RSS ने खुद को रजिस्टर्ड क्यों नहीं कराया? जानिए बहस के पीछे का कानून और इतिहास
Jaipur: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की कानूनी स्थिति एक बार फिर चर्चा में है। कांग्रेस नेता प्रियांक खड़गे ने सवाल उठाया है कि भारत का सबसे बड़ा सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन बिना किसी रजिस्ट्रेशन के कैसे काम कर रहा है। उन्होंने संगठन की फंडिंग, टैक्स अनुपालन और ऑडिट की जरूरत पर भी सवाल खड़े किए हैं।
इससे पहले नवंबर में भी खड़गे ने यह सवाल उठाया था। तब आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने तर्क दिया था कि भारतीय कानून व्यक्तियों के संघों (associations of individuals) के लिए रजिस्ट्रेशन अनिवार्य नहीं बनाता है। संघ को व्यक्तियों के निकाय (body of individuals) के रूप में कानूनी मान्यता प्राप्त है।
खड़गे ने 13 जून को लिखे एक पत्र में कहा कि अपने प्रभाव और पहुंच के कारण ही संघ को पारदर्शिता, जवाबदेही और संवैधानिक अनुपालन के उच्चतम मानकों पर खरा उतरना चाहिए।
क्या रजिस्ट्रेशन अनिवार्य ?
जवाब है, नहीं। भारत में ऐसा कोई सामान्य कानून नहीं है, जो नागरिकों के हर संघ के लिए रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य बनाता हो।
सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट, ट्रस्ट एक्ट, कंपनी कानून और ट्रेड यूनियन कानून ऐसे कानूनी विकल्प देते हैं। इनके जरिए संगठन चाहें तो खुद को एक कानूनी रूप में ढाल सकते हैं। लेकिन रजिस्ट्रेशन आम तौर पर तब तक वैकल्पिक होता है, जब तक कि कोई संगठन ऐसे अधिकार या विशेषाधिकार न चाहे, जिसके लिए किसी विशेष कानूनी रूप की आवश्यकता हो।
क्या है भागवत के तर्क का आधार
संघ की कानूनी स्थिति का सवाल पहली बार 1970 के दशक में बॉम्बे और पटना में दो टैक्स मामलों के जरिए उठा था।
टैक्स अधिकारियों ने कार्यकर्ताओं से गुरु दक्षिणा के रूप में मिलने वाले RSS के चंदे की स्थिति पर सवाल उठाया था और इस पर टैक्स लगाने की कोशिश की थी। हालांकि, दोनों मामलों में टैक्स अपीलीय अधिकारियों ने माना कि नियमों के तहत गुरु दक्षिणा टैक्स से मुक्त थी।
बाद में 1994 में पटना हाई कोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। इन्हीं कार्यवाहियों के दौरान RSS को व्यक्तियों के निकाय के रूप में भी मान्यता दी गई थी।
इसलिए, विवाद इस बात पर नहीं है कि RSS वैध है या नहीं। बहस इस बात पर है कि क्या इतने बड़े पैमाने और प्रभाव वाले संगठन को आधुनिक संस्थानों द्वारा अपनाए जाने वाले रजिस्ट्रेशन ढांचे से बाहर रहना चाहिए।
ज्यादातर संगठन रजिस्ट्रेशन का विकल्प इसलिए चुनते हैं, क्योंकि यह उन्हें एक स्पष्ट कानूनी पहचान देता है। दैनिक कामकाज को आसान बनाता है। रजिस्ट्रेशन एक परिभाषित प्रबंधन संरचना भी तैयार करता है। यह पदाधिकारियों के रहने या न रहने के बाद भी निरंतरता बनाए रखती है। एक गैर-पंजीकृत (unregistered) संगठन में आम तौर पर एक अलग कानूनी पहचान की कमी होती है।
एक आंदोलन के रूप में परिकल्पना
यह समझने के लिए कि RSS आज भी गैर-पंजीकृत क्यों है, इसके इतिहास में जाना होगा। 1925 में केबी हेगड़ेवार द्वारा स्थापित RSS की परिकल्पना एक पारंपरिक संगठन के रूप में कम और चरित्र-निर्माण व सामाजिक संगठन पर केंद्रित एक सामाजिक आंदोलन के रूप में ज्यादा की गई थी। यह सदस्यता फॉर्म, फीस या औपचारिक नामांकन पर निर्भर नहीं था।
यह दर्शन आज भी दिखाई देता है। यहां कोई सदस्यता कार्ड नहीं है। कोई सार्वजनिक रूप से सत्यापित राष्ट्रीय सदस्यता रजिस्टर नहीं है। संगठन की गतिविधियों, विशेष रूप से दैनिक शाखा में भाग लेने से ही कोई स्वयंसेवक बनता है।
आरएसएस के इतिहासकार रतन शारदा का तर्क है कि आलोचक अक्सर इस संगठन को पारंपरिक संस्थानों के चश्मे से देखकर गलत समझते हैं। उन्होंने 'इंडियन एक्सप्रेस' को बताया कि कोई भी व्यक्ति शाखा शुरू कर सकता है और इसे बंद कर सकता है।
संघ की शाखाएं स्वतंत्र रूप से चलती हैं, अपने संसाधन खुद जुटाती हैं। कोई केंद्रीय नियंत्रण नहीं है, इसलिए कोई केंद्रीकृत रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था भी नहीं है।
सरकारी दमन और सावधानी
वाल्टर एंडरसन और श्रीधर दामले के शोध से पता चलता है कि सरकारी कार्रवाइयों की चिंताओं ने भी लंबे समय से आरएसएस की सोच को आकार दिया है।
वे अपनी पुस्तक, 'द ब्रदरहुड इन सैफ्रन' में नोट करते हैं कि अपनी स्थापना के समय से ही संघ ने सरकारी प्रतिबंधों की संभावनाओं को कम करने के लिए राजनीतिक सत्ता के प्रति एक सतर्क और गैर-टकराव वाला दृष्टिकोण अपनाया। वह सावधानी बेमानी नहीं थी।
1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद, 1975 में आपातकाल के दौरान और 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद RSS पर प्रतिबंध लगाया गया था। विद्वानों का तर्क है कि इन घटनाओं ने संघ को काम करते रहने के लिए नए तरीके खोजने पर मजबूर किया। इनमें से एक तरीका यह था कि कागजी कार्रवाई को जितना हो सके कम रखा जाए, जिससे मुख्य कामकाज अनौपचारिक बना रहे।
शारदा कहते हैं कि इसके चलते कई सहयोगी संगठनों का जन्म हुआ। एक संघ पदाधिकारी ने कहा कि आज आरएसएस के ढांचे को देखते हुए आप हमारे कार्यालय पर छापा नहीं मार पाएंगे। कागजों पर संघ का कोई कार्यालय ही नहीं है। आप हमारे सदस्यों को गिरफ्तार नहीं कर सकते क्योंकि वहां कोई भी सदस्य दस्तावेज़ों में दर्ज नहीं है।
आरएसएस के सहयोगी संगठन पंजीकृत
आरएसएस ने औपचारिक परिचालन संरचना (formal operational structure) को अपनी सहयोगी संस्थाओं के सुपुर्द कर दिया है। इसलिए जहां संघ खुद गैर-पंजीकृत रहा, वहीं इसके अधिकांश बड़े सहयोगी संगठन पंजीकृत संस्थाओं के माध्यम से संचालित होते हैं।
शारदा ने कहा, RSS हमेशा से अनौपचारिक संगठन था। लेकिन इसके सहयोगी संगठन सभी पंजीकृत हैं, आयकर देते हैं। उनका ऑडिट किया जाता है। उनकी वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित की जाती है।
संघ नेताओं का कहना है कि जब भी धन जुटाने की, संपत्ति रखने की या बुनियादी ढांचा बनाने की आवश्यकता होती है, तो अलग से पंजीकृत ट्रस्ट बनाए जाते हैं। उदाहरण के लिए दिल्ली में RSS का मुख्यालय ट्रस्ट संरचनाओं के माध्यम से ही स्वामित्व में है।
FAQ
- क्या RSS का बिना रजिस्ट्रेशन के चलना गैरकानूनी है?
नहीं। भारतीय कानून में हर नागरिक संघ के लिए रजिस्ट्रेशन जरूरी नहीं है। 1994 में पटना हाईकोर्ट ने RSS को व्यक्तियों के निकाय के रूप में मान्यता दी थी। रजिस्ट्रेशन तभी जरूरी होता है, जब कोई संगठन विशेष कानूनी सुविधाएं चाहे। - RSS पर कब-कब प्रतिबंध लगा था?
RSS पर तीन बार प्रतिबंध लगा। 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद, 1975 में आपातकाल के दौरान और 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद। इन्हीं घटनाओं ने RSS को अनौपचारिक ढांचे में काम करने की प्रेरणा दी। - RSS की फंडिंग कहां से आती है, क्या उस पर टैक्स लगता है?
RSS स्वयंसेवकों की गुरु दक्षिणा से चलता है। 1970 के दशक में टैक्स मामलों में यह टैक्स-मुक्त माना गया था। RSS के सहयोगी संगठन पंजीकृत हैं और आयकर देते हैं। संपत्ति और बड़े खर्चों के लिए अलग पंजीकृत ट्रस्ट बनाए जाते हैं।
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