क्या है परमिसिव पेरेंटिंग? बच्चों के व्यवहार पर इसके असर को समझें

Anjali Dwivedi | Mar 28, 2026, 18:04 IST
Permissive Parenting Style
परमिसिव पेरेंटिंग बच्चों के व्यक्तित्व को कैसे प्रभावित करती है? जानें इस पेरेंटिंग स्टाइल के लक्षण, फायदे और नुकसान। प्यार और अनुशासन के बीच बैलेंस बनाना क्यों जरूरी है।

हर माता-पिता का सपना होता है कि उनका बच्चा दुनिया की तमाम खुशियां हासिल करे। हम अक्सर चाहते हैं कि हमारा बच्चा हमसे डरे नहीं, बल्कि हमें अपना सबसे अच्छा दोस्त माने और दिल की हर बात साझा करे।



दोस्त बनने की इस चाहत में कहीं हम अनजाने में कुछ ऐसी गलतियां तो नहीं कर रहे, जो भविष्य में बच्चे के व्यक्तित्व के लिए भारी पड़ जाएं? साइकोलॉजी की दुनिया में इस नरम रवैये को परमिसिव पेरेंटिंग कहा जाता है।



क्या है परमिसिव पेरेंटिंग का फंडा?

आसान शब्दों में कहें तो यह परवरिश (मां की परवरिश) का वह तरीका है जिसमें माता-पिता जरूरत से ज्यादा उदार होते हैं। ऐसे पेरेंट्स बच्चों पर कोई सख्त नियम या पाबंदी नहीं थोपते। वे बच्चों को अनुशासन सिखाने या उन्हें रोकने-टोकने के बजाय उनकी हर जिद और मांग को मानते हैं।



इस शैली में माता-पिता एक अभिभावक की जगह एक साथी की भूमिका को प्राथमिकता देते हैं, जिससे घर के कायदे-कानून धुंधले पड़ जाते हैं।



क्या आप भी हैं परमिसिव पेरेंट?

  • आप बच्चे को किसी भी छोटी-बड़ी बात के लिए नहीं कहने से कतराते हैं।
  • आपके घर में सोने, जागने या पढ़ाई का कोई तय रूटीन नहीं है।
  • बच्चा गलती करता है, तो आप डांटने के बजाय उसे नजरअंदाज कर देते हैं।
  • रोने या जिद करने पर आप बच्चे की हर डिमांड तुरंत पूरी कर देते हैं।

अगर आप इन दी गई बातों से इत्तेफाक रखते हैं, तो मुमकिन है कि आप भी इसी कैटेगरी में आते हैं। शुरुआत में यह तरीका बहुत सुकून भरा लग सकता है क्योंकि घर में कोई वाद-विवाद नहीं होता और बच्चा हमेशा खुश दिखता है। लेकिन वक्त गुजरने के साथ इसके कुछ गंभीर और नकारात्मक प्रभाव सामने आने लगते हैं।



कैसे बच्चे ज्यादा चिड़चिड़े होते हैं?

जब बच्चों को बचपन से नियम मानने की आदत नहीं होती, तो वे बड़े होकर बाहरी दुनिया के तालमेल में फेल हो जाते हैं। स्कूल, कॉलेज या ऑफिस के माहौल में उन्हें बहुत परेशानी होती है क्योंकि वहां चीजें उनकी मर्जी से नहीं चलतीं।



सबसे बड़ी समस्या तब आती है जब उन्हें बाहर ना सुनना पड़ता है, ऐसे बच्चे जल्दी हताश, चिड़चिड़े या डिप्रेशन का शिकार हो सकते हैं।



जब बच्चे को बिना किसी मेहनत के सब कुछ थाली में सजाकर मिल जाता है, तो वे हार्ड वर्क की अहमियत भूल जाते हैं। ऐसे बच्चे अक्सर अपनी जिम्मेदारियों से भागते हैं। क्योंकि उन्हें कभी टोका नहीं गया, इसलिए उन्हें अपने गुस्से या निराशा को संभालना नहीं आता, जिससे वे थोड़े एग्रेसिव भी हो सकते हैं।



कैसे बिठाएं सही बैलेंस?

परवरिश का मतलब सिर्फ प्यार करना नहीं, बल्कि बच्चे को एक बेहतर इंसान बनाना भी है। इसके लिए प्यार और अनुशासन का संतुलन होना अनिवार्य है। बच्चे को यह यकीन दिलाएं कि आप उनके सबसे बड़े सपोर्टर हैं, लेकिन साथ ही घर के कुछ बुनियादी नियमों का पालन करना भी सिखाएं। सही और गलत का फर्क समझाना ही एक जिम्मेदार अभिभावक की असली पहचान है। Gen Z जनरेशन



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