इंसानी पेशाब से पिघल रहा ग्लेशियर! तेजी से बढ़ रहा है तापमान
समझें क्या है पूरा मामला
- माउंट एवरेस्ट पर हर साल हजारों पर्वतारोही चढ़ाई करते हैं।
- एक नई स्टडी में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है।
- पर्वतारोहियों का पेशाब ग्लेशियर की बर्फ पिघला रहा है।
- हर साल करीब 2500 टन बर्फ इससे पानी बन रही है।
- एवरेस्ट बेस कैंप वाला खुम्बु ग्लेशियर सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहा है।
नेपाल में बीते महीने भयानक बाढ़ आई थी। इसके पीछे हिमालय में ग्लेशियर के ढहने को वजह बताया गया। इस घटना ने ग्लेशियर पिघलने पर बहस फिर छेड़ दी है। अब एक नई स्टडी ने इंसानी पेशाब को भी इसका जिम्मेदार बताया है।
बाढ़ ने बढ़ाई चिंता
हिमालय में ग्लेशियर पिघलने के खतरे पहले से जाने जाते हैं। लेकिन नेपाल की हालिया बाढ़ ने इस मुद्दे को फिर सुर्खियों में ला दिया। वैज्ञानिक अब हर छोटी बड़ी वजह की जांच कर रहे हैं। इसी कड़ी में एवरेस्ट पर इंसानी गतिविधियों की भूमिका सामने आई है।
पेशाब कैसे पिघला रहा बर्फ
रीजनल एनवायर्नमेंटल चेंज जर्नल में एक स्टडी छपी है। इसे नेपाली और अमेरिकी वैज्ञानिकों ने मिलकर तैयार किया है। स्टडी बताती है कि हर क्लाइंबिंग सीजन में करीब 2500 टन बर्फ पिघल रही है। इसकी बड़ी वजह पर्वतारोहियों का पेशाब बताया गया है।
ऊंचाई पर सांस लेना मुश्किल होता है। इसलिए पर्वतारोहियों को ज्यादा पानी पीना पड़ता है। ज्यादा पानी पीने से पेशाब भी ज्यादा आता है। साल 2023 के सीजन में हर दिन करीब 6766 लीटर पेशाब बहा।
बेस कैंप में क्या हो रहा
एवरेस्ट बेस कैंप सीधे खुम्बु ग्लेशियर के ऊपर बना है। यहां हर साल करीब 1600 टेंट लगाए जाते हैं। इन टेंटों में किचन, शॉवर और जनरेटर जैसी सुविधाएं होती हैं। वाई-फाई जैसी सुविधाएं भी अब आम हो गई हैं।
इतनी सारी सुविधाओं से लगातार गर्मी पैदा होती है। यह गर्मी सीधे जमीन का तापमान बढ़ा देती है। जमीन गर्म होने से नीचे की बर्फ तेजी से पिघलने लगती है। इंसानी मौजूदगी इस तरह ग्लेशियर को नुकसान पहुंचा रही है।
गर्मी का असर कितना पड़ता है
रिसर्चर्स ने एक क्लाइंबिंग सीजन में करीब 154 टन बर्फ पिघलने का हिसाब लगाया। यह हिसाब खासतौर पर पेशाब से जुड़ी गर्मी पर आधारित है। शरीर से पेशाब करीब 37 डिग्री सेल्सियस पर बाहर आता है। इसके बाद यह जल्दी ठंडा होने लगता है।
वैज्ञानिकों ने पाया कि यह गर्मी पूरी तरह बर्फ तक नहीं पहुंचती। ज्यादातर गर्मी हवा या आसपास की चट्टानों में चली जाती है। फिर भी बचा हुआ हिस्सा बर्फ को नुकसान पहुंचाने के लिए काफी है। लगातार यह प्रक्रिया चलने से असर बड़ा हो जाता है।
हिमालय का तापमान तेजी से बढ़ा
वैज्ञानिकों ने हिमालय को लेकर सीधी चेतावनी दी है। यहां तापमान बाकी इलाकों से कहीं तेज बढ़ रहा है। साल 2000 के बाद बर्फ पिघलने की रफ्तार दोगुनी हो गई है। यह बदलाव आने वाले समय के लिए खतरे की घंटी है।
हर साल 0.28 डिग्री की बढ़त
बेस कैंप की सतह का तापमान सबसे तेज बढ़ रहा है। यह खुम्बु ग्लेशियर के दूसरे हिस्सों से भी ज्यादा तेज है। हर साल यहां तापमान 0.28 डिग्री सेल्सियस बढ़ रहा है। एक्सपर्ट का कहना है कि यह रफ्तार जल्द बड़ी मुश्किल बन सकती है।
इंसानी गतिविधियां और ग्लोबल वार्मिंग दोनों मिलकर असर बढ़ा रही हैं। एवरेस्ट जैसी जगहों पर संतुलन बनाए रखना अब जरूरी हो गया है। वरना आने वाले सालों में नुकसान और बढ़ सकता है।
FAQ
- एवरेस्ट पर ग्लेशियर क्यों पिघल रहा है?
ग्लोबल वार्मिंग के साथ पर्वतारोहियों का पेशाब भी बड़ी वजह है। हर साल करीब 2500 टन बर्फ इससे पानी बन रही है। बेस कैंप की गतिविधियां भी तापमान बढ़ा रही हैं। - खुम्बु ग्लेशियर का तापमान कितनी तेजी से बढ़ रहा है?
बेस कैंप की सतह का तापमान हर साल 0.28 डिग्री सेल्सियस बढ़ रहा है। यह ग्लेशियर के दूसरे हिस्सों से ज्यादा तेज है। साल 2000 के बाद यह रफ्तार दोगुनी हो चुकी है।
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