वैज्ञानिकों ने बनाए रोबोटिक कॉकरोच, मलबे में दबे लोगों की जान बचाएंगे ये कॉकरोच
Paraborgs Technology: भूकंप, बाढ़ या कोई बड़ी इमारत ढहने पर रेस्क्यू टीम के सामने सबसे बड़ी चुनौती मलबे के नीचे दबे लोगों तक पहुंचना होता है। कई बार जगह इतनी संकरी और खतरनाक होती है कि वहां न तो इंसान पहुंच पाते हैं और न ही बड़े रोबोट काम आते हैं। ऐसी स्थिति में घायलों तक समय पर मेडिकल मदद न मिलने से उनकी जान चली जाती है।
इसी बड़ी समस्या का हल निकालने के लिए ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड के वैज्ञानिकों ने एक बेहद अनोखी और मॉडर्न तकनीक खोजी है। उन्होंने जायंट बरोइंग कॉकरोच को एक हाई-टेक पैरामेडिक रोबोट में बदल दिया है, जिन्हें पैराबोर्ग्स नाम दिया गया है। यह नई टेक्नोलॉजी बायोहाइब्रिड रोबोटिक्स और मेडिकल साइंस का एक शानदार कॉम्बिनेशन है।
इन कॉकरोच की पीठ पर बहुत छोटे वाई-फाई कैमरे और ऑटो-इंजेक्टर सिस्टम लगाए गए हैं। इनका मकसद मलबे की गहराई में जाकर फंसे हुए इंसानों को ढूंढना और उन्हें तुरंत लाइफ-सेविंग दवा देना है। ये पूरी रिसर्च रेस्क्यू ऑपरेशंस की दुनिया में एक बहुत बड़ा गेमचेंजर साबित होने वाली है। आइए इस नई इंफॉर्मेटिव टेक्नोलॉजी के बारे में डिटेल से समझते हैं।
क्या हैं पैराबोर्ग्स कॉकरोच
पैराबोर्ग्स असल में जीवित कॉकरोच और रोबोटिक पार्ट्स का एक कॉम्बिनेशन हैं। साइंटिस्ट्स ने इस काम के लिए विशाल जायंट बरोइंग कॉकरोच को चुना है। ये कॉकरोच आकार में 8.7 सेंटीमीटर लंबे और काफी मजबूत होते हैं।
इनकी उम्र लगभग दस साल तक होती है और ये भारी वजन उठा सकते हैं। इनके शरीर पर बहुत छोटे इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेस और सेंसर्स लगाए गए हैं। ये टेक्नोलॉजी लिविंग ऑर्गैनिस्म और मैकेनिकल इक्विपमेंट को आपस में जोड़ती है।
ये सिस्टम कैसे काम करता है
इस रेस्क्यू मिशन में कम से कम दो साइबोर्ग कॉकरोच साथ काम करते हैं। पहला कॉकरोच ऑब्जर्वर का काम करता है और रास्ता तलाश करता है। इसके ऊपर एक छोटा वाई-फाई कैमरा और ट्रांसमीटर लगा होता है।
यह कैमरा कंट्रोल रूम में बैठे वैज्ञानिकों को रियल-टाइम वीडियो भेजता है। दूसरा कॉकरोच अपने साथ एक ऑटो-इंजेक्टर सिस्टम लेकर आगे बढ़ता है। टारगेट मिलते ही स्प्रिंग मैकेनिज्म से पीड़ित को तुरंत दवा लग जाती है।
कॉकरोच को कैसे कंट्रोल करते हैं साइंटिस्ट
इन साइबोर्ग कॉकरोच को नेविगेट करना एक बड़ा इंजीनियरिंग चैलेंज था। साइंटिस्ट्स ने इनके एंटीना और पिछले हिस्से में बहुत छोटे इलेक्ट्रोड्स लगाए। एंटीना में हल्का इलेक्ट्रिक सिग्नल देकर कॉकरोच को दिशा दिखाई जाती है।
पिछले हिस्से के सेंसर से इनकी चलने की स्पीड को कंट्रोल किया जाता है। साइंटिस्ट रिमोट से सिग्नल भेजकर इन्हें किसी भी तरफ मोड़ सकते हैं। सभी जरूरी मेडिकल फैसले इंसान ही कंट्रोल रूम से बैठकर लेते हैं।
ट्रायल्स के दौरान कैसी रही सफलता
साइंटिस्ट्स ने पैराबोर्ग्स की टेस्टिंग के लिए कुल 25 अलग-अलग ट्रायल्स किए। इन ट्रायल्स में कॉकरोच को मुश्किल रास्ते पार करके टारगेट तक पहुंचना था। 25 में से 12 बार कॉकरोच ने बिल्कुल सटीक जगह पर इंजेक्शन लगाया।
छह बार थोड़ी दूरी से भी सफल इंजेक्शन लगाने में कामयाबी हासिल हुई। कुछ ट्रायल्स में कॉकरोच के मुड़ने से थोड़ी असफलता भी देखने को मिली। कुल मिलाकर इस पूरी टेस्टिंग में 72 प्रतिशत की बड़ी सफलता मिली।
डिजास्टर मैनेजमेंट में क्यों हैं ये गेमचेंजर
मलबे के संकरे रास्तों में भारी मशीनों का जाना बिल्कुल असंभव होता है। आर्टिफिशियल रोबोट्स बनाने में बहुत ज्यादा खर्च और समय लगता है। बायोहाइब्रिड रोबोट्स को बनाना काफी सस्ता और बेहद आसान काम है।
ये कॉकरोच बहुत कम एनर्जी में लंबे समय तक काम कर सकते हैं। ये मलबे में फंसे व्यक्ति को मौके पर ही दवा दे सकते हैं। इससे डॉक्टरों को मरीज के इलाज के लिए एक्स्ट्रा टाइम मिल जाता है।
भविष्य की रेस्क्यू टीमों का नया रूप
ये टेक्नोलॉजी फ्यूचर (रेस्क्यू ऑपरेशन) में इंसानी रेस्क्यू टीमों की बहुत बड़ी मददगार बनेगी। आने वाले समय में ऐसे साइबोर्ग्स की पूरी फौज तैयार की जाएगी। साइंटिस्ट्स के मुताबिक, अगले पांच से दस सालों में ये टेक्नोलॉजी पूरी तरह तैयार होगी।
जरूरी रिसोर्सेज मिलते ही इन्हें असली रेस्क्यू ऑपरेशंस में शामिल किया जाएगा। ये इमरजेंसी मेडिकल सर्विस की दुनिया में एक नया इतिहास रचेगी।
FAQ
- पैराबोर्ग्स तकनीक क्या है और यह कैसे काम करती है?
पैराबोर्ग्स ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों द्वारा विकसित साइबोर्ग कॉकरोच हैं। इनके शरीर पर छोटे वाई-फाई कैमरे और ऑटो-इंजेक्टर लगे होते हैं। ये मलबे में घुसकर फंसे हुए पीड़ितों को खोजते हैं और उन्हें मौके पर ही जीवन रक्षक दवाएं इंजेक्ट करते हैं। - इन साइबोर्ग कॉकरोच को वैज्ञानिक कैसे कंट्रोल करते हैं?
वैज्ञानिकों ने कॉकरोच के सिर के एंटीना और शरीर के पिछले हिस्से में बहुत छोटे इलेक्ट्रोड्स लगाए हैं। रिमोट से इलेक्ट्रिक सिग्नल भेजकर कॉकरोच को दिशा दी जाती है और उनकी चलने की गति को आसानी से कंट्रोल किया जाता है। - पैराबोर्ग्स कॉकरोच की सफलता की दर कितनी रही है?
यूनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड द्वारा किए गए 25 लैब ट्रायल्स में इन साइबोर्ग कॉकरोच ने 72 प्रतिशत सफलता हासिल की है। ये संकरे रास्तों को पार करके सिलिकॉन टारगेट तक सटीक इंजेक्शन लगाने में सफल रहे हैं।
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