कोरियाई युद्ध
युद्ध से टूटा कोरिया कैसे बना दुनिया का टेक दिग्गज? बन गया 13वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था
Manya Jain | Sootr Assets | Oct 04, 2026, 12:05 IST
कैसे दुनिया की 13वीं अर्थव्यवस्था बना दक्षिण कोरिया
1950 के दशक में युद्ध और गरीबी से टूटा दक्षिण कोरिया आज दुनिया की 13वीं बड़ी अर्थव्यवस्था है। जानिए सैमसंग, ह्युंडई वाले देश की कहानी और भारत के लिए सीख। 1953 में सियोल मलबे का शहर था। आज उसी देश की कंपनियों के फोन, टीवी और कारें भारत के घरों और सड़कों पर आम हैं। एक देश राख से उठकर दुनिया की 13वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था कैसे बना?
दक्षिण कोरिया एक नजर में
करंसी वॉन है। एक हजार वॉन यानी करीब 70 रुपए (सितंबर 2026 का भाव)। दिल्ली से सियोल की दूरी करीब 4,650 किलोमीटर है। नॉन-स्टॉप उड़ान में लगभग 7 से 7.5 घंटे लगते हैं।
2015 की जनगणना में करीब 56 प्रतिशत लोगों ने कोई धर्म नहीं बताया। करीब 28 प्रतिशत ईसाई थे और करीब 16 प्रतिशत बौद्ध। आबादी लगभग पूरी तरह कोरियाई मूल की है।
राख से शुरुआत
27 जुलाई 1953 को युद्धविराम हुआ। शांति संधि आज तक नहीं हुई। देश दो हिस्सों में बंट चुका था। बिजली घर, फैक्ट्रियां, पुल और स्कूल, बहुत कुछ टूट चुका था।
वो मोड़ जिसने सब बदल दिया
1961 में जनरल पार्क चुंग-ही सत्ता में आए। उनका राज सख्त था और आलोचक आज भी उसे तानाशाही कहते हैं। लेकिन आर्थिक दिशा साफ थी: निर्यात।
1961 जनरल पार्क चुंग-ही
सवाल यह है कि पैसा और रफ्तार आई कहां से? जवाब सड़क में भी था। 1968 में सियोल से बुसान तक 428 किलोमीटर का एक्सप्रेसवे बनना शुरू हुआ। करीब ढाई साल में तैयार हो गया। कई विदेशी सलाहकार इसे फिजूलखर्ची मानते थे।
इसी दौर में सैमसंग, ह्युंडई और एलजी जैसे बड़े समूह पले, जिन्हें चेबोल कहा जाता है। आज भारत में ह्युंडई की कारें, किया की एसयूवी, सैमसंग के फोन और एलजी की वॉशिंग मशीनें आम बात हैं। नोएडा में सैमसंग का मोबाइल कारखाना दुनिया के सबसे बड़े कारखानों में गिना जाता है। हां, चेबोल पर आलोचना भी होती है कि कुछ परिवारों के हाथ में बहुत ताकत सिमट गई।
फिर 1997 आया। एशियाई वित्तीय संकट में डॉलर खत्म होने लगे और कंपनियां डूबने लगीं। देश को IMF (अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष) से कर्ज लेना पड़ा। तब लोग सड़कों पर निकले, पर विरोध के लिए नहीं। अपने घर का सोना देश को देने के लिए। रिपोर्टों के मुताबिक 35 लाख से ज्यादा लोग कतार में लगे और 200 टन से ज्यादा सोना जमा हुआ। हालांकि ये आंकड़ा अभी confirm नहीं हैं।
और 2001 में कोरिया ने IMF का कर्ज तय समय से पहले चुका दिया।
खेत से जहाज तक
साउथ कोरिया के गांव
उल्सान में शिपयार्ड बनाने का काम और जहाजों के ऑर्डर साथ-साथ चले। 1974 के आसपास पहले बड़े टैंकर तैयार हुए। एक किसान का बेटा, जिसके पास शुरू में सिर्फ जिद थी, उसने देश को जहाज बनाने वाला देश बना दिया।
आज का कोरिया
तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। आबादी घट रही है। जन्मदर एक महिला पर एक बच्चे से भी कम है, जो दुनिया में सबसे कम में गिनी जाती है। काम के घंटे लंबे हैं। बुजुर्गों में गरीबी चिंता की बात है।
भारतीय युवाओं के लिए मौके
स्टूडेंट वीजा D-2 कहलाता है। पढ़ाई के बाद नौकरी खोजने के लिए D-10 जैसा रास्ता बताया जाता है। TOPIK (Test of Proficiency in Korean) की तैयारी में आमतौर पर 6 से 12 महीने लगते हैं। 2026 में करीब 20 संस्थानों पर वीजा देने की रोक की रिपोर्ट आई है। इसलिए सिर्फ मान्यता प्राप्त यूनिवर्सिटी चुनें और नियम दूतावास की साइट पर दोबारा जांचें।
भारत क्या सीख सकता है
तीसरी सीख: लंबे दांव वाला इंफ्रास्ट्रक्चर। कोरिया का एक्सप्रेसवे आलोचना के बीच बना और देश की रफ्तार बन गया। हां, कोरिया ने इसकी कीमत भी चुकाई: थकाने वाले काम के घंटे और घटती जन्मदर। भारत चाहे तो वही मॉडल पूरा उठाए बिना सिर्फ अच्छी बातें चुन सकता है।
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