मी लॉर्ड! कॉकरोच और परजीवियों की ओर से एक विनम्र आग्रह

The Sootr | May 16, 2026, 11:00 IST
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यह लेख राज्यसभा सांसद मनोज झा द्वारा मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणियों पर उठाए गए सवालों का विश्लेषण करता है। इसमें अमानवीकरण की भाषा और लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण पर चर्चा की गई है।

विचलित करती भाषा और संवैधानिक गरिमा

माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय, आपकी हालिया टिप्पणियों में प्रयुक्त कॉकरोच और परजीवी जैसे शब्दों ने देश के अनेक नागरिकों की तरह मुझे भी गहराई से विचलित किया है। चिंता केवल शब्दों के चयन की नहीं है, बल्कि उस दृष्टिकोण की है जिसकी झलक इन टिप्पणियों में दिखाई देती है।



जब एक संवैधानिक लोकतंत्र के मुख्य न्यायाधीश बेरोजगार युवाओं, आरटीआई कार्यकर्ताओं, मीडिया कर्मियों और असहमति व्यक्त करने वालों की तुलना कॉकरोच और परजीवी से करते हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत आक्रोश का मामला नहीं रह जाता। यह लोकतंत्र की मूल आत्मा और उसकी बुनियादी संवैधानिक संस्कृति को आहत करने लगता है।



अमानवीकरण की भाषा और न्यायिक परंपरा

महोदय, किसी संवैधानिक पद की नैतिक शक्ति केवल उसके अधिकारों से नहीं आती, बल्कि उससे आती है उस संयम, संवेदनशीलता और संवैधानिक नैतिकता से, जिसका वह प्रतिनिधित्व करता है। हमारे न्यायिक इतिहास की यही सबसे सुंदर परंपरा रही है कि अदालतें शब्दों से भी लोकतंत्र को गरिमा प्रदान करती रही हैं।



अमानवीकरण की भाषा- चाहे वह कॉकरोच हो या परजीवी, इतिहास में हमेशा असहिष्णुता (कट्टरता) की पहली शरणस्थली रही है। कभी लगता था कि इस तरह की भाषा न्यायपालिका की चौखट तक नहीं पहुंचेगी, लेकिन अब महसूस होता है कि शायद हम ही बहुत मासूम थे।



मी लॉर्ड, लोकतंत्र इसलिए जीवित रहते हैं क्योंकि संस्थाएं आलोचना को लोकतांत्रिक आवश्यकता मानती हैं, किसी प्रदूषण की तरह नहीं।



युवा पीढ़ी का संघर्ष और व्यवस्था की जिम्मेदारी

मैं उन करोड़ों भारतीयों में शामिल हूं जिन्हें यह बेहद असहज और पीड़ादायक लगता है कि भारत के बेरोजगार युवाओं को कॉकरोच कहा जा रहा है और वह भी ऐसे व्यक्ति द्वारा, जो इस कठिन और बेचैन समय में उम्मीद के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन है।



क्या यह सच नहीं कि ये युवा एक गहरे आर्थिक और संस्थागत संकट के शिकार हैं, जिसका सामना स्वयं व्यवस्था को ईमानदारी से करना चाहिए? आज करोड़ों शिक्षित युवा घटते अवसरों, संविदा आधारित असुरक्षा, भर्ती में देरी, प्रश्नपत्र लीक और बढ़ती निराशा के बीच अपना जीवन जी रहे हैं। उनकी बेचैनी और आक्रोश को परजीविता कह देना उस पीढ़ी का उपहास करना है, जो पहले ही अनिश्चितताओं का भारी बोझ ढो रही है।



जवाबदेही के स्तंभ और जी-हुजूरी का खतरा

उतनी ही गंभीर चिंता आपकी उन टिप्पणियों से भी उत्पन्न होती है, जिनमें आरटीआई कार्यकर्ताओं और मीडिया के एक बड़े हिस्से को संदेह की दृष्टि से देखा गया। सूचना के अधिकार का आंदोलन उन साधारण नागरिकों के संघर्ष से निकला था, जिन्होंने सत्ता से पारदर्शिता की मांग की।



अनेक आरटीआई कार्यकर्ताओं ने भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलताओं को उजागर करने के लिए भारी व्यक्तिगत जोखिम उठाए हैं। कई लोगों ने तो अपनी जान तक गंवाई है। खोजी पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता, अपनी सीमाओं और अपूर्णताओं के बावजूद, लोकतांत्रिक जवाबदेही के आवश्यक स्तंभ हैं।



क्या हर आलोचक को व्यवस्था-विरोधी तत्व के रूप में चित्रित करना उचित है? ऐसा दृष्टिकोण एक खतरनाक परिस्थिति निर्मित करता है, जहां जी हां हुजूरी को देशभक्ति और प्रश्न पूछने को शत्रुता या राष्ट्र-विरोध में बदल दिया जाता है।



असहमति की रक्षा बनाम संस्थागत भय

महोदय, न्यायपालिका का संवैधानिक स्थान इसलिए विशिष्ट है क्योंकि उससे अपेक्षा की जाती है कि वह असहमति की आवाजों की रक्षा करेगी, न कि उन्हें कलंकित करेगी। अदालतों ने ऐतिहासिक रूप से सरकारों को यह याद दिलाया है कि आलोचना देशद्रोह नहीं होती, असहमति राष्ट्र-विरोध नहीं होती और बेहतर जवाबदेही की मांग कोई विध्वंसक गतिविधि नहीं है।



यदि नागरिकों को यह भय सताने लगे कि संस्थाओं की आलोचना करने पर उन्हें अपमान या प्रतिशोध का सामना करना पड़ सकता है और वह भी उन्हीं संस्थाओं से जो उनकी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए बनी हैं, तो लोकतांत्रिक अनुबंध कमजोर पड़ने लगता है।



अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुशासन की सीमा

सोशल मीडिया पोस्टों को लेकर की गई टिप्पणियां और वकीलों की ऑनलाइन अभिव्यक्तियों की जांच कराने के सुझाव भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संदर्भ में गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं। पेशेगत अनुशासन निस्संदेह आवश्यक है और यदि फर्जी डिग्रियां हैं तो उनकी जांच भी अवश्य होनी चाहिए। लेकिन आलोचना, असहमति या असहज प्रश्नों को संस्थागत संदेह का आधार नहीं बनाया जा सकता। अन्यथा जवाबदेही और भयोत्पादक (भय पैदा करने वाला) के बीच की रेखा खतरनाक रूप से धुंधली हो जाती है।



सार्वजनिक विमर्श की मर्यादा और न्यायालय से अपेक्षा

मी लॉर्ड, सार्वजनिक संस्थाओं, विशेषकर संवैधानिक अदालतों से यह अपेक्षा होती है कि वे ऐसी भाषा में संवाद करें जो सार्वजनिक विमर्श को ऊंचा उठाए, न कि उसे और अधिक कठोर और असभ्य बनाए। ऐसे समय में, जब देश पहले ही राजनीतिक संवाद में गिरती शालीनता का साक्षी बन रहा है, न्यायपालिका से यह उम्मीद थी कि वह संवैधानिक संयम और गरिमा की अंतिम शरणस्थली बनी रहेगी।



आलोचक शत्रु नहीं, लोकतांत्रिक भागीदार हैं

प्रश्न यह नहीं है कि न्यायाधीश को क्रोध आ सकता है या नहीं। आप भी मनुष्य हैं। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या संवैधानिक अधिकार और सार्वजनिक जीवन नागरिकों के प्रति तिरस्कार की भाषा वहन कर सकते हैं? लोकतंत्र आलोचना से कमजोर नहीं होते; वे तब कमजोर होते हैं जब शक्तिशाली संस्थाएं आलोचकों को लोकतांत्रिक भागीदारों के बजाय शत्रु की तरह देखने लगती हैं।



लोकतंत्र की श्वास और नागरिक अधिकार

अंत में केवल इतना कहना चाहता हूं कि भारत के बेरोजगार युवा, आरटीआई कार्यकर्ता, स्वतंत्र पत्रकार और असहमति रखने वाले नागरिक लोकतंत्र में रहने वाले कीड़े-मकोड़े नहीं हैं। वे उन अनेक स्वरों में शामिल हैं, जिनसे लोकतंत्र सांस लेता है और उम्मीद का दायरा विस्तृत होता है।



नोट- इस लेख के लेखक RJD सांसद मनोज झा हैं। इस लेख में उनके निजी विचार दिए गए हैं।

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