19 अगस्त का इतिहास: भारत में कैसे आया अंग्रेजों का पहला एक रुपए का सिक्का
East India Company First Coin: आज जेब से निकालकर जो एक रुपए का सिक्का आप देखते हैं, उसकी कहानी बहुत पुरानी और दिलचस्प है। सोचिए, क्या आपने कभी सोचा है कि भारत में पहली बार अंग्रेजों का ऑफिशियल एक रुपए का सिक्का कब और कैसे बना था?
अगर हम इतिहास के पन्नों को पलटें, तो साल 1757 का जिक्र सबसे खास नजर आता है। यही वह साल था जब भारत में ब्रिटिश राज की नींव मजबूती से रखी गई थी।
प्लासी की ऐतिहासिक जंग के बाद अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी आर्थिक ताकत बढ़ानी शुरू की। उन्होंने महसूस किया कि व्यापार पर पूरी पकड़ बनाने के लिए अपनी खुद की मुद्रा होना जरूरी है।
इसी सोच के साथ भारत की धरती पर अंग्रेजों का पहला सरकारी सिक्का सामने आया। चलिए, इतिहास के पन्नों को थोड़ा और पीछे पलटते हैं और जानते हैं कलकत्ता टकसाल में ढाले गए उस पहले ऐतिहासिक एक रुपए के सिक्के का पूरा सच।
कलकत्ता टकसाल की ऐतिहासिक शुरुआत
सिक्का बनाने के लिए अंग्रेजों को एक ऐसी जगह चाहिए थी, जहां से वे पूरे व्यापार को नियंत्रित कर सकें। इसके लिए कलकत्ता को चुना गया। फिर वहां एक नई टकसाल स्थापित की गई। इस टकसाल में भारी मशीनों की मदद से पहली बार धातु को पिघलाकर सिक्का ढाला गया।
19 अगस्त 1757 का दिन भारतीय बैंकिंग और मुद्रा इतिहास के लिए एक बड़ा मोड़ साबित हुआ। इसी दिन कलकत्ता की टकसाल (India Government Mint, Kolkata) से ईस्ट इंडिया कंपनी का पहला एक रुपए का सिक्का बाहर आया। इस सिक्के के जारी होते ही स्थानीय बाजार में हड़कंप मच गया और व्यापार का तरीका बदलने लगा।
प्लासी की जंग और अलीनगर की संधि
इस सिक्के के बनने के पीछे एक बड़ी राजनीतिक और सैन्य कहानी छिपी हुई है। जून 1757 में प्लासी के मैदान में अंग्रेजों ने बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को हरा दिया था। इस जीत के बाद नवाब पर अंग्रेजों का दबाव बहुत ज्यादा बढ़ गया था।
हार के बाद अंग्रेजों और नवाब के बीच अलीनगर की ऐतिहासिक संधि पर दस्तखत किए गए थे। इस संधि की कई शर्तों में से एक मुख्य शर्त सिक्के ढालने का अधिकार भी थी। अंग्रेजों ने नवाब से साफ कह दिया था कि उन्हें अपनी टकसाल चलाने की पूरी छूट चाहिए।
मुगल बादशाह के नाम से बने सिक्के
भले ही सिक्के अंग्रेजों ने बनाए थे, लेकिन उन पर मुगल बादशाह का नाम ही लिखा जाता था। ऐसा इसलिए किया गया ताकि आम जनता और स्थानीय व्यापारी इन नए सिक्कों को आसानी से स्वीकार कर लें। अंग्रेजों को पता था कि अचानक अपनी तस्वीर छापने से लोग भड़क सकते हैं।
कलकत्ता टकसाल में बने इन शुरुआती सिक्कों पर फारसी भाषा में लिखावट की गई थी। उस समय बंगाल के मुगल गवर्नर और दिल्ली के मुगल सम्राट का नाम ही सिक्कों पर दर्ज होता था। ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी पहचान को बहुत ही चालाकी से इन सिक्कों के पीछे छिपा कर रखा था।
चांदी का शुद्ध सिक्का और उसकी कीमत
ईस्ट इंडिया कंपनी का यह पहला एक रुपए का सिक्का शुद्ध चांदी से तैयार किया गया था। इसका वजन और आकार उस समय के मानक के हिसाब से बहुत सटीक रखा गया था।
उस दौर में इस सिक्के की क्रय शक्ति यानी खरीदने की क्षमता आज के मुकाबले बेहद ज्यादा थी। एक रुपए के इस सिक्के से उस समय महीनों का राशन और जरूरी सामान आसानी से खरीदा जा सकता था।
सिक्के का वजन लगभग 11.6 ग्राम के आसपास रखा गया था, जो मुगल सिक्कों के समान था। इस समानता की वजह से व्यापारियों को लेन-देन में कोई परेशानी नहीं हुई।
व्यापार पर अंग्रेजों का कब्जा
इस सिक्के के बाजार में आते ही ईस्ट इंडिया कंपनी का दबदबा तेजी से बढ़ने लगा। अब अंग्रेजों को स्थानीय राजाओं या नवाबों की मुद्रा पर निर्भर नहीं रहना पड़ता था। वे अपने बनाए सिक्कों से सीधे सामान खरीदते थे और टैक्स का भुगतान भी इसी मुद्रा में लेते थे।
धीरे-धीरे बंगाल के बाकी हिस्सों में भी इस सिक्के की मांग बहुत तेजी से बढ़ने लगी। अन्य रियासतों के सिक्कों की कीमत घटने लगी और ब्रिटिश सिक्के की साख बढ़ती गई। इस एक सिक्के ने भारत के पारंपरिक व्यापारिक ढांचे को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया।
पुराने सिक्का तंत्र का खात्मा
अंग्रेजों के आने से पहले भारत में हर छोटे-बड़े नवाब और राजा की अपनी अलग टकसाल होती थी। इस वजह से देश में सैकड़ों तरह के सिक्के एक साथ चलन में रहते थे।
आम व्यापारियों को हर शहर में सिक्का बदलने के लिए भारी बट्टा या कमीशन देना पड़ता था। ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस व्यवस्था को खत्म करने के लिए अपने सिक्के का दायरा बढ़ाया।
उन्होंने एक समान वजन और एक समान शुद्धता वाला सिक्का पेश किया। इससे व्यापारियों का भरोसा जीता गया और देखते ही देखते पुरानी टकसालों पर ताले लगने शुरू हो गए।
सिक्कों पर ब्रिटिश प्रतीकों का आना
शुरुआत में मुगल बादशाह का नाम इस्तेमाल करने के बाद अंग्रेजों ने धीरे-धीरे अपना असली रूप दिखाया। 19वीं सदी की शुरुआत तक आते-आते सिक्कों का डिजाइन पूरी तरह बदल दिया गया।
फारसी भाषा की जगह अंग्रेजी शब्दों और ब्रिटिश क्राउन के प्रतीकों ने ले ली। साल 1835 के सिक्का अधिनियम के बाद भारत में एक समान सिक्का प्रणाली लागू कर दी गई।
इस नए कानून के तहत बने सिक्कों पर ब्रिटेन के राजा या रानी का चित्र साफ दिखने लगा। इस तरह साल 1757 में शुरू हुआ सफर साल 1835 तक आते-आते पूर्ण ब्रिटिश मुद्रा में बदल गया।
इतिहास की एक अनमोल धरोहर
साल 1757 में कलकत्ता टकसाल में बना वह पहला एक रुपए का सिक्का आज इतिहास का अनमोल हिस्सा है। दुनियाभर के सिक्का संग्रहकर्ताओं के लिए यह सिक्का एक बहुत ही दुर्लभ और कीमती चीज माना जाता है। नीलामी में इस एक सिक्के की कीमत लाखों रुपए तक लगाई जाती है।
यह सिक्का सिर्फ धातु का एक टुकड़ा नहीं है, बल्कि भारत की गुलामी की शुरुआत का गवाह भी है। इसने यह दिखाया कि कैसे एक व्यापारिक कंपनी ने मुद्रा के दम पर पूरे देश की अर्थव्यवस्था पर कब्जा कर लिया। आज भी यह इतिहास प्रेमियों को आकर्षित करता है।
यह ऐतिहासिक एक रुपये का सिक्का सिर्फ व्यापारिक लेनदेन का जरिया नहीं। बल्कि भारत में ब्रिटिश हुकूमत की शुरुआत का सबसे बड़ा फाइनेंसियल प्रूफ है।
इसने यह साबित किया कि कैसे ईस्ट इंडिया कंपनी ने स्मार्ट इकनोमिक प्लानिंग और करेंसी सिस्टम के दम पर पूरे भारतीय व्यापार और अर्थव्यवस्था पर अपना कंट्रोल जमाया। इसलिए, सिक्के के इतिहास को समझना हमें भारत के राजनीतिक और आर्थिक बदलावों की एक बहुत गहरी अंतर्दृष्टि देता है।
Credit:
- भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) Monetary Museum Records
- British Museum Archives (ईस्ट इंडिया कंपनी कॉइनेज)
- भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार (National Archives of India)
19 अगस्त की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाएं
आज का इतिहास मेंहर दिन का अपना एक अलग महत्व होता है। 19 अगस्त का दिन भी इतिहास (आज की यादगार घटनाएं) में कई महत्वपूर्ण घटनाओं के लिए दर्ज है। इस दिन दुनिया में कई ऐसी घटनाएं हुईं, जिन्होंने इतिहास की दिशा बदल दी।
आइए जानते हैं 19 अगस्त (आज की तारीख का इतिहास) को भारत और विश्व में घटी कुछ प्रमुख घटनाओं के बारे में, जो आपके सामान्य ज्ञान को बढ़ा सकती हैं-
विश्व और भारत इतिहास की प्रमुख घटनाएं...
- 1666: छत्रपति शिवाजी महाराज आगरा में औरंगजेब की कैद से फलों की टोकरी में छिपकर सुरक्षित फरार हुए।
- 1757: ईस्ट इंडिया कंपनी ने कलकत्ता टकसाल से भारत में पहला एक रुपये का सरकारी सिक्का ढाला।
- 1796: स्पेन और फ्रांस ने ब्रिटेन के खिलाफ सैन्य गठबंधन पर हस्ताक्षर किए।
- 1919: अफगानिस्तान ने ब्रिटेन से अपनी पूर्ण स्वतंत्रता की घोषणा की।
- 1944: द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारत से जापान की अंतिम सैन्य टुकड़ी को खदेड़ा गया।
- 1949: भुवनेश्वर आधिकारिक तौर पर ओडिशा राज्य की राजधानी बना।
- 1964: दुनिया के पहले भू-स्थिर संचार उपग्रह 'सिनकोम 3' का सफल प्रक्षेपण हुआ।
- 1977: सोवियत संघ ने सेरी सागान परीक्षण स्थल पर परमाणु परीक्षण किया।
- 1978: ईरान के आबादान स्थित सिनेमाघर में भीषण आग लगने से 422 लोगों की मौत हुई।
- 1998: अमेरिका ने सूडान और अफगानिस्तान में आतंकवादी ठिकानों पर क्रूज मिसाइलों से हमला किया।
- 1999: भारत के परमाणु नीति मसौदे से नाराज होकर जी-8 देशों ने सभी आर्थिक मदद रोकने की घोषणा की।
- 2000: हिना जलाली विश्व की पहली संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संरक्षक प्रतिनिधि नियुक्त की गईं।
- 2003: अमेरिका ने पाकिस्तान को 5 वर्षों में 11 करोड़ 57 लाख डॉलर का वित्तीय अनुदान देने का निर्णय लिया।
- 2004: डच तैराक पीटर वान डेन हुगेनबैंड ओलंपिक इतिहास के सबसे तेज तैराक बने।
- 2005: श्रीलंका सरकार और लिट्टे (LTTE) के बीच शांति वार्ता फिर से शुरू करने पर सहमति बनी।
- 2006: इस्रायली सेना ने फलस्तीनी सरकार के उपप्रधानमंत्री को गिरफ्तार किया।
- 2007: अंतरिक्ष स्टेशन पर गए स्पेस शटल एंडेवर के यात्रियों ने सफलतापूर्वक स्पेसवॉक पूरा किया।
- 2008: पाइमान की मोसारत कदीय और एसोचैम के अध्यक्ष सज्जन जिंदल ने भारत-पाक व्यापार रिपोर्ट जारी की।
- 2009: नौसेना कमांडर दिलीप डोंडे स्वदेशी नौका 'महादेई' से संपूर्ण विश्व की जल-यात्रा पर रवाना हुए।
- 2009: इराक की राजधानी बगदाद में हुए सिलसिलेवार बम विस्फोटों में 101 लोगों की मौत और 565 घायल हुए।
- 1887: एस. सत्यमूर्ति - भारत के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और क्रांतिकारी नेता।
- 1891: हरिशंकर शर्मा - भारत के प्रसिद्ध साहित्यकार, कवि, व्यंग्यकार और पत्रकार।
- 1907: हज़ारी प्रसाद द्विवेदी - हिन्दी के महान निबंधकार, उपन्यासकार, आलोचक और शोधकर्ता।
- 1908: उस्ताद अब्दुल राशिद ख़ान - पद्म भूषण से सम्मानित प्रसिद्ध हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायक।
- 1911: आरसी प्रसाद सिंह - भारत के प्रसिद्ध कवि, कथाकार और एकांकीकार।
- 1918: डॉ. शंकरदयाल शर्मा - भारत के नौवें राष्ट्रपति।
- 1928: शिवप्रसाद सिंह - हिन्दी के प्रख्यात साहित्यकार और कथाकार।
- 1941: जसवंत सिंह रावत - 1962 के भारत-चीन युद्ध के जांबाज महावीर चक्र विजेता सैनिक।
- 1950: सुधा मूर्ति - इन्फोसिस फाउंडेशन की सह-संस्थापक, प्रसिद्ध समाजसेविका और लेखिका।
- 1967: सत्या नडेला - दिग्गज वैश्विक आईटी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO)।
- 1982: अरुंधति काटजू - धारा 377 के ऐतिहासिक फैसले के लिए जानी जाने वाली भारतीय अधिवक्ता।
- 1985: विजय कुमार - लंदन ओलंपिक में रजत पदक जीतने वाले प्रसिद्ध भारतीय निशानेबाज।
- 2019: मोहम्मद ज़हूर ख़य्याम - भारतीय सिनेमा के महान और कालजयी संगीतकार।
- 2019: जगन्नाथ मिश्रा - बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ भारतीय राजनीतिज्ञ।
- 2013: रोनाल्ड स्टुअर्ट मेक्ग्रेगॉर - अंतर्राष्ट्रीय स्तर के प्रसिद्ध भाषा विज्ञानी और हिन्दी साहित्य के इतिहासकार।
- 1993: उत्पल दत्त - हिन्दी और बांग्ला फिल्मों के दिग्गज अभिनेता, नाटककार और निर्माता।
- 1987: लक्ष्मी नारायण मिश्र - हिन्दी के प्रसिद्ध नाटककार और एकांकीकार।
- 1987: सचिन नाग - एशियाई खेलों में भारत को पहला स्वर्ण पदक दिलाने वाले प्रसिद्ध तैराक।
- 1927: स्वामी सारदानन्द - स्वामी रामकृष्ण परमहंस के प्रमुख शिष्यों में से एक।
- 1909: बदरुद्दीन तैयब जी - प्रसिद्ध वकील, बॉम्बे हाई कोर्ट के पहले भारतीय जज और कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष।
- विश्व फ़ोटोग्राफ़ी दिवस (World Photography Day): फोटोग्राफी के क्षेत्र में कला और विज्ञान का जश्न मनाने का दिन।
- विश्व मानवीय दिवस (World Humanitarian Day): मानवीय कार्यों में लगे कार्यकर्ताओं और संकट में फंसे लोगों को समर्पित दिवस।
ये खबरें भी पढ़ें...
31 जुलाई का इतिहास: आज ही के दिन से हुई थी मोबाइल संचार क्रांति की शुरुआत
साल 1905 में आज ही के दिन कोलकाता से शुरू हुआ था स्वदेशी आंदोलन का इतिहास
27 जुलाई का इतिहास: कैसे मिला टाइटैनिक का मलबा, जानें समुद्र की गहराई का सच
28 जुलाई का इतिहास: कौन थे विलियम हर्शेल, जिन्होंने फिंगरप्रिंट को बनाया पहचान का जरिया