DGP चयन में सीएम, मंत्री और विपक्षी नेता का हस्तक्षेप नहीं होगा; सुप्रीम कोर्ट
News in Short
- सुप्रीम कोर्ट ने DGP नियुक्ति में राजनीतिक हस्तक्षेप को नकारा।
- कोर्ट ने केंद्रीय प्राधिकरण और UPSC की भूमिका पर जोर दिया।
- प्रकाश सिंह मामले में कोर्ट ने 2006 के दिशा-निर्देशों को फिर से रेखांकित किया।
- DGP की चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए केंद्रीय प्राधिकरण की आवश्यकता।
- राज्य सरकारों को UPSC से पैनल भेजने का आदेश दिया गया था।
News in Detail
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को पुलिस महानिदेशक (DGP) की नियुक्ति के संबंध में महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि मुख्यमंत्री, विपक्ष के नेता और एक मंत्री को मिलाकर एक कॉलेजियम बनाने का प्रस्ताव व्यावहारिक नहीं होगा। इस टिप्पणी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने DGP चयन प्रक्रिया में राजनीतिक हस्तक्षेप को नकारते हुए केंद्रीय प्राधिकरण की भूमिका पर जोर दिया।
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क्या है मामला?
यह मामला ‘प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ’ से जुड़ा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में DGP की नियुक्ति के लिए दिशा-निर्देश दिए थे। अब इसी मामले में कुछ याचिकाएं दायर की गईं थीं, जिनमें DGP की नियुक्ति की प्रक्रिया में बदलाव की मांग की गई थी।
खास तौर पर याचिकाकर्ता प्रकाश सिंह ने DGP चयन प्रक्रिया को केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के निदेशक की नियुक्ति प्रक्रिया के अनुरूप बनाने का सुझाव दिया था। इसमें एक उच्च-स्तरीय समिति द्वारा DGP का चुनाव करने का प्रस्ताव था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि ऐसे किसी मॉडल की आवश्यकता नहीं है।
क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि DGP का चुनाव करने के लिए एक केंद्रीय प्राधिकरण होना चाहिए, जो प्रक्रिया में निष्पक्षता को सुनिश्चित कर सके। कोर्ट ने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) को एक संवैधानिक संस्था माना और कहा कि UPSC पर कोई आरोप नहीं लगाया जा सकता। इससे DGP चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित होती है।
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राजू रामचंद्रन की दलीलें
इस मामले में वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन ने अदालत को बताया कि UPSC अगर योग्य अधिकारियों का पैनल तैयार करता है, तो अंततः राज्य सरकार को ही अंतिम चुनाव का अधिकार होना चाहिए। उनका कहना था कि DGP का पद विश्वास का पद होता है और इसलिए यह निर्णय राज्य सरकार को लेना चाहिए। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील पर कहा कि इस तरह का निर्णय राज्य सरकार द्वारा लिया गया तो उसमें पक्षपाती फैसले की संभावना हो सकती है।
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पुलिस महानिदेशक का चयन मुश्किल
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी प्रभावी केंद्रीय प्राधिकरण के बिना, DGP की नियुक्ति को पारदर्शी बनाना मुश्किल होगा। इस संदर्भ में, कई राज्य सरकारों द्वारा किए गए प्रयासों और कानूनों की समीक्षा की गई। इसमें पंजाब राज्य से भी सवाल उठाए गए, जहां मुख्यमंत्री ने अपने कानून के माध्यम से इस प्रक्रिया को बदलने की कोशिश की थी।
प्रकाश सिंह केस में 2006 के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में दिए गए निर्देशों को फिर से रेखांकित किया। इन निर्देशों के अनुसार, राज्य सरकार को DGP की नियुक्ति के लिए UPSC से पैनल भेजने का आदेश था। इसके बाद राज्य सरकार को उसी पैनल से किसी एक अधिकारी को चुनना होता है। हालांकि, 2018 के बाद एक संशोधन में, राज्य सरकार को DGP के रिटायरमेंट से तीन महीने पहले अपना प्रस्ताव प्रस्तुत करना होता है, ताकि समय रहते नियुक्ति हो सके।