भारत-चीन को पछाड़ अमेरिकी बाजार का कैसे चैंपियन बना वियतनाम? कई कंपनियां दीवानी
बात 2008 की है, जब सैमसंग ने उत्तरी वियतनाम के बाक निन्ह शहर में अपना पहला प्लांट लगाया था। आज वहां सैमसंग (samsung) के दो बड़े कॉम्प्लेक्स हैं और करीब 1.6 लाख से ज्यादा लोग काम करते हैं। दुनिया में बिकने वाला हर दूसरा सैमसंग स्मार्टफोन वियतनाम में बनता है। लेकिन ये खबर सेमसंग के बारे में नहीं है। सिर्फ 10 करोड़ आबादी वाले वियतनाम के बारे में है, जिसने अमेरिका के साथ व्यापार के मामले में चीन, मेक्सिको और भारत तीनों को पीछे छोड़ दिया है। यकीन नहीं होता ना?
समझें क्या है मामला
दरअसल वियतनाम ने 2026 की पहली छमाही में अमेरिका के साथ 114 अरब डॉलर का ट्रेड सरप्लस बनाया है। यह आंकड़ा चीन, मेक्सिको और ताइवान से भी ज्यादा है। 2025 में वियतनाम इस लिस्ट में तीसरे नंबर पर था। चीन का सरप्लस था 202 अरब डॉलर और मेक्सिको का 197 अरब डॉलर। ट्रम्प प्रशासन के टैरिफ युद्ध ने यह पूरी तस्वीर पलट दी है।
यह आपसे क्यों जुड़ा है?
आप सोच रहे होंगे यह तो अमेरिका और वियतनाम का मामला है, इससे भारत का क्या लेना-देना? असल में यही वो सवाल है जो हर भारतीय नीति-निर्माताओं को परेशान कर रहा है। भारत की आबादी वियतनाम से करीब 14 गुना ज्यादा है। फिर भी भारत का ट्रेड सरप्लस वियतनाम के आधे से भी कम है। यह सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं है। यह रोजगार, फैक्ट्री और आने वाले सालों में आपके शहर में कौन सी कंपनी निवेश करेगी, इसकी कहानी है।
व्यापारिक साझेदार बन चुके वियतनाम और अमेरिका
1975 में वियतनाम का युद्ध खत्म होने के 50 साल बाद अमेरिका और वियतनाम आज व्यापारिक साझेदार बन चुके हैं। 1994 में अमेरिका ने वियतनाम पर लगा व्यापार प्रतिबंध हटाया। 1995 में दोनों देशों के बीच कूटनीतिक रिश्ते सामान्य हुए। 2001 में एक द्विपक्षीय व्यापार समझौता हुआ। इसके बाद दोनों देशों का व्यापार 1995 के 45 करोड़ डॉलर से बढ़कर 2023 में करीब 124 अरब डॉलर तक पहुंच गया।
कभी बर्बाद देश था वियतनाम
1986 से पहले वियतनाम की हालत बेहद खराब थी। महंगाई दर करीब 700 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। किसान भूखे मर रहे थे। दुकानों की शेल्फ खाली रहती थीं। पूरा देश हर दिन सोवियत संघ से मिलने वाली करीब 40 लाख डॉलर की मदद पर टिका हुआ था। सोचिए, एक ऐसा देश जो अपनी बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं कर पा रहा था।
डोई मोई ने बदली वियतनाम की तस्वीर
वियतनाम की कहानी टैरिफ से नहीं, बल्कि practical सोच से शुरू हुई। 1980 के दशक में हनोई ने "डोई मोई" नाम से आर्थिक सुधार शुरू किए। सोवियत-शैली की केंद्रीय योजना को छोड़ा गया। विदेशी निवेश के लिए दरवाजे खोले गए। औद्योगिक पार्क और बंदरगाह बनाए गए।
डोई मोई क्या था
1986 में वियतनाम की कम्युनिस्ट पार्टी ने एक बड़ा फैसला लिया। इसका नाम रखा गया "डोई मोई", जिसका मतलब है "नवीनीकरण" या "पुनर्जागरण"। यह फैसला केंद्रीय योजना वाली सोवियत-शैली की अर्थव्यवस्था को छोड़कर बाजार आधारित अर्थव्यवस्था अपनाने का था। खास बात यह थी कि यह पूरी तरह पूंजीवाद नहीं था। इसे "समाजवाद-उन्मुख बाजार अर्थव्यवस्था" कहा गया, यानी राजनीतिक सत्ता कम्युनिस्ट पार्टी के पास रही, लेकिन आर्थिक फैसले बाजार को सौंप दिए गए।
असल बदलाव कहां हुए
सबसे पहला और सबसे बड़ा बदलाव खेती में हुआ। पहले जमीन सामूहिक खेती के तहत आती थी, किसान का निजी हिस्सा नहीं होता था। डोई मोई के बाद किसानों को अपनी जमीन पर काम करने और उपज बेचने की आजादी मिली। नतीजा यह हुआ कि वियतनाम, जो कभी अनाज आयात करता था, कुछ ही सालों में चावल का बड़ा निर्यातक बन गया।
दूसरा बदलाव सरकारी कंपनियों में हुआ। 1990 से 1993 के बीच करीब 5,000 सरकारी उद्यमों को या तो बंद किया गया या दूसरों में मिलाया गया। इस दौरान सरकारी नौकरियों में से करीब 10 लाख नौकरियां यानी कुल सरकारी नौकरियों का एक चौथाई हिस्सा खत्म हो गया। यह सुनने में क्रूर लगता है, लेकिन इससे निजी क्षेत्र को सांस लेने की जगह मिली।
तीसरे बदलाद के रूप में विदेशी निवेश के लिए दरवाजे खोले गए। 1995 में वियतनाम आसियान में शामिल हुआ। 2000 में अमेरिका के साथ व्यापार समझौता हुआ। 2007 में वियतनाम विश्व व्यापार संगठन (WTO) का सदस्य बना। हर कदम के साथ वियतनाम दुनिया से और जुड़ता चला गया।
फिर नतीजा क्या निकला
1990 के दशक के आखिर तक करीब 30 हजार निजी कंपनियां बन चुकी थीं। अर्थव्यवस्था हर साल करीब 7 से 9 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ने लगी। 1990 से 2005 के बीच गरीबी दर करीब 50 प्रतिशत से घटकर बहुत नीचे आ गई। महंगाई भी अंततः एक अंक में सिमट गई।
इस तरह जो वियतनाम कभी युद्ध और भूख से जूझ रहा था, वही आज अमेरिका के साथ सबसे बड़ा ट्रेड सरप्लस बना रहा है। सैमसंग, नाइकी, एडिडास जैसी कंपनियां जो आज वियतनाम में फैक्ट्रियां लगाती हैं, वो इसी 1986 के फैसले की नींव पर खड़ी हैं।
संक्षेप में समझें तो: डोई मोई सिर्फ एक आर्थिक नीति नहीं थी, यह एक टूटे हुए देश के फिर से खड़े होने की पूरी रणनीति थी। और चीन के डेंग शियाओपिंग सुधारों की तरह ही, इसने साबित किया कि सख्त कम्युनिस्ट राजनीतिक ढांचे के भीतर भी बाजार अर्थव्यवस्था चल सकती है।
चाइना को कैसे पछाड़ा वियतनाम ने
जब चीन ने खुद को दुनिया की फैक्टरी बना दिया तो आर्थिक समृद्धि के कारण चाइना में मजदूरी बढ़ गई। इससे बड़ी कंपनियों को नया विकल्प तलाशना पड़ा। इसी बीच अमेरिका-चीन रिश्ते बिगड़े तो बड़ी कंपनियों ने "चाइना प्लस वन" रणनीति अपनाई। सोचिए, अगर आप एक कंपनी चला रहे हों और आपको चीन के अलावा एक विकल्प चाहिए तो कौन सा देश चुनेंगे? भौगोलिक रूप से चीन के करीब, सस्ता, राजनीतिक रूप से स्थिर और एशियाई सप्लाई चेन में पहले से जुड़ा हुआ। जवाब है- वियतनाम…
नाइकी और एडिडास से समझें पूरी कहानी
स्पोर्ट्स ब्रांड एडिडास औरनाइकी की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। दोनों कंपनियां अपने जूतों का बड़ा हिस्सा वियतनाम के कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरर्स से बनवाती हैं। क्रॉक्स, प्यूमा, टिम्बरलैंड और वैन्स जैसे ब्रांड भी इसी लाइन में हैं।
2026 की पहली छमाही में वियतनाम का फुटवियर निर्यात करीब 12 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जिसमें से करीब 4.55 अरब डॉलर अकेले अमेरिका गया। यह वियतनाम के कुल फुटवियर निर्यात का करीब 39 प्रतिशत है।
इसी तरह टेक्सटाइल की कहानी भी है। 2025 में जनवरी से जुलाई के बीच वियतनाम ने अमेरिका को कपड़ों की सप्लाई में पहली बार चीन को पीछे छोड़ दिया।
वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका को होने वाले करीब 60 प्रतिशत वियतनामी निर्यात मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स या उपकरण हैं। यह सिर्फ चीनी सामान पर वियतनामी टैग चिपकाने की कहानी नहीं है।
मियामी की एक फर्नीचर कंपनी टीओवी फर्नीचर ने अपना सोर्सिंग 60 प्रतिशत चीन और 25 प्रतिशत वियतनाम से बदलकर 25 प्रतिशत चीन और 60 प्रतिशत वियतनाम कर दिया, सिर्फ टैरिफ की वजह से।
जून 2026 में चीन पर अमेरिका की प्रभावी टैरिफ दर 23.2 प्रतिशत थी। वियतनाम पर सिर्फ 6.5 प्रतिशत। ट्रम्प चाहते हैं कि फैक्ट्रियां वापस अमेरिका आएं, लेकिन नतीजा उल्टा निकला है। फैक्ट्रियां अमेरिका नहीं गईं, वे चीन के बगल वाले देश वियतनाम चली गईं। इधर भारत पर 18 फीसदी टैरिफ लगा हुआ है।
बड़ा सवाल: भारत यहां क्यों पिछड़ गया
अब सवाल यह है कि भारत के पास भी तो यही मौका था। आबादी ज्यादा, मजदूरी सस्ती, फिर चूक कहां हुई?
हडसन इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के मुताबिक हाल के वर्षों में भारत में विदेशी निवेश (FDI) में करीब 43 प्रतिशत की गिरावट आई, जबकि इसी दौरान वियतनाम में यह 32 प्रतिशत बढ़ गया।
सब जानते हैं कि जमीन अधिग्रहण भारत में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है। किसी फैक्ट्री को जमीन मिलने में महीनों नहीं, सालों लग जाते हैं। इसके अलावा राज्य-दर-राज्य अलग श्रम कानून कंपनियों के लिए बड़ी उलझन पैदा करते हैं। एक राज्य में जो नियम चलता है, वो दूसरे राज्य में लागू नहीं होता।
लॉजिस्टिक्स भी एक बड़ा फर्क डालता है। अलग-अलग रिपोर्टों में भारत की लॉजिस्टिक्स लागत जीडीपी के 8 से 14 प्रतिशत के बीच बताई जाती है, जबकि विकसित देशों में यह आमतौर पर 8 से 10 प्रतिशत के आसपास रहती है। यह अनिश्चितता खुद बताती है कि डेटा में एकरूपता की कमी है, फिर भी दिशा यही दिखती है कि भारत की लागत ज्यादा है। बंदरगाहों तक सड़क और रेल कनेक्टिविटी अब भी कमजोर मानी जाती है।
भारत के फैक्ट्री मजदूर की मजदूरी चीन से लगभग एक तिहाई और वियतनाम से भी कम बताई जाती है। फिर भी भारत महंगा पड़ता है, क्योंकि जमीन, बिजली, पूंजी और लॉजिस्टिक्स की लागत मजदूरी से कहीं ज्यादा भारी पड़ जाती है।
कौन-कौन involved है
अमेरिकी सरकार टैरिफ के जरिए घरेलू मैन्युफैक्चरिंग बचाना चाहती है। वियतनामी सरकार निर्यात आधारित ग्रोथ मॉडल पर दांव लगाए बैठी है। सैमसंग, नाइकी, एडिडास जैसी ग्लोबल कंपनियां सस्ती और स्थिर सप्लाई चेन खोज रही हैं। भारत सरकार PLI यानी Production Linked Incentive स्कीम के जरिए इसी निवेश को लुभाने की कोशिश कर रही है, लेकिन नतीजे अब तक सीमित रहे हैं।
आगे क्या होगा
अगर ट्रम्प प्रशासन वियतनाम पर भी टैरिफ बढ़ाता है, तो यह पूरा मॉडल हिल सकता है। रिपोर्टों के मुताबिक अमेरिका ने वियतनामी सामान पर 20 प्रतिशत टैरिफ पहले ही लगाया है, हालांकि व्यापार समझौते पर बातचीत अभी जारी है। भारत के लिए सवाल अलग है। क्या PLI जैसी स्कीमें अकेले काम करेंगी, या जमीन, श्रम कानून और लॉजिस्टिक्स में गहरे सुधार के बिना भारत यह रेस नहीं जीत पाएगा?
एक बात जो आप नहीं जानते थे
वियतनाम की ट्रेड-टू-जीडीपी रेशियो करीब 165 से 170 प्रतिशत है। यानी वियतनाम का कुल व्यापार उसकी पूरी अर्थव्यवस्था से भी बड़ा है। दुनिया में बहुत कम देश ऐसे हैं। दिलचस्प बात यह भी है कि सैमसंग जैसी अकेली एक कंपनी वियतनाम के कुल निर्यात का एक बड़ा हिस्सा बनाती है, जो दिखाता है कि यह ग्रोथ कितनी concentrated है।
यह खबर क्यों जरूरी है?
यह मामला सिर्फ आर्थिक आंकड़ों तक सीमित नहीं है। भारत के संविधान का आर्थिक न्याय और रोजगार सृजन का लक्ष्य इससे सीधे जुड़ता है। जब वियतनाम जैसा छोटा देश मैन्युफैक्चरिंग के दम पर करोड़ों नौकरियां बना रहा है, तो भारत की औद्योगिक नीति पर सवाल उठना स्वाभाविक है। डिजिटल पारदर्शिता के लिहाज से भी व्यापार आंकड़ों की सही समझ जनता तक पहुंचना जरूरी है, क्योंकि टैरिफ और ट्रेड डील सीधे कीमतों और रोजगार पर असर डालते हैं।
FAQ
- वियतनाम का अमेरिका के साथ ट्रेड सरप्लस कितना है?
2026 की पहली छमाही में वियतनाम का अमेरिका के साथ ट्रेड सरप्लस 114 अरब डॉलर रहा। यह चीन, मेक्सिको और ताइवान से भी ज्यादा है। - भारत का अमेरिका के साथ ट्रेड सरप्लस कितना है?
2025 में अमेरिका का भारत के साथ गुड्स ट्रेड डेफिसिट 58.4 अरब डॉलर था। भारत की विशाल आबादी के बावजूद यह वियतनाम से काफी कम है। - वियतनाम को यह फायदा कैसे मिला?
अमेरिका-चीन टैरिफ युद्ध के चलते कंपनियों ने चीन प्लस वन रणनीति अपनाई। सस्ती लागत, स्थिर नीति और चीन से नजदीकी के कारण वियतनाम पहली पसंद बना।
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