राम मंदिर चंदा चोरी विवाद: करोड़ों हिंदुओं की आस्था से हुई बेईमानी, कौन है जिम्मेदार?

Sameer Chougaonkar | Jun 22, 2026, 13:27 IST
राममंदिर चंदा चोरी विवाद समीर चौगांवकर
अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी का मामला तूल पकड़ गया है। SIT जांच पूरी, रिपोर्ट सीएम योगी को सौंपी जाएगी। इस समय करोड़ों हिंदुओं की आस्था और ट्रस्ट की साख दांव पर…

राम मंदिर में रावण कौन? आस्था की चोरी का पूरा सच

22 जनवरी 2024 को अयोध्या में भव्य राम प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि आज से राष्ट्र की आस्था का नया सूर्योदय है। यह प्राण प्रतिष्ठा समृद्ध भारत का काल बिंदु है। यह अवसर उत्सव का क्षण तो है ही, भारतीय समाज की परिपक्वता के बोध का क्षण भी है।



मोदी ने अपनी बात को जारी रखते हुए कहा था कि आज हमारे राम आ गए हैं। मुझे पक्का विश्वास है कि जो आज घटित हुआ है, इसकी अनुभूति विश्व के कोने-कोने में हो रही होगी। गुलामी की मानसिकता को तोड़कर उठ खड़ा होता राष्ट्र ऐसे ही नवइतिहास का सृजन करता है। हजार साल बाद भी लोग इस पर चर्चा करेंगे।



मोदी ने विपक्ष पर कटाक्ष करते हुए कहा था कि एक समय था जब कुछ लोग कहते थे कि राम मंदिर बना तो आग लग जाएगी। राम आग नहीं, ऊर्जा है। राम विवाद नहीं, समाधान है।



भागवत का वादा - रामराज्य का

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपने संबोधन में कहा था कि अनेक पीढ़ियों ने बलिदान देकर यह आनंद का दिन राष्ट्र को उपलब्ध कराया है। राम राज्य कैसा था, यह याद रखना होगा। जिस धर्म की स्थापना के लिए श्रीराम का अवतार हुआ था, उस धर्म के अनुकूल ही आचरण रखना सभी का कर्तव्य है। राम आए हैं, तो अयोध्या में रामराज्य भी लौट आया है।



जब राम मंदिर से खबर छनकर बाहर आई

मोदी और भागवत ने राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के समय जब यह सब कहा था, तब उन्हें कल्पना भी नहीं होगी कि राम मंदिर के कर्ता-धर्ताओं के भ्रष्ट आचरण से ऐसी आग लगेगी कि उस विवाद का समाधान किसी के लिए भी आसान नहीं होगा।



राम मंदिर में चोरी के प्रकरण और इसकी देश-दुनिया में चर्चा ने भाजपा और संघ परिवार को बुरी तरह आहत कर दिया है। अपने ही दांत और अपने ही होंठ के कारण संघ और बीजेपी में अजीब-सी खामोशी छाई हुई है। सबने चुनी हुई चुप्पी साध ली है।



अखिलेश के ट्वीट से पकड़ा तूल

दरअसल जून की शुरुआत में राम मंदिर से चोरी की खबर छनकर बाहर आने लगी थी। वहीं, इस मामले में 7 जून को अखिलेश यादव के ट्वीट के बाद राम मंदिर चढ़ावा चोरी ने तूल पकड़ा।





मामले की गंभीरता को देखते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 13 जून को तीन सदस्यीय SIT का गठन कर दिया। इस कमेटी में लखनऊ के डिवीजनल कमिश्नर विजय विश्वास पंत, पुलिस महानिरीक्षक किरण एस और उत्तर प्रदेश वित्त विभाग के विशेष सचिव नील रतन शामिल थे।



सात दिन अयोध्या में डेरा डालने और राम मंदिर ट्रस्ट के लगभग सभी पदाधिकारियों और कर्मचारियों से पूछताछ के बाद SIT तमाम फाइंडिंग को लेकर लखनऊ पहुंच गई है।



SIT की जांच का दायरा केवल कथित धनराशि के गबन तक सीमित नहीं रहा। दान की गिनती, संग्रहण, लेखांकन और बैंकिंग व्यवस्था की पूरी प्रक्रिया की समीक्षा भी इसमें शामिल थी।



एक-दो दिन में SIT अपनी जांच रिपोर्ट मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सौंप देगी।



ट्रस्ट को समझिए, उसके बाद राजनीति को

ट्रस्ट कब बना और कौन-कौन है?

  1. मंदिर परिसर को कब्जे में लेने की जंग पांच फरवरी 2020 से शुरू हो गई थी, जब केंद्र सरकार ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन की घोषणा की।
  2. ट्रस्ट की पहली बैठक 20 अगस्त 2020 को नई दिल्ली में हुई, जिसमें महंत नृत्यगोपाल दास को अध्यक्ष और चंपत राय को महामंत्री चुना गया। ट्रस्ट की कार्यकारिणी में कुल 15 सदस्य हैं। इनमें 13 सदस्यों का मनोनयन केंद्र सरकार ने किया।
  3. सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार ट्रस्ट में निर्मोही अखाड़े का प्रतिनिधित्व अनिवार्य था। इस कारण महंत दिनेंद्र दास को ट्रस्ट का सदस्य बनाया गया।
  4. ट्रस्ट में चार पदेन सदस्य हैं - केंद्रीय गृह मंत्रालय के सचिव प्रशांत लोखड़े, उत्तर प्रदेश के ACS गृह संजय प्रसाद, DM शशांक त्रिपाठी और प्रधानमंत्री संग्रहालय के चेयरमैन नृपेंद्र मिश्र।
  5. पदेन सदस्यों को बैठक में तो शामिल किया जाता है, लेकिन उन्हें मतदान का अधिकार नहीं है। मतदान का अधिकार अध्यक्ष, महामंत्री और अन्य नामित सदस्यों को है।
  6. अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास समेत ट्रस्ट के अधिकांश सदस्य - के. पारासरन, जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती, दंडी स्वामी परमानंद - अधिक आयु और स्वास्थ्य संबंधी कारणों से बैठकों में सक्रिय भागीदारी नहीं करते।
  7. अयोध्या नरेश विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र के निधन के बाद उनका स्थान रिक्त है। दिवंगत कामेश्वर चौपाल की जगह पूर्व अधिकारी कृष्ण मोहन को नियुक्त किया गया।

चंपत राय के हाथ में सिमटी पूरी सत्ता

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राम मंदिर के दान और व्यवस्था की देखरेख के लिए भले ही भारी-भरकम ट्रस्ट बना हो, लेकिन ट्रस्ट का पूरा नियंत्रण महामंत्री चंपत राय और उनके करीबी लोगों का ही रहा। यही विवाद और आपसी संघर्ष का विषय बना।



चंपत राय के कभी ड्राइवर रहे और बाद में निजी सहायक बने टिकू यादव के कामकाज में दखल ने असंतोष को बढ़ावा दिया। राम मंदिर से जुड़े लोगों का कहना है कि चंपत राय अपने करीबी लोगों की शिकायतों को लगातार नजरअंदाज करते रहे और सारी शक्तियों को अपने हाथ में और अपने करीबियों में बांटते रहे।



15 में से 2-3 के हाथ में सारी कमान

15 सदस्यीय प्रबंधन समिति में से केवल दो-तीन व्यक्तियों के हाथों में पूरी कमान थी। मंदिर प्रबंधन, VIP पास, वित्त प्रबंधन और प्रशासनिक निर्णयों का मुख्य दायित्व महासचिव चंपत राय, कोषाध्यक्ष गोविंददेव गिरि और स्थानीय सदस्य अनिल कुमार मिश्र के पास ही रहा।



ट्रस्ट को देने होंगे इन सवालों के जवाब



सवाल यह है कि जब नवंबर 2020 में ट्रस्ट के कामकाज को व्यवस्थित करने के लिए निर्माण, ऑडिट, वित्त, धार्मिक और प्रबंध समिति समेत पांच विशेष समितियां गठित की गई थीं, तो सारी समितियों को प्रभावहीन क्यों किया गया और सारी सत्ता चंद हाथों में क्यों सिमट गई?



वे सवाल जिनका जवाब मांग रहा है हिंदू समाज

  • दान संभालने के लिए 2023 में विस्तृत SOP बनी थी, तो उसका पालन क्यों नहीं किया गया?
  • मंदिर का काम वॉलंटियर सिस्टम पर क्यों चल रहा था?
  • लोगों को मौखिक रूप से काम क्यों बताया जाता था? लिखित आदेश और तय जिम्मेदारी क्यों नहीं थी?
  • चढ़ावा चोरी की खबर लगते ही पुलिस में FIR क्यों नहीं की गई?
  • मंदिर परिसर में संवेदनशील काम में ट्रस्ट के चुनिंदा लोगों के रिश्तेदारों को नौकरी क्यों दी गई?
  • नौकरी देते समय प्रारंभिक सत्यापन तो हुआ, लेकिन उसके बाद नियमित जांच या तलाशी क्यों नहीं की गई?
  • कम वेतन पाने वाले कुछ कर्मचारियों के यहां करोड़ों की संपत्ति कैसे बनी?

इन तमाम प्रश्नों के जवाब मंदिर प्रबंधन को देने होंगे।



मोदी और भागवत की चुप्पी ने बढ़ाया रहस्य

अब राम मंदिर का पूरा मामला राजनीतिक रूप से और आस्था के रूप में भी बेहद संवेदनशील बन गया है। प्रधानमंत्री मोदी और संघ प्रमुख मोहन भागवत की चुप्पी ने मामले को और रहस्यमय बना दिया है। इधर CM योगी ने जरूर अयोध्या पहुंचकर 15 दिन में दूध का दूध, पानी का पानी करने का वादा किया है।



राम मंदिर - ईंट-पत्थर नहीं, करोड़ों की आस्था

इस पूरे प्रकरण से हिंदू समाज की आस्था को गहरी चोट लगी है। केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को यह समझना होगा कि अयोध्या का राम मंदिर केवल ईंट, गारा, पत्थर से बना कोई धार्मिक मंदिर नहीं है।



इसके बनने के पीछे करोड़ों भारतीयों की आस्था, त्याग, संघर्ष और विश्वास का प्रतीक है। देश के हर हिंदू ने अपने सामर्थ्य से दान दिया। यह दान रुपया नहीं है, बल्कि एक श्रद्धालु द्वारा सौंपा गया पवित्र न्यास है।



जहां अधर्म है, वहां राम नहीं रहते

मर्यादा पुरुषोत्तम राम के मंदिर की देखभाल करने वाली संस्था में मर्यादा, नैतिकता, शुचिता और पारदर्शिता होना ही चाहिए। जहां अधर्म है, वहां धर्म नहीं रहता। जहां अनैतिकता का निवास होता है, वहां से नैतिकता पलायन कर जाती है। जहां राक्षस रहते हैं, वहां राम नहीं रहते।



राम मंदिर में रावण कौन है, जिसने प्रभु राम के चरणों में चढ़े चढ़ावे की चोरी करने का पाप किया? चरित्रवान राम के मंदिर में चरित्रहीन लोगों ने कैसे कब्जा कर लिया?



दूसरा सोमनाथ नहीं बनना चाहिए राम मंदिर

राम मंदिर से राम का पलायन हो, उससे पहले राम मंदिर के रावण का पता लगाना सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है। राम मंदिर को दूसरा सोमनाथ नहीं बनना चाहिए। जिन्होंने लूटा है, उन्हें लौटाना होगा। यह सरकार की जिम्मेदारी है।



हिंदू समाज की भावना आहत और आस्था कमजोर हुई है, भरोसा भी बुरी तरह से टूटा है। खोया भरोसा लौटता है या इस देश के बहुसंख्यक समाज को निराशा हाथ लगती है, यह आने वाला समय बताएगा।



यह सरकार के लिए परीक्षा की घड़ी है। पूरा हिंदू समाज सरकार की तरफ टकटकी लगाए देख रहा है।



नोट- प्रिंट मीडिया में दो दशक से सक्रिय समीर चौगांवकर राजनीतिक पत्रकारिता के एक विश्वसनीय और स्थापित नाम हैं। इंडिया टुडे, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका और एशिया टाइम्स सहित देश-विदेश के प्रतिष्ठित मंचों पर उनके लेख प्रकाशित होते हैं। भाजपा, पीएमओ, संसद और आरएसएस की गहरी कवरेज तथा प्रमुख न्यूज चैनलों पर तथ्यपरक राजनीतिक विश्लेषण उनकी पहचान है।



इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। राम मंदिर चोरी प्रकरण की जांच SIT द्वारा जारी है। thesootr.com किसी भी व्यक्ति विशेष को दोषी नहीं ठहराता। पाठकों से अनुरोध है कि आधिकारिक रिपोर्ट आने तक निष्कर्ष न निकालें।



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