BJP में फिलहाल नहीं होगा सत्ता-संगठन में बड़ा फेरबदल, दिल्ली से राज्यों तक ‘नो रिस्क’ पॉलिसी
Jitendra Shrivastava | Sept 17, 2026, 20:24 IST
Photograph: (THESOOTR)
NEW DELHI. भाजपा फिलहाल सरकार और संगठन में बड़े बदलाव नहीं करेगी। पार्टी का फोकस स्थिरता और जनसंपर्क पर रहेगा। आगामी चुनावों की तैयारी को प्राथमिकता दी जाएगी।
भाजपा शासित राज्यों में पिछले कुछ समय से मुख्यमंत्री बदलने, मंत्रिमंडल विस्तार और फेरबदल को लेकर चल रही सियासी चर्चाओं पर ब्रेक लग गया है। मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड में फिलहाल किसी बड़े फेरबदल की संभावना नहीं है।
इसी तरह केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी तत्काल किसी बड़े बदलाव के संकेत नहीं हैं। इसका सीधा सा मतलब यह है कि राजधानी दिल्ली से राज्यों तक पार्टी ‘नो रिस्क’ पॉलिसी अपना रही है।
बीजेपी इस समय सरकारों और संगठन में बड़े बदलाव के बजाय अपना पूरा फोकस संगठन, जनसंपर्क और आने वाले चुनावों की तैयारी पर रखना चाहती है। खास तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन से शुरू हुआ सेवा एवं जनसंपर्क अभियान 17 अक्टूबर 2026 तक चलेगा।
इसके बाद भाजपा का फोकस 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों पर होगा। ऐसे में पार्टी नेतृत्व फिलहाल ऐसा कोई कदम उठाने से बचना चाहता है, जिससे राज्यों में अनावश्यक सियासी चर्चाएं तेज हों या सरकार और संगठन के बीच किसी तरह के मतभेद का संदेश जाए।
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने ‘द सूत्र’ से बातचीत में पूरे घटनाक्रम को दिलचस्प तरीके से समझाया। उनका कहना था कि किसी भी राज्य का कोई बड़ा नेता यदि दिल्ली आकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात करता है और उसकी तस्वीर सामने आ जाती है तो उसके बाद सियासी अटकलों का दौर शुरू हो जाता है।
पिछले दिनों मध्यप्रदेश के कुछ नेताओं की प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह से मुलाकातों के बाद भी ऐसा ही देखने को मिला। इन मुलाकातों को कभी राज्य सरकार से नाराजगी से जोड़कर देखा गया तो कभी संगठन या सरकार में नई जिम्मेदारी मिलने की चर्चाएं शुरू हो गईं।
यानी दिल्ली की एक राजनीतिक मुलाकात भी राज्यों में कई तरह के सियासी अर्थ निकालने का आधार बन जाती है। भाजपा फिलहाल इस तरह की अटकलों से बचना चाहती है। यही वजह है कि आने वाले कुछ समय में पार्टी नेतृत्व का फोकस ‘कम चर्चा, ज्यादा काम’ की रणनीति पर रहेगा।
मध्यप्रदेश के मामले में यह रणनीति और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रदेश में 2027 में नगरीय निकाय और त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव प्रस्तावित हैं। ये चुनाव 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण पड़ाव साबित होंगे। ऐसे में भाजपा संगठन इसे गंभीरता से ले रहा है।
इसी कड़ी में जमीनी कार्यकर्ताओं और नेताओं को नगरीय निकायों से जोड़ने की कवायद शुरू हो चुकी है। जुलाई 2026 में प्रदेश के 180 से ज्यादा नगरीय निकायों में एल्डरमैन नियुक्त किए गए हैं, ताकि स्थानीय स्तर पर ज्यादा से ज्यादा कार्यकर्ताओं को साधा जा सके।
राजनीतिक विश्लेषक इसे संगठन के जमीनी नेटवर्क को मजबूत करने और स्थानीय चुनावों की तैयारी से जोड़कर देखते हैं। निकाय चुनावों के साथ पंचायत चुनाव भी प्रस्तावित हैं।
इसके बाद 2028 में विधानसभा चुनाव होंगे। इस लिहाज से अगले करीब दो साल मध्यप्रदेश की राजनीति के लिए लगातार चुनावी गतिविधियों वाले रहने वाले हैं।
राजस्थान में भी भाजपा के लिए मौजूदा समय राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। हाल ही में हुए नगरीय निकाय चुनावों में भाजपा ने कांग्रेस से अधिक वार्ड जीते हैं, लेकिन निर्दलीय उम्मीदवारों का प्रदर्शन भी उल्लेखनीय रहा है।
इन नतीजों ने राजस्थान में स्थानीय स्तर पर संगठन की ताकत, स्थानीय नेतृत्व और जमीनी समीकरणों को फिर चर्चा में ला दिया है। ऐसे में भाजपा नेतृत्व के सामने फिलहाल सरकार में बड़ा फेरबदल करने से ज्यादा महत्वपूर्ण चुनौती स्थानीय राजनीतिक समीकरणों को साधने और संगठन को मजबूत रखने की है।
छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार और संगठन के सामने अगले चुनावी चक्र के लिए जमीन मजबूत करने की चुनौती है। प्रदेश में सरकार के कामकाज के साथ संगठनात्मक विस्तार और स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं की सक्रियता पर पार्टी का फोकस है।
ऐसे में यहां भी मंत्रिमंडल या सत्ता के स्तर पर बड़ा बदलाव करने से ज्यादा प्राथमिकता सरकार की योजनाओं को जमीन तक पहुंचाने और संगठन को सक्रिय रखने की है।
अभी
2027 भाजपा के लिए चुनावी दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण साल है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन राज्यों की मौजूदा विधानसभाओं का कार्यकाल 2027 में अलग-अलग तारीखों पर खत्म होना है।
यही वजह है कि दिल्ली में इन राज्यों को लेकर संगठनात्मक और चुनावी तैयारियां तेज हो गई हैं। पार्टी की अंदरूनी टीमें अलग-अलग राज्यों में जमीनी फीडबैक, संगठन की स्थिति और चुनावी समीकरणों पर काम कर रही हैं।
ऐसे माहौल में भाजपा नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि चुनावी राज्यों के साथ-साथ मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी सरकार और संगठन को स्थिर रखा जाए।
भाजपा के मौजूदा सियासी रुख को देखें तो फिलहाल संदेश यही है कि सरकारें अपना काम करें, संगठन चुनावी तैयारी करे और दिल्ली से बड़े बदलाव का कोई संदेश न जाए। इसका मतलब यह नहीं है कि भविष्य में मंत्रिमंडल विस्तार या फेरबदल की संभावना पूरी तरह खत्म हो गई है।
राजनीतिक और प्रशासनिक जरूरत के मुताबिक फैसले कभी भी लिए जा सकते हैं, लेकिन फिलहाल पार्टी नेतृत्व का झुकाव बड़े बदलाव की जगह स्थिरता, संगठन की सक्रियता और चुनावी तैयारी की ओर दिखाई दे रहा है।
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इसी तरह केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी तत्काल किसी बड़े बदलाव के संकेत नहीं हैं। इसका सीधा सा मतलब यह है कि राजधानी दिल्ली से राज्यों तक पार्टी ‘नो रिस्क’ पॉलिसी अपना रही है।
बीजेपी इस समय सरकारों और संगठन में बड़े बदलाव के बजाय अपना पूरा फोकस संगठन, जनसंपर्क और आने वाले चुनावों की तैयारी पर रखना चाहती है। खास तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन से शुरू हुआ सेवा एवं जनसंपर्क अभियान 17 अक्टूबर 2026 तक चलेगा।
इसके बाद भाजपा का फोकस 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों पर होगा। ऐसे में पार्टी नेतृत्व फिलहाल ऐसा कोई कदम उठाने से बचना चाहता है, जिससे राज्यों में अनावश्यक सियासी चर्चाएं तेज हों या सरकार और संगठन के बीच किसी तरह के मतभेद का संदेश जाए।
दिल्ली में मुलाकात और फिर शुरू हो जाती है सियासी गॉसिप
पिछले दिनों मध्यप्रदेश के कुछ नेताओं की प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह से मुलाकातों के बाद भी ऐसा ही देखने को मिला। इन मुलाकातों को कभी राज्य सरकार से नाराजगी से जोड़कर देखा गया तो कभी संगठन या सरकार में नई जिम्मेदारी मिलने की चर्चाएं शुरू हो गईं।
यानी दिल्ली की एक राजनीतिक मुलाकात भी राज्यों में कई तरह के सियासी अर्थ निकालने का आधार बन जाती है। भाजपा फिलहाल इस तरह की अटकलों से बचना चाहती है। यही वजह है कि आने वाले कुछ समय में पार्टी नेतृत्व का फोकस ‘कम चर्चा, ज्यादा काम’ की रणनीति पर रहेगा।
मध्यप्रदेश में अहम है 2027 का चुनावी कैलेंडर
इसी कड़ी में जमीनी कार्यकर्ताओं और नेताओं को नगरीय निकायों से जोड़ने की कवायद शुरू हो चुकी है। जुलाई 2026 में प्रदेश के 180 से ज्यादा नगरीय निकायों में एल्डरमैन नियुक्त किए गए हैं, ताकि स्थानीय स्तर पर ज्यादा से ज्यादा कार्यकर्ताओं को साधा जा सके।
राजनीतिक विश्लेषक इसे संगठन के जमीनी नेटवर्क को मजबूत करने और स्थानीय चुनावों की तैयारी से जोड़कर देखते हैं। निकाय चुनावों के साथ पंचायत चुनाव भी प्रस्तावित हैं।
इसके बाद 2028 में विधानसभा चुनाव होंगे। इस लिहाज से अगले करीब दो साल मध्यप्रदेश की राजनीति के लिए लगातार चुनावी गतिविधियों वाले रहने वाले हैं।
राजस्थान में अब अगली चुनौती
इन नतीजों ने राजस्थान में स्थानीय स्तर पर संगठन की ताकत, स्थानीय नेतृत्व और जमीनी समीकरणों को फिर चर्चा में ला दिया है। ऐसे में भाजपा नेतृत्व के सामने फिलहाल सरकार में बड़ा फेरबदल करने से ज्यादा महत्वपूर्ण चुनौती स्थानीय राजनीतिक समीकरणों को साधने और संगठन को मजबूत रखने की है।
छत्तीसगढ़ में संतुलन पर फोकस
ऐसे में यहां भी मंत्रिमंडल या सत्ता के स्तर पर बड़ा बदलाव करने से ज्यादा प्राथमिकता सरकार की योजनाओं को जमीन तक पहुंचाने और संगठन को सक्रिय रखने की है।
अभी BJP के सामने सबसे बड़ा फोकस 2027
यही वजह है कि दिल्ली में इन राज्यों को लेकर संगठनात्मक और चुनावी तैयारियां तेज हो गई हैं। पार्टी की अंदरूनी टीमें अलग-अलग राज्यों में जमीनी फीडबैक, संगठन की स्थिति और चुनावी समीकरणों पर काम कर रही हैं।
ऐसे माहौल में भाजपा नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि चुनावी राज्यों के साथ-साथ मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी सरकार और संगठन को स्थिर रखा जाए।
फिलहाल साफ है संदेश
राजनीतिक और प्रशासनिक जरूरत के मुताबिक फैसले कभी भी लिए जा सकते हैं, लेकिन फिलहाल पार्टी नेतृत्व का झुकाव बड़े बदलाव की जगह स्थिरता, संगठन की सक्रियता और चुनावी तैयारी की ओर दिखाई दे रहा है।
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पीएम मोदी के जन्मदिन कार्यक्रम में हंगामा : भाजपा-कांग्रेस में जमकर धक्का-मुक्की
मैं प्रधानमंत्री नहीं हूं, PM के जन्मदिन पर चर्चा में हैं मध्य प्रदेश के नरेंद्र मोदी
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