बच्चों में डायबिटीज पर सरकार का बड़ा फैसला, अब 18 साल तक मिलेगा मुफ्त इलाज और इंसुलिन
भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने देश के करोड़ों बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। देश में पहली बार बच्चों में होने वाली डायबिटीज के लिए एक नेशनल फ्रेमवर्क (राष्ट्रीय नियम) तैयार किया गया है।
अक्सर देखा जाता है कि जानकारी के अभाव या महंगे इलाज के कारण बच्चों में यह बीमारी गंभीर रूप ले लेती है। इसी समस्या को खत्म करने के लिए सरकार ने अब जन्म से लेकर 18 साल तक के बच्चों के लिए मुफ्त जांच और इलाज की जिम्मेदारी ली है।
जन्म से ही होगी जांच यूनिवर्सल स्क्रीनिंग
अब सरकार ने तय किया है कि देश के हर बच्चे की, चाहे वह किसी भी राज्य या गांव का हो, डायबिटीज के लिए जांच की जाएगी। इसे यूनिवर्सल स्क्रीनिंग नाम दिया गया है।
- शुरुआती पहचान: इसका मुख्य मकसद बीमारी को पहली स्टेज पर ही पकड़ना है ताकि बच्चे के अंगों को नुकसान न पहुंचे।
- जांच का तरीका: अगर किसी बच्चे में डायबिटीज के कोई भी लक्षण दिखते हैं, तो सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर तुरंत उसका 'ब्लड ग्लूकोज टेस्ट' किया जाएगा।
- आगे का रास्ता: अगर रिपोर्ट में गड़बड़ दिखती है, तो बच्चे को बड़े अस्पताल (जिला अस्पताल) भेजा जाएगा जहां डॉक्टर बीमारी की पक्की पुष्टि करेंगे और इलाज शुरू करेंगे।
अब इलाज का खर्च नहीं बनेगा बोझ
डायबिटीज एक ऐसी बीमारी है जिसका इलाज लंबा चलता है और दवाइयां काफी महंगी आती हैं। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए यह बहुत बड़ा आर्थिक बोझ होता है। इसे देखते हुए सरकार ने फ्री-ऑफ-कॉस्ट केयर पैकेज लॉन्च किया है:
- लाइफ-टाइम इंसुलिन: टाइप-1 डायबिटीज वाले बच्चों को उम्र भर इंसुलिन की जरूरत होती है। अब सरकार यह इंसुलिन पूरी तरह मुफ्त देगी।
- फ्री ग्लूकोमीटर: बच्चों को घर पर शुगर चेक करने के लिए ग्लूकोमीटर और टेस्ट स्ट्रिप्स (जांच वाली पट्टियां) भी मुफ्त दी जाएंगी।
- रेगुलर चेकअप: सरकारी अस्पतालों में बच्चे की नियमित जांच और मॉनिटरिंग की पूरी व्यवस्था मुफ्त होगी।
माता-पिता के लिए 4Ts का जादुई फॉर्मूला
अक्सर माता-पिता समझ नहीं पाते कि उनके बच्चे को डायबिटीज है। इसके लिए सरकार ने 4Ts नाम का एक बहुत आसान तरीका बताया है। अगर आपके बच्चे में ये 4 लक्षण दिखें, तो तुरंत डॉक्टर से मिलें-
- Toilet (टॉयलेट): अगर बच्चा बार-बार पेशाब करने जा रहा हो या बिस्तर गीला करने लगा हो।
- Thirsty (थर्स्टी): अगर बच्चे को बहुत ज्यादा प्यास लग रही हो और गला बार-बार सूख रहा हो।
- Tired (टायर्ड): बच्चा खेलने-कूदने में जल्दी थक जाए या हर समय सुस्त और कमजोर दिखे।
- Thinner (थर्नर): अच्छी डाइट के बावजूद अगर बच्चा अचानक दुबला होने लगे और उसका वजन कम हो जाए।
ट्रेनिंग और इमरजेंसी मैनेजमेंट
सरकार सिर्फ दवा देकर पल्ला नहीं झाड़ रही, बल्कि वह माता- पिता और स्कूल के शिक्षकों को ट्रेनिंग भी देगी।
- उन्हें सिखाया जाएगा कि बच्चे को सही तरीके से इंसुलिन का इंजेक्शन कैसे लगाना है।
- अगर अचानक शुगर बहुत कम या बहुत ज्यादा हो जाए, तो घर पर ही इमरजेंसी में क्या करना चाहिए। इससे बच्चे की जान को खतरा कम होगा और परिवार को आत्मविश्वास मिलेगा।
गांव से लेकर शहर तक जुड़ा हुआ नेटवर्क
सरकार ने एक मजबूत सिस्टम तैयार किया है। गांव के स्वास्थ्य केंद्र पर होने वाली स्क्रीनिंग को सीधे जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेजों से जोड़ा गया है।
अगर किसी बच्चे की हालत गंभीर है, तो उसे मेडिकल कॉलेज में एडवांस केयर दी जाएगी। मकसद यह है कि एक बार बच्चा इस सिस्टम में आ गया, तो उसका हाथ तब तक नहीं छोड़ा जाएगा जब तक वह पूरी तरह स्वस्थ जीवन जीने लायक न हो जाए।
यह कदम क्यों है जरूरी?
विश्व स्वास्थ्य संगठन भी मानता है कि अगर डायबिटीज का समय पर इलाज न हो, तो यह शरीर की नसों और रक्त वाहिकाओं को अंदर ही अंदर खोखला कर देती है। भारत की यह नई पहल न केवल बच्चों को एक लंबी और स्वस्थ जिंदगी देगी, बल्कि भविष्य में होने वाली गंभीर बीमारियों (जैसे हार्ट या किडनी की समस्या) के खतरे को भी कम करेगी।
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