीर पेश करती है। 2023 में कनाडा आने वाले छात्रों में भारत की हिस्सेदारी 51.6 प्रतिशत थी, जो 2025 तक गिरकर महज 8.1 फीसदी रह गई है। सरकार ने अस्थायी निवासियों की संख्या को कुल जनसंख्या के 5 प्रतिशत से कम रखने का लक्ष्य रखा है, जिसका सबसे ज्यादा नुकसान भारतीय छात्रों को हुआ है।



सौदागरों की गली का माहौल बदला

​जालंधर की गढ़ा रोड। यह सड़क 40 साल से प्रवासन (Migration) उद्योग का मक्का रही है। 2 किलोमीटर के इस टुकड़े पर आपको बड़े-बड़े होर्डिंग्स दिखेंगे, जिन पर मुस्कुराते हुए गोरे लोग और वीजा की 100 फीसदी गारंटी के वादे लिखे होते हैं।


यहां का माहौल बदला हुआ है। एसोसिएशन ऑफ कंसल्टेंट्स ऑफ ओवरसीज स्टडीज के अनुसार 2024 से पहले यहां हर महीने 6,000 से अधिक लोग आईईएलटीएस देते थे, अब 600 भी नहीं आ रहे।



एजेंटों के दफ्तर जो कभी पूछताछ करने वालों से भरे रहते थे, अब खाली पड़े हैं। अब केवल हाई प्रोफाइल यानी टॉप ग्रेड वाले छात्रों को ही मौका मिल रहा है। कनाडाई सपना अब केवल अमीरों की जागीर बनता जा रहा है।



फर्जीवाड़े का वह काला खेल

​पंजाब में विदेश भेजने के नाम पर होने वाले फर्जीवाड़े को कबूतरबाजी कहा जाता है। शीतल जैसी छात्राएं केवल नीतियों का शिकार नहीं हैं, वे उन जालसाजों का भी शिकार हैं जिन्होंने सिस्टम की खामियों का फायदा उठाया।



जालंधर का बृजेश मिश्रा आज एक ऐसा नाम है जिससे हर छात्र खौफ खाता है। उसने हंबर और सेनेका जैसे बड़े कॉलेजों के फर्जी एडमिशन लेटर जारी किए। छात्र कनाडा पहुंचे तो उन्हें पता चला कि उनकी कोई सीट ही नहीं है। मिश्रा उन्हें डरा-धमकाकर छोटे कमरों में चलने वाले फर्जी कॉलेजों में डाल देता और मोटा कमीशन डकार जाता।



रोपड़ के चुतमाली गांव के लवप्रीत सिंह की कहानी दिल दहला देने वाली है। उसके परिवार ने 18 लाख का कर्ज लिया। एजेंट अतुल महाजन ने उसे सपने दिखाए, लेकिन कनाडा पहुंचते ही उसे पता चला कि उसके पास जो लेटर है, वह जाली है। लवप्रीत ने सड़कों पर विरोध प्रदर्शन किया। आज उसे तीन साल का अस्थायी परमिट तो मिल गया है, लेकिन उसके माता-पिता के चेहरे से डर नहीं गया है।



सिस्टम की विफलता और जांच का घेरा

ऑडिट रिपोर्ट (मार्च 2026) के अनुसार कनाडा के आव्रजन विभाग (IRCC) को पता था कि सिस्टम का दुरुपयोग हो रहा है। 2022 में भारतीय आवेदनों की स्वीकृति दर 61 फीसदी से अचानक 98 प्रतिशत हो गई थी, जो एक बड़ा रेड फ्लैग था।


​विभाग ने 1.5 लाख से अधिक ऐसे छात्रों की पहचान की, जिन्होंने नियमों का उल्लंघन किया, लेकिन बजट की कमी के कारण वे हर साल केवल 2,000 मामलों की ही जांच कर पा रहे थे। इसी ढिलाई का फायदा उठाकर कई जालसाज भारत में फलते-फूलते रहे।





kanada


अब कहां जाएगा पंजाब का युवा?

​कनाडा के दरवाजे बंद होते देख अब पंजाब के युवाओं का रुख बदल रहा है। अब चर्चा कनाडा की नहीं, बल्कि ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और जर्मनी की हो रही है। ​लेकिन वहां भी राह आसान नहीं है।



ऑस्ट्रेलिया के सख्त आयकर कानूनों के कारण पंजाब के कृषि प्रधान परिवारों के लिए फंड दिखाना मुश्किल हो रहा है। ​ब्रिटेन में भी आव्रजन नियम कड़े किए जा रहे हैं। ​जर्मनी में भाषा की दीवार एक बड़ी चुनौती है।



क्या सपना सच होगा?

​आज पंजाब की गलियों में एक अजीब सी बेचैनी है। एक तरफ वो युवा हैं जो अपनी जमीनें बेचकर भी विदेश जाना चाहते हैं और दूसरी तरफ वो माता-पिता हैं जो ठगी के डर से कांप रहे हैं।



पुलिस अधिकारी बताते हैं कि बिना लाइसेंस वाले एजेंट अब भी सोशल मीडिया के जरिए युवाओं को लुभा रहे हैं। वे 24 घंटे में वीजा और रिजेक्शन के बाद भी गारंटी जैसे विज्ञापन दे रहे हैं।



​क्या पंजाब का युवा अपने ही देश में अवसर तलाशेगा या फिर किसी नई विदेशी मंजिल की तलाश में अपनी उम्र और पैसा दांव पर लगाएगा? यह सवाल आज पंजाब के हर गांव की चौपाल पर गूंज रहा है।



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