84 हजार करोड़ से बदलेगी तस्वीर, समुद्र मंथन स्कीम से गहरे पानी में तेल ढूंढेगी सरकार
15 अगस्त 2025 को लाल किले से पीएम नरेंद्र मोदी ने एक बड़ा ऐलान किया था। उन्होंने कहा था कि देश को विकसित बनाने के लिए अब समुद्र मंथन की तरफ बढ़ना होगा।
अब सरकार ने इस ऐलान को हकीकत में बदल दिया है। 31 जुलाई को कैबिनेट ने 84 हजार करोड़ रुपए की समुद्र मंथन स्कीम को मंजूरी दे दी।
समुद्र मंथन स्कीम क्या है
ये देश का अब तक का सबसे बड़ा नेशनल ऑफशोर एक्सप्लोरेशन प्रोजेक्ट है। इसका मतलब है समुद्र और गहरे पानी में कच्चे तेल-गैस की खोज।
भारत के तट से लगे करीब 10 लाख वर्ग किमी के एक्सक्लूसिव इकॉनोमिक जोन (EEZ – Exclusive Economic Zone) में यह खोज होगी। किसी देश के EEZ में व्यापार का अधिकार सिर्फ उसी देश को होता है।
कृष्णा-गोदावरी, कावेरी और महानदी नदियों के इलाकों में तेल-गैस के भंडार मौजूद हैं। अंडमान निकोबार के गहरे पानी में भी यही संभावना है। लेकिन खोज से प्रोडक्शन शुरू होने तक 5 से 10 साल लग सकते हैं।
मार्च 2031 तक प्रोजेक्ट के पहले फेज में 84 हजार 84 करोड़ रुपए खर्च होंगे। इसमें 28.5 हजार करोड़ रुपए भूकंपीय डेटा जुटाने में और 43.2 हजार करोड़ रुपए 60 कुएं खोदने में लगेंगे।
एक कुआं खोदने की लागत करीब एक हजार 192 से एक हजार 431 करोड़ रुपए तक है। सरकार प्रति कुएं 675 करोड़ रुपए यानी आधी लागत देगी। बाकी खर्च साथी कंपनी उठाएगी।
सरकार का कहना है कि पुराने कुओं से उत्पादन हर साल 6 से 7% कम हो रहा है। इसलिए नए कुएं खोजना जरूरी हो गया है। कैबिनेट बैठक के बाद केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने यह जानकारी दी थी।
तेल कैसे खोजा जाता है
समुद्र के नीचे तेल-गैस चट्टानों में मिलता है। करोड़ों साल पहले दबे जीव-जंतुओं से यह हाइड्रोकार्बन बनता है। इसे निकालने की प्रोसेस चार स्टेप में होती है।
पहले स्टेप में सीस्मिक सर्वे जहाज काम करते हैं। ये पानी में साउंड वेव भेजकर भूगर्भ का 3D नक्शा बनाते हैं। इससे पता चलता है कि तेल-गैस कहां छिपा हो सकता है।
दूसरे स्टेप में एक्सप्लोरेशन वेल खोदा जाता है। इसके लिए सेमी-सबमर्सिबल रिग या ड्रिल शिप जैसी मशीनें काम आती हैं। इन्हें मोबाइल ऑफशोर ड्रिलिंग यूनिट्स (MODU – Mobile Offshore Drilling Units) कहा जाता है।
तीसरे स्टेप में अप्रेजल वेल खोदकर तेल की क्वालिटी और मात्रा जांची जाती है। इंजीनियर तय करते हैं कि यहां से तेल निकालना फायदेमंद होगा या नहीं।
चौथे और आखिरी स्टेप में प्रोडक्शन प्लेटफॉर्म बनाया जाता है। पाइपों से तेल निकालकर पाइपलाइन के जरिए तट तक पहुंचाया जाता है।
भारत अभी कितना तेल-गैस बनाता है
भारत दुनिया में कच्चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है। सरकार के मुताबिक भारत अपनी जरूरत का 88% तेल विदेश से खरीदता है। इस पर सालाना करीब 13 लाख करोड़ रुपए खर्च होते हैं।
सिर्फ 12% तेल भारत खुद बना पाता है। इसमें 47% जमीन से और 53% समुद्र से आता है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC – Petroleum Planning and Analysis Cell) के मुताबिक 2025-26 में भारत ने 28 मिलियन मीट्रिक टन तेल बनाया, जबकि खपत 242 मिलियन मीट्रिक टन रही।
गैस के मामले में भारत अपनी जरूरत का करीब 50% खुद बना लेता है। भारत में 26 इलाके ऐसे हैं जहां तेल-गैस के भंडार मौजूद हैं। इनमें मुंबई हाई सबसे बड़ा इलाका है, जहां 1976 से प्रोडक्शन हो रहा है।
क्या समस्या पूरी तरह हल होगी
समुद्र मंथन से भारत की तेल-गैस की जरूरत रातों-रात पूरी नहीं होगी। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ICRA के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट प्रशांत वशिष्ठ का कहना है कि इससे विदेशी आयात सिर्फ 5% तक ही कम होगा।
सरकार का दावा है कि स्कीम सफल हुई तो घरेलू प्रोडक्शन 62 से बढ़कर 80 MMTOE (Million Metric Tonnes of Oil Equivalent) हो जाएगा। तेल-गैस का कुल रिजर्व भी 6 करोड़ MMTOE बढ़ सकता है।
सरकार को उम्मीद है कि इससे तेल आयात बिल करीब 1 लाख करोड़ रुपए तक घट सकता है। लेकिन इसमें 5 से 10 साल का समय लग सकता है। अभी यह गारंटी नहीं है कि खोज में तेल-गैस मिलेगा ही।
एक्सपर्ट कोट्स
क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ICRA के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट प्रशांत वशिष्ठ ने कहा है कि समुद्र मंथन प्रोजेक्ट से भारत का विदेशी तेल-गैस आयात केवल करीब 5% तक ही कम होगा, क्योंकि देश में ऊर्जा खपत लगातार बढ़ रही है।
लोकल कनेक्शन
राजस्थान का सीधा संबंध इस खबर से जुड़ता है। कावेरी बेसिन के तेल-गैस भंडार में राजस्थान के ऑनशोर यानी जमीनी कुएं शामिल हैं। इसके अलावा मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी ऊर्जा जरूरतों पर इस स्कीम का दीर्घकालिक असर पड़ सकता है, क्योंकि दोनों राज्य पेट्रोलियम उत्पादों के लिए बड़े पैमाने पर बाहरी सप्लाई पर निर्भर हैं।
FAQ
- समुद्र मंथन स्कीम की कुल लागत कितनी है?
इस स्कीम पर मार्च 2031 तक 84,084 करोड़ रुपए खर्च होंगे। यह देश का सबसे बड़ा ऑफशोर एक्सप्लोरेशन प्रोजेक्ट है। - इस स्कीम से कितने कुएं खोदे जाएंगे?
पहले फेज में गहरे पानी में 60 कुएं खोदे जाएंगे। इसके लिए 43.2 हजार करोड़ रुपए खर्च होंगे। - क्या इससे भारत की तेल जरूरत पूरी हो जाएगी?
पूरी तरह नहीं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक विदेशी आयात सिर्फ 5% तक ही कम होगा, क्योंकि खपत भी बढ़ रही है।
ये भी पढ़ें...
ईंधन संकट से निपटने की बड़ी तैयारी: बीना में बनेगा देश का सबसे बड़ा तेल भंडार
16 साल की मेहनत लाई रंग : बस्तर में लहलहा रहे लाल चंदन के सैकड़ों पेड़
ओबीसी 27% आरक्षण केस में ओबीसी वर्ग ने खड़े किया सरकार पर सवाल, कल फिर सुनवाई
दुर्ग यूनिवर्सिटी के कुल सचिव गिरफ्तार, बेटे को देते थे महिला कर्मचारी का वेतन