पुलिस सुधार के नाम पर ढांचा खड़ा हुआ, नतीजे तो नहीं आए
कानून-व्यवस्था और पुलिस सुधार: दो दशक बाद एक समीक्षा
कानून और व्यवस्था बनाए रखना किसी भी सरकार की सबसे बड़ी परीक्षा होती है। यहीं पर सरकार और आम नागरिक आमने-सामने होते हैं। भारत के संविधान में पुलिस और सार्वजनिक व्यवस्था राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है।
वहीं, बीस सालों से पुलिस व्यवस्था को एक अदालती फैसले ने भी प्रभावित किया है - वह है प्रकाश सिंह बनाम भारत सरकार का ऐतिहासिक मामला।
इस फैसले का मकसद था:
- पुलिस को राजनीतिक दबाव से बचाना
- पेशेवर आजादी देना
- नौकरी में स्थिरता सुनिश्चित करना
- जवाबदेही के लिए संस्थाएं बनाना
ये सब जरूरी और सही मकसद थे। लेकिन बीस साल बाद यह देखना जरूरी है कि क्या ये सुधार वाकई काम आए?
योजना से जमीन तक आखिर क्या बदला?
असली सवाल यह नहीं है कि सुधार की नीयत सही थी या नहीं, वह तो थी ही। असली सवाल यह है कि नतीजे क्या रहे?
- क्या मनमाने तबादले कम हुए?
- क्या जांच में निष्पक्षता आई?
- क्या लोगों का पुलिस पर भरोसा बढ़ा?
- क्या FIR (प्राथमिकी) समय पर दर्ज होने लगी?
- क्या अपराधियों को सजा दिलाने की दर बढ़ी?
इन सवालों के जवाब अभी तक ठीक से सामने नहीं आए हैं। कई राज्यों में सुरक्षा आयोग, स्थापना बोर्ड और शिकायत प्राधिकरण जैसी संस्थाएं कागज पर तो बनी हैं, लेकिन उनका असर जमीन पर बहुत कम दिखता है।
सिर्फ ढांचा खड़ा करने से सुधार नहीं होता- नतीजे देखने होंगे।
संविधान और राज्यों की जिम्मेदारी
कानून-व्यवस्था राज्य का विषय है- इसके पीछे एक कारण है। अगर दंगे होते हैं, माफिया बढ़ता है या लोगों का भरोसा टूटता है तो जनता मुख्यमंत्री से जवाब मांगती है।
ऐसे में पुलिस महानिदेशक (DGP) की नियुक्ति बेहद अहम फैसला होता है। राज्य सरकार को ऐसा अधिकारी चाहिए जो सिर्फ वरिष्ठ न हो, बल्कि:
- संकट में सही निर्णय ले सके
- ईमानदार हो
- पुलिस बल और जनता का विश्वास जीत सके
UPSC पैनल की समस्या
अभी का नियम यह है कि DGP की नियुक्ति संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) द्वारा बनाई गई सूची से होती है।
मकसद निष्पक्षता है- लेकिन तरीके में खामी है।
व्यवहार में यह सूची ज्यादातर वरिष्ठता और सर्विस रिकॉर्ड पर आधारित होती है। वरिष्ठ अधिकारियों की ACR (वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट) में लगभग सभी को बहुत अच्छा या उत्कृष्ट लिखा होता है तो फिर असली नेतृत्व क्षमता कैसे पहचानें?
पुलिस की नौकरी फाइलों तक सीमित नहीं है। इसमें चाहिए:
- संकट में सूझबूझ
- तनाव में संयम
- संवेदनशील मामलों में निष्पक्षता
- जनता और पुलिसकर्मियों का भरोसा
ये सब कागजी रिकॉर्ड में नहीं दिखता। इसलिए एक 360-डिग्री मूल्यांकन की जरूरत है जिसमें:
- साथी अधिकारियों और अधीनस्थों की राय
- मैदानी अनुभव
- जनता के बीच विश्वसनीयता यह सब शामिल हो।
चुनाव आयोग से सीख
एक अच्छा उदाहरण चुनाव आयोग का है। चुनाव के समय आयोग पुलिस नेतृत्व को निष्पक्षता और विश्वसनीयता के आधार पर परखता है और जरूरत पड़े तो अधिकारियों का तबादला करता है।
सवाल यह है- यदि चुनाव जैसे नाजुक समय में नेतृत्व की गुणवत्ता परखी जाती है तो हमेशा के लिए DGP चुनते वक्त यही मानक क्यों नहीं अपनाए जाते?
आजादी और जवाबदेही में संतुलन
पुलिस नेतृत्व को राजनीतिक दखल से बचाने का मकसद था- पेशेवर निष्पक्षता। लेकिन जमीनी समस्याएं अभी भी बनी हैं:
- FIR दर्ज न होना - सुप्रीम कोर्ट के ललिता कुमारी फैसले के बाद भी यह समस्या जारी है।
- थाने पर जनता का भरोसा - यह अभी भी कमजोर है।
इसका मतलब यह है कि ऊपर की आजादी से नीचे का बदलाव अपने आप नहीं आता। प्रशिक्षण, निगरानी, और नेतृत्व की संस्कृति भी उतनी ही जरूरी है।
क्या मापा जाए?
बीस साल बाद यह देखना जरूरी है:
- निगरानी संस्थाएं कितनी सक्रिय हैं?
- अधिकारियों का कार्यकाल कितना स्थिर रहा?
- FIR दर्ज होने की स्थिति क्या है?
- जांच की गुणवत्ता कैसी है?
- सजा की दर क्या है?
- जनता का पुलिस पर भरोसा बढ़ा या घटा?
एक और जरूरी सवाल - फिक्स्ड टेन्योर का असर
DGP के लिए तय कार्यकाल की व्यवस्था का मकसद अच्छा था ताकि अधिकारी राजनीतिक दबाव के बिना काम कर सकें।
वहीं, एक अनजाने नुकसान पर भी ध्यान देना जरूरी है: क्या इस व्यवस्था की वजह से कई काबिल अधिकारी बिना नेतृत्व का मौका मिले ही रिटायर हो गए? इसका असर मनोबल, उत्तराधिकार योजना और संस्थागत एकता पर पड़ सकता है- इसका अध्ययन होना चाहिए। हालांकि यह भी स्वीकार किया जाना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप पुलिस सुधार को संवैधानिक ध्यान में लाने की एक महत्वपूर्ण और आवश्यक कदम था।
सुधार रोकना नहीं और बेहतर करना है
प्रकाश सिंह मामले की समीक्षा का मतलब उसे पलटना नहीं है। सुप्रीम कोर्ट खुद भी मानता है कि समय के साथ संस्थागत निर्देशों को परिष्कृत किया जा सकता है।
मकसद वही रहे- पर तरीके बेहतर हों।
क्या यह सोच अन्य क्षेत्रों में भी लागू हो?
अगर DGP के लिए तय कार्यकाल से वाकई शासन बेहतर हुआ है, तो मुख्य सचिव के पद पर भी यही सोचा जा सकता है। वहीं, यह फैसला सिर्फ सबूतों के आधार पर हो - केवल अनुमान से नहीं।
निष्कर्ष
प्रकाश सिंह का फैसला भारतीय शासन में एक मील का पत्थर है - इसका सम्मान होना चाहिए।
लेकिन कोई भी सुधार हमेशा के लिए जड़ नहीं हो सकता।
सवाल यह नहीं कि सुधार जरूरी था या नहीं - सवाल यह है कि क्या उसके नतीजे वैसे आए जैसे उम्मीद थी।
डेटा के आधार पर समीक्षा करना सुधार को रोकना नहीं, बल्कि उसे आगे बढ़ाना है।
एक परिपक्व लोकतंत्र में सुधार सिर्फ कागज पर नहीं, जमीन पर दिखना चाहिए।
लेखक: आईपीएस डॉ. शैलेंद्र श्रीवास्तव - मध्यप्रदेश सरकार में 34 वर्षों से अधिक सेवा के बाद DGP और अध्यक्ष, MP पुलिस आवास एवं अधोसंरचना विकास निगम के पद से सेवानिवृत्त।
FAQ
- प्रकाश सिंह फैसला क्या है?
प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (2006) सुप्रीम कोर्ट का वह ऐतिहासिक निर्णय है जिसमें पुलिस को राजनीतिक दबाव से बचाने, कार्यकाल में स्थिरता लाने और जवाबदेही के संस्थागत तंत्र बनाने के निर्देश दिए गए थे। - DGP की नियुक्ति UPSC पैनल से क्यों होती है?
यह प्रकाश सिंह निर्णय के अनुसार होता है। उद्देश्य है DGP नियुक्ति में वस्तुनिष्ठता लाना और राजनीतिक हस्तक्षेप रोकना। UPSC वरिष्ठता और सेवा अभिलेखों के आधार पर पैनल तैयार करता है। - FIR न लिखे जाने पर क्या कानून है?
ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश (2013) में सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञेय अपराध में FIR अनिवार्य किया। बावजूद इसके, थाना स्तर पर देरी की शिकायतें आज भी आती हैं। - पुलिस सुधार में अब क्या बदलना चाहिए?
DGP चयन में 360-degree नेतृत्व मूल्यांकन, निगरानी संस्थाओं को वास्तव में कार्यात्मक बनाना, और FIR पंजीकरण दर, सजा दर जैसे outcome indicators की नियमित सार्वजनिक रिपोर्टिंग आवश्यक है।
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