राम मंदिर ट्रस्ट दान घोटाला: 2020 ऑडिट ने पहले ही बताया था कि गडबड़ है

Manya Jain | Jun 24, 2026, 16:25 IST
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राम मंदिर ट्रस्ट में दान के गबन के आरोपों पर SIT जांच जारी है। छह साल पहले एक ऑडिट ने प्रबंधन को गैर-पेशेवर बताया था और रिकॉर्ड की कमी पर चेतावनी दी थी। वह चेतावनी अब क्यों याद आ रही है, पूरी कहानी पढ़िए।

मंदिर के दान पात्र में जो पैसा गिरता है, उसका हिसाब कौन रखता है? यह सवाल छह साल पहले ही पूछा जा चुका था। जवाब इतना गंभीर था कि उसे आज भी भुलाया नहीं जा सकता।



दरअसल, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन फरवरी 2020 में हुआ था। उसी साल नवंबर में एक निजी ऑडिट फर्म ने दान प्रबंधन की जांच की। रिपोर्ट में प्रबंधन को अत्यंत गैर-पेशेवर बताया गया और दान का व्यवस्थित रिकॉर्ड नहीं मिला।



हाल ये हैं कि छह साल बाद भी सिफारिशें लागू नहीं हुईं। और अब दान में गबन के आरोप लग रहे हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने इस महीने एसआईटी (विशेष जांच दल) बनाई, जिसने अपनी शुरुआती रिपोर्ट सौंप दी है।



आपसे क्यों जुड़ा है यह मामला

यह सिर्फ अयोध्या की बात नहीं है। देश भर से, हर राज्य से, करोड़ों श्रद्धालुओं ने इस मंदिर के लिए अपनी जमा पूंजी से कुछ रुपए या कुछ गहने दिए हैं।



सवाल यह है कि उस पैसे का हिसाब कौन रखता है और कौन उसकी जिम्मेदारी लेता है। अगर देश के सबसे बड़े और सबसे चर्चित मंदिर ट्रस्ट में ही यह सवाल अनुत्तरित रह सकता है तो छोटे ट्रस्टों का क्या हाल होगा।



पहले क्या था माजरा

नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद पर फैसला सुनाया था। कोर्ट ने विवादित जमीन मंदिर निर्माण के लिए एक ट्रस्ट को सौंपने का आदेश दिया। केंद्र सरकार ने 5 फरवरी 2020 को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन की घोषणा की।



ट्रस्ट में कुल 15 सदस्य हैं। इनमें केंद्र और राज्य सरकार का एक-एक प्रतिनिधि शामिल है, और अयोध्या के जिलाधिकारी भी पदेन सदस्य हैं। सभी सदस्यों का हिंदू होना अनिवार्य रखा गया था।



गठन के कुछ ही महीनों बाद, ट्रस्ट के एक वरिष्ठ अधिकारी ने खुद एक ऑडिट फर्म से आंतरिक लेखा परीक्षा और जोखिम प्रबंधन पर सलाह मांगी। फर्म ने नवंबर 2020 में अपनी रिपोर्ट सौंपी। यहीं से वह चेतावनी शुरू होती है जो आज भी पूरी तरह लागू नहीं हुई है।



क्या मिला था ऑडिट में

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार ऑडिट फर्म ने पाया कि कार्यान्वयन स्तर पर प्रबंधन स्पष्ट नहीं था। रिपोर्ट में सीधे शब्दों में लिखा गया कि व्यवस्था अत्यंत गैर-पेशेवर है।



वित्तीय रिपोर्टिंग के लिए दान का कोई व्यवस्थित रिकॉर्ड मौजूद नहीं था। लेन-देन और डेटा प्रविष्टि के किसी भी चरण में दोबारा या तीसरी बार जांच की कोई सुविधा नहीं थी।



सोचिए एक बार। अगर कोई छोटी सी दुकान भी बिना खाता-बही के रोजाना लाखों रुपए का कारोबार करे, तो क्या होगा। यहां करोड़ों रुपए के दान के साथ कुछ वैसा ही हाल था।



फर्म ने आभूषण जैसे दान के लिए भी ठीक स्टॉक रजिस्टर रखने की सिफारिश की थी। डेटा सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई गई थी, सर्वर और डेटा सुरक्षा का कोई पुष्ट रिकॉर्ड नहीं मिला था।



ट्रस्ट की वेबसाइट पर आज भी किसी मानक संचालन प्रक्रिया का जिक्र नहीं है। और ना ही कोई आंतरिक ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध है। और यही वह जगह है जहां चेतावनी को नजरअंदाज कर दिया गया।



छह साल बाद फिर सवाल

6 जून 2026 को कई मीडिया रिपोर्टों में ट्रस्ट के भीतर वित्तीय अनियमितताओं की खबरें सामने आईं। हफ्ते भर के भीतर मामला इतना बढ़ा कि खुद ट्रस्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से जांच की मांग कर दी। 13 जून को राज्य सरकार ने तीन सदस्यीय एसआईटी का गठन किया।



15 जून को एक वकील ने सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखकर सीबीआई (केंद्रीय जांच एजेंसी) की जांच की मांग की, 16 जून को खबरों में आया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मामले का संज्ञान लिया। इसके बाद 20 जून को लखनऊ हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल हुई। जिसमें जांच आयोग और बैंक खाते फ्रीज करने की मांग की गई।



एसआईटी की टीम में लखनऊ के मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत, पुलिस महानिरीक्षक किरण एस और वित्त विभाग के विशेष सचिव नील रतन की भूमिका है। क्या यह महज इत्तेफाक है कि जिस संस्था पर सवाल उठे, उसी ने जांच मांगी। इस पर थोड़ी देर में बात करते हैं।



क्या हुआ है जांच में अब तक

एसआईटी ने छह दिनों तक अयोध्या में रहकर करीब साठ घंटे की जांच की। मंदिर परिसर में कुल 35 दान पेटियां हैं, जिन्हें दिन में दो बार खोला जाता है। हर शिफ्ट में करीब 20 लोग गिनती के काम में लगते हैं। ठीक इसी प्रक्रिया में, दान पेटियों से नकद और गहने निकालने से लेकर गिनती केंद्र तक ले जाने में, जांच टीम को लापरवाही के निशान मिले।



अयोध्या में लगे सीसीटीवी (बंद घेरे वाले कैमरे) की फुटेज सिर्फ 45 दिन तक सुरक्षित रहती है, फिर अपने आप मिट जाती है। इसका मतलब है कि छह साल पुराने लेन-देन का सीधा सबूत अब मिलना मुश्किल है। जांचकर्ता डिजिटल फॉरेंसिक तरीकों से डिलीट या बदली गई फुटेज वापस लाने की कोशिश कर रहे हैं।



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सूत्रों के मुताबिक, चढ़ावा गिनने के काम में लगे कुछ कर्मचारियों की निशानदेही पर अब तक करीब दो करोड़ रुपए बरामद हो चुके हैं। हालांकि यह आंकड़ा अभी आधिकारिक तौर पर पूरी तरह पुष्ट नहीं हुआ है। एसआईटी प्रमुख ने एक न्यूज एजेंसी से कहा कि अभी तक किसी को क्लीन चिट नहीं दी गई है, और रिपोर्ट के विवरण गोपनीय हैं।



ट्रस्ट के गठन के बाद से कुल नकद दान का अनुमान लगभग 3,500 करोड़ रुपए है। इसे रोजाना के हिसाब में बांटें, तो यह करीब डेढ़ करोड़ रुपए प्रतिदिन बैठता है। इतनी बड़ी रकम के लिए एक तय एसओपी (मानक संचालन प्रक्रिया) का न होना, यही असल समस्या रही है।



कौन-कौन है इस मामले में

ट्रस्ट की तरफ से दो नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं, महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्रा। एसआईटी ने गिनती की प्रक्रिया से जुड़े डॉ. अनिल मिश्रा समेत कई लोगों से पूछताछ की है। ये दोनों ट्रस्ट के वरिष्ठ पदाधिकारी हैं, और इनकी भूमिका पर अभी सिर्फ जांच के दायरे में सवाल हैं।



किसी आरोप की पुष्टि अदालत में नहीं हुई है। दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश सरकार है, जिसने ट्रस्ट के अनुरोध पर एसआईटी बनाई और जिसकी अगुवाई मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कर रहे हैं।



तीसरा पक्ष विपक्ष का है, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, कांग्रेस के तारिक अनवर और आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल, जो लगातार सवाल उठा रहे हैं। चौथा पक्ष, जिसे अक्सर भुला दिया जाता है, वे करोड़ों श्रद्धालु हैं जिन्होंने अपनी मेहनत की कमाई से चंदा दिया।



दोनों तरफ की बात

ट्रस्ट ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि दान और चढ़ावे का नियमित ऑडिट होता है और अब तक किसी बड़े वित्तीय घोटाले की पुष्टि नहीं हुई है। ट्रस्ट के पदाधिकारियों का कहना है कि उठाए जा रहे आरोप तथ्यों से ज्यादा आशंकाओं पर टिके हैं।



लेकिन सवाल यह है, अगर सब कुछ ठीक था, तो खुद जांच मांगने की जरूरत क्यों पड़ी?



विपक्ष का रुख इससे अलग है। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि सरकार जानबूझकर एसआईटी जांच में देरी कर रही है, ताकि सच सामने न आए और सबूतों से छेड़छाड़ की जा रही है।



अरविंद केजरीवाल ने केंद्र, सीबीआई और ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) की निष्क्रियता पर सवाल उठाते हुए पूछा कि अब तक एक भी एफआईआर (प्राथमिकी) क्यों दर्ज नहीं हुई। उधर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पर तीखा हमला बोला और कहा कि सच एसआईटी जांच के जरिए सामने आएगा।



यह मामला अदालत में भी पहुंच चुका है। लखनऊ हाईकोर्ट में जनहित याचिका लंबित है। सुप्रीम कोर्ट को भी इसकी जानकारी दी गई है। जब तक अदालत और सआईटी की जांच पूरी नहीं होती, यह कहना जल्दबाजी होगी कि किसकी कितनी जिम्मेदारी है।



जो बात आप नहीं जानते

यहां एक दिलचस्प बात है। यह जांच किसी बाहरी दबाव में शुरू नहीं हुई। उत्तर प्रदेश सरकार ने एसआईटी का गठन खुद मंदिर ट्रस्ट के अनुरोध पर किया था।



यानी जिस संस्था पर अब सवाल उठ रहे हैं, उसी ने जांच की मांग की थी।


और यही 2020 में भी हुआ था। ट्रस्ट के ही एक अधिकारी ने खुद ऑडिट फर्म को बुलाया था। चेतावनी भीतर से आई, फिर भी उस पर अमल नहीं हुआ।



सोचिए, अगर 2020 की उस रिपोर्ट को गंभीरता से लिया गया होता, तो शायद 2026 की यह कहानी कभी लिखी ही नहीं जाती।



आगे क्या होगा

सूत्रों के मुताबिक एसआईटी की रिपोर्ट में एफआईआर दर्ज करने की सिफारिश है, साथ ही ट्रस्ट के मौजूदा ढांचे की समीक्षा और पुनर्गठन का सुझाव भी दिया गया है, और बीते पांच वर्षों के चढ़ावे का विस्तृत ऑडिट कराने की बात कही गई है।



यह भी कहा जा रहा है कि मंदिर प्रबंधन को पूरी तरह पारदर्शी बनाने के लिए किसी वरिष्ठ आईएएस (भारतीय प्रशासनिक सेवा) या पीसीएस अधिकारी को मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियुक्त किया जा सकता है।



लंबे समय का सवाल अलग है। अगर अभी रिपोर्ट पर अमल होकर भी पांच-छह साल बाद फिर ढिलाई बरती गई, तो क्या गारंटी है कि यह कहानी फिर से नहीं दोहराई जाएगी।



FAQ

  1. राम मंदिर ट्रस्ट का दान विवाद क्या है?
    जून 2026 में मीडिया रिपोर्टों में राम मंदिर ट्रस्ट के दान प्रबंधन में गड़बड़ी की खबरें आईं। ट्रस्ट के अनुरोध पर उत्तर प्रदेश सरकार ने 13 जून को तीन सदस्यीय एसआईटी बनाई। जांच अब भी जारी है, और अब तक किसी को क्लीन चिट नहीं मिली है।
  2. 2020 के ऑडिट में क्या सामने आया था?
    ट्रस्ट के गठन के कुछ महीनों बाद ही एक निजी ऑडिट फर्म ने प्रबंधन को अत्यंत गैर-पेशेवर बताया था। रिपोर्ट में दान का व्यवस्थित रिकॉर्ड न होने की बात दर्ज थी। यह रिपोर्ट नवंबर 2020 में सौंपी गई थी।
  3. क्या एसआईटी जांच में किसी की गिरफ्तारी हुई है?
    अब तक की रिपोर्टों में किसी गिरफ्तारी की पुष्टि नहीं हुई है। सूत्रों के मुताबिक सिफारिशों में एफआईआर दर्ज करने की बात शामिल है। मामला उत्तर प्रदेश सरकार और अदालत दोनों के पास विचाराधीन है।

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