मनरेगा की जगह आया VB-G RAM G तोड़ेगा राज्यों की कमर, जानें आंकड़ों से हकीकत
VB-G RAM G: एक जुलाई से देश में मनरेगा नहीं रहा। उसकी जगह आ गया है VB-G RAM G, यानी विकसित भारत गारंटी रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण)। नाम तो भारी है, लेकिन असर उससे भी भारी हो सकता है, खासकर राज्यों की जेब पर। सोचिए एक बार।
एक राज्य को पिछले साल जितना पैसा खर्च करना पड़ा, अगले साल उससे कई गुना ज्यादा खर्च करना पड़े तो क्या होगा? यही सवाल अब कई राज्य सरकारें केंद्र से पूछ रही हैं।
मनरेगा की विदाई, नया कानून आया
केंद्र सरकार ने बीस साल पुराने मनरेगा कानून की जगह नया VB-G RAM G एक्ट लागू कर दिया है। इसमें रोजगार के दिन सौ से बढ़ाकर 125 कर दिए गए हैं। साथ ही मजदूरी का न्यूनतम स्तर 300 रुपए प्रतिदिन तय हुआ है। लेकिन खर्च का पैटर्न भी बदल गया है, अब ज्यादातर राज्यों को 60:40 के अनुपात में हिस्सा देना होगा।
द हिंदू के एक एनालिसिस के मुताबिक, इससे राज्यों का कुल खर्च 2024-25 के करीब 7 हजार 700 करोड़ रुपए से बढ़कर 2026-27 में कम से कम 51 हजार करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है। मध्य प्रदेश, बिहार और झारखंड ने इस फंडिंग पैटर्न पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई है।
यह आपसे क्यों जुड़ा है
अगर आप मध्य प्रदेश, राजस्थान या छत्तीसगढ़ में रहते हैं तो यह सिर्फ दिल्ली की खबर नहीं है। राज्य सरकार को जितना ज्यादा पैसा मनरेगा जैसी योजना पर खर्च करना पड़ेगा, उतना ही कम बजट सड़क, स्कूल और अस्पताल जैसी दूसरी जरूरतों के लिए बचेगा। गांव में रहने वाले मजदूर परिवार के लिए भी यह सीधा सवाल है, क्या 125 दिन का वादा राज्य के खजाने पर दबाव के बीच पूरा हो पाएगा?
पहले क्या था, बैकग्राउंड
मनरेगा 2005 से चल रहा था। इसका मॉडल मांग आधारित था, यानी जितने मजदूर काम मांगें, उतना पैसा केंद्र देता था। मजदूरी का लगभग पूरा खर्च केंद्र सरकार खुद उठाती थी, जबकि सामग्री यानी मटेरियल कॉस्ट में राज्यों की सीमित हिस्सेदारी होती थी।
इसी वजह से आम धारणा बनी कि बंटवारा करीब 90:10 के अनुपात में होता था। हालांकि यह ठीक-ठीक फिक्स्ड फॉर्मूला नहीं था, बल्कि व्यवहार में बनने वाला औसत अनुपात था।
VB-G RAM G ने इसे पलट दिया है। अब केंद्र हर राज्य के लिए एक तय सीमा, जिसे "मानक आवंटन" कहा गया है, तय करेगा। इस सीमा से ज्यादा जो भी खर्च होगा, चाहे वह मजदूरी हो, बेरोजगारी भत्ता हो या भुगतान में देरी का मुआवजा, उसकी पूरी जिम्मेदारी राज्य पर होगी।
क्या हुआ और क्यों
यहीं से मामला पलटता है। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने योजना लागू होने पर कहा कि कोई भी पात्र ग्रामीण मजदूर एक दिन भी बिना काम के न रहे, यह सरकार की प्राथमिकता है।
मंत्रालय ने 2026-27 के लिए राज्यों को 95 हजार 692.31 करोड़ रुपए का अंतरिम आवंटन (VB-G RAM G विधेयक) भी जारी किया। लेकिन असल बात यह है कि यह आंकड़ा राज्यों के अपने हिस्से को साफ तौर पर नहीं बताता। कितना पैसा राज्य को खुद जोड़ना होगा, और कितना पुराने बकाए के निपटारे में चला जाएगा, यह अब भी स्पष्ट नहीं है।
एक RTI जवाब से यह तस्वीर और साफ होती है। मध्य प्रदेश को फिलहाल 4 हजार 168 करोड़ रुपए का आवंटन मिला है, जो सिर्फ 43 दिन के काम के लिए काफी है। अगर राज्य को वादा किए गए पूरे 125 दिन का काम देना है, तो उसे 20,037 करोड़ रुपए चाहिए होंगे। यानी मौजूदा आवंटन का करीब पांच गुना।
बिहार की स्थिति भी अलग नहीं। उसका मौजूदा आवंटन 4 हजार 477 करोड़ रुपए है, जबकि 125 दिन पूरे करने के लिए 15 हजार 939 करोड़ रुपए चाहिए।
झारखंड को 1804 करोड़ रुपए मिले हैं, पर जरूरत 9 हजार 293 करोड़ रुपए की है। अगर यह पैसा राज्य नहीं जुटा पाए तो? तब सीधा असर मजदूरों के काम के दिनों पर पड़ेगा, या राज्य को दूसरी कल्याणकारी योजनाओं से पैसा काटना पड़ेगा।
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी जोसफ विजय ने एक जुलाई को प्रधानमंत्री मोदी को चिट्ठी लिखकर कहा कि इस बदलाव से राज्य पर 5 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। उन्होंने मांग की कि मजदूरी और प्रशासनिक खर्च पूरी तरह केंद्र उठाए। सामग्री खर्च 75:25 के रेश्यो में बंटे, न कि 60:40 में।
कौन-कौन शामिल है
केंद्र सरकार का पक्ष है कि नया ढांचा पारदर्शिता लाएगा और राज्यों की जवाबदेही बढ़ाएगा। मध्य प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसे राज्य फंडिंग पैटर्न में बदलाव चाहते हैं। तमिलनाडु सरकार अलग से केंद्र पर दबाव बना रही है।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने आरोप लगाया कि राज्यों का करीब 17 हजार 144 करोड़ रुपए बकाया भी अब तक साफ नहीं हुआ, हालांकि केंद्र सरकार (मनरेगा योजना)की तरफ से 2025-26 के लंबित भुगतान का आंकड़ा 20 हजार 422 करोड़ रुपए बताया गया है। दोनों आंकड़ों में अंतर है, इसलिए सटीक बकाया राशि अभी विवाद में है।
दोनों साइड की बात
सरकार का तर्क है कि पुराना 90:10 वाला अनुमान वैसे भी अनौपचारिक था, और नया सिस्टम पहले से ज्यादा पैसा राज्यों तक पहुंचा रहा है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की एक रिसर्च रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पिछले सात साल के औसत आवंटन से तुलना करें तो राज्यों को करीब 17 हजार करोड़ रुपए का शुद्ध फायदा होगा।
दूसरी तरफ विपक्ष और कई राज्य सरकारों का कहना है कि मांग आधारित मॉडल खत्म करके केंद्र ने अपनी जिम्मेदारी सीमित कर दी है। जो राज्य गरीब हैं और जहां मजदूरों की मांग ज्यादा है, वहीं सबसे ज्यादा दबाव पड़ेगा। यह आंकड़ों की लड़ाई है, और दोनों पक्ष अपने-अपने विश्लेषण के साथ मैदान में हैं।
मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ कनेक्शन
मध्य प्रदेश की स्थिति यहां सबसे साफ नजर आती है। राज्य ने बाकायदा RTI के जरिए सामने आई जानकारी के आधार पर फंडिंग पैटर्न पर आपत्ति दर्ज कराई है। मौजूदा आवंटन से पांच गुना ज्यादा पैसे की जरूरत, यह कोई मामूली अंतर नहीं है।
राजस्थान को लेकर एक अलग चिंता सामने आई है। राज्य में मजदूरों की मांग देश में सबसे ज्यादा रहने वाले राज्यों में गिनी जाती है, और कुछ रिपोर्ट्स में आगाह किया गया है कि नए फॉर्मूले के तहत राजस्थान जैसे ज्यादा मांग वाले राज्यों को असल जरूरत से कम आवंटन मिल सकता है।
छत्तीसगढ़ को लेकर तस्वीर उलझी हुई है। एसबीआई की रिसर्च रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ को उन राज्यों में गिना गया है जिन्हें नए फॉर्मूले से फायदा हो सकता है, जबकि आम आलोचना यही है कि 60:40 पैटर्न से हर राज्य पर बोझ बढ़ेगा।
NOTE: (यह आंकड़ा अभी पूरी तरह कन्फर्म नहीं हुआ है, अलग-अलग विश्लेषणों में अलग नतीजे सामने आए हैं)
आगे क्या होगा
केंद्र को अब हर राज्य के लिए वह "मानक आवंटन" तय करने वाला फॉर्मूला सार्वजनिक करना होगा, जिसके आधार पर पैसा बंटेगा। जब तक यह फॉर्मूला साफ नहीं होता, राज्य अपने बजट की योजना ठीक से नहीं बना पाएंगे।
छोटी अवधि में सवाल यह है कि क्या राज्य 125 दिन का वादा निभा पाएंगे, या मजदूरों को कम दिन के काम से समझौता करना पड़ेगा। लंबी अवधि में सवाल यह है कि क्या यह मॉडल वाकई राज्यों को ज्यादा जिम्मेदार बनाएगा, या सिर्फ केंद्र का बोझ राज्यों पर डाल देगा।
एक बात जो आप नहीं जानते थे
पिछले कुछ सालों में मनरेगा के तहत सिर्फ करीब 9.5 प्रतिशत मजदूर ही पूरे 100 दिन का काम पूरा कर पाए थे। यानी जिस योजना पर अभी 125 दिन का नया वादा किया जा रहा है, उसी योजना का पुराना 100 दिन का वादा भी ज्यादातर मजदूरों तक पूरा नहीं पहुंच रहा था। और यही वो जगह है जहां आंकड़ों से ज्यादा असली सवाल मायने रखता है, वादा बढ़ाना आसान है, उसे जमीन पर उतारना मुश्किल।
अब आप क्या करें
- अब आप क्या करें: अपने राज्य में मनरेगा जॉब कार्ड की e-KYC स्थिति चेक करें, नए कार्ड जारी होने तक पुराना कार्ड ही मान्य रहेगा।
- क्यों अभी: फंडिंग बदलाव से भुगतान में देरी की आशंका बढ़ सकती है।
- आगे देखें: केंद्र सरकार की तरफ से हर राज्य का सटीक "मानक आवंटन" फॉर्मूला जल्द जारी होने की उम्मीद है।
यह खबर क्यों जरूरी है
भारतीय संविधान का सातवां शेड्यूल श्रम और रोजगार को समवर्ती सूची में रखता है, यानी केंद्र और राज्य दोनों की जिम्मेदारी बनती है। जब केंद्र अकेले फैसला लेकर वित्तीय बोझ राज्यों पर डालता है, तो यह सहकारी संघवाद की भावना पर सवाल खड़ा करता है। ग्रामीण मजदूरों के लिए रोजगार गारंटी एक कानूनी अधिकार है, इसलिए फंडिंग में कोई भी अस्पष्टता सीधे उनके जीवन स्तर से जुड़ जाती है।
FAQ
- VB-G RAM G क्या है?
यह मनरेगा की जगह लाया गया नया कानून है जो एक जुलाई 2026 से लागू हुआ। इसमें रोजगार के दिन 100 से बढ़ाकर 125 किए गए हैं। - राज्यों पर कितना बोझ बढ़ेगा?
द हिंदू के विश्लेषण के मुताबिक राज्यों का खर्च 2024-25 के 7,700 करोड़ रुपए से बढ़कर 2026-27 में 51,000 करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है। - मध्य प्रदेश पर क्या असर है?
मध्य प्रदेश को 125 दिन का वादा पूरा करने के लिए मौजूदा आवंटन से करीब पांच गुना ज्यादा, यानी 20,037 करोड़ रुपए चाहिए होंगे।
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