US Tech Layoffs: अमेरिका में भारतीय इंजीनियर्स पर क्यों आया डिपोर्टेशन का खतरा, जानें पूरी रिपोर्ट

Kaushiki | May 24, 2026, 13:52 IST
H1B Visa Layoff
अमेरिका में बड़े पैमाने पर हुई छंटनी के कारण 15 हजार से ज्यादा भारतीय टेक प्रोफेशनल्स की नौकरी चली गई है। ट्रंप प्रशासन के सख्त वीजा नियमों और ग्रीन कार्ड बैकलॉग के चलते अब उन पर अमेरिका से डिपोर्ट होने का गंभीर खतरा मंडरा रहा है।

H1B Visa Layoff: अमेरिका में रह रहे इंडियन सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स के लिए समय मुश्किल भरा चल रहा है। वहां की बड़ी कंपनियों ने बड़े पैमाने पर कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया है।



इस छंटनी के कारण लगभग 15 हजार से ज्यादा भारतीय टेक प्रोफेशनल्स की नौकरी अचानक चली गई है। ये सभी लोग H1B वीसा की मदद से अमेरिका में काम कर रहे थे।



अमेरिकी नियमों के अनुसार नौकरी जाने के बाद इन्हें 60 दिनों का समय मिलता है। इस सीमित समय के भीतर इन्हें कोई नई नौकरी ढूंढनी बेहद जरूरी है।



अगर इन 60 दिनों में कोई नया एम्प्लॉयर या वीसा स्पॉन्सर नहीं मिला तो दिक्कत बढ़ेगी। ऐसी स्थिति में इन सभी को कानूनी रूप से अमेरिका छोड़ना ही पड़ेगा।



US Tech Layoffs


ट्रंप की नीतियों से क्यों बढ़ी टेक प्रोफेशनल्स की मुसीबत

हाल के दिनों में मेटा, अमेजन और ऑरेकल जैसी बड़ी कंपनियों (कॉर्पोरेट छंटनी) में बड़ी छंटनी हुई है। इन कंपनियों ने अपने खर्चों को कम करने के लिए रिस्ट्रक्चरिंग की है।



इस पूरी प्रक्रिया में कुल 50 हजार से ज्यादा लोगों की नौकरियां चली गई हैं। इस नुकसान का सबसे बड़ा शिकार भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स ही बने हैं। प



हले के समय में नौकरी जाने पर टेक कर्मियों को नया काम जल्दी मिल जाता था। मगर अब ट्रंप प्रशासन की सख्त नीतियों के कारण इंटरव्यू की प्रक्रिया बहुत लंबी हो गई है।



कंपनियां (Company Layoff) अब नए विदेशी कर्मचारियों को वीसा स्पॉन्सर करने से पूरी तरह बच रही हैं। सख्त इमिग्रेशन नियमों के कारण कंपनियों के पास वीसा कोटा भी कम हो गया है।



60 दिन में नौकरी खोजें वरना अमेरिका छोड़ें', H-1B वीजा धारक भारतीय टेक प्रोफेशनल्स को अल्टीमेटम - u


ग्रीन कार्ड के नए नियमों से भारतीयों पर क्या असर पड़ेगा

ट्रंप प्रशासन ने ग्रीन कार्ड के आवेदन की पूरी प्रक्रिया को बदल दिया है। नए नियम के मुताबिक, अब एप्लीकेंट को स्टेटस चेंज करने के लिए अपने देश लौटना होगा।



पहले लोग अमेरिका में रहते हुए ही एडजस्टमेंट ऑफ स्टेटस के जरिए ग्रीन कार्ड पा लेते थे। अब ये सुविधा खत्म होने से अस्थाई वीजा धारकों पर बड़ा असर पड़ेगा।



इस बदलाव के कारण नौकरी और वतन वापसी दोनों ही चीजें एक साथ अटक जाएंगी। भारत आकर दूतावास से दोबारा वीसा की प्रक्रिया पूरी करनी पड़ेगी।



इस नई नीति से इंटरव्यू, सिक्योरिटी चेक और डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन में बहुत अधिक समय लगेगा। प्रोसेसिंग लंबी होने के कारण दोबारा अमेरिका लौटने का रास्ता मुश्किल हो जाएगा।



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क्या है ग्रीन कार्ड और ये कैसे काम करता है

Green Card (ग्रीन कार्ड) अमेरिका में रहने के लिए एक Permanent Resident Card है। ये कार्ड विदेशी नागरिकों को अमेरिका में स्थाई रूप से रहने और कानूनी रूप से काम करने की इजाजत देता है।



ये कैसे काम करता है?

  • जॉब या फैमिली: इसे पाने के लिए अमेरिकी कंपनी या वहां रह रहे परिवार के सदस्य को स्पॉन्सर करना पड़ता है।
  • सारे राइट्स: ग्रीन कार्ड मिलने के बाद आपको अमेरिकी नागरिकों की तरह लगभग सभी अधिकार मिलते हैं, सिवाय वोटिंग के।
  • सिटीजन बनने का रास्ता: पांच साल तक ग्रीन कार्ड होल्डर रहने के बाद आप अमेरिका की नागरिकता के लिए अप्लाई कर सकते हैं।
मेटा और ओरेकल में छंटनी: अमेरिका में काम कर रहे भारतीय एच-1बी कर्मचारियों के पास नौकरी ढूंढने या दे


ग्रीन कार्ड बैकलॉग के आंकड़ों की क्या है सच्चाई

जॉब बेस्ड ग्रीन कार्ड के पेंडिंग मामलों में इंडियन सिटीजन सबसे आगे चल रहे हैं। इसका मतलब है ग्रीन कार्ड के आवेदनों की वो लंबी पेंडिंग लिस्ट, जो कोटा लिमिटेड होने के कारण अटकी हुई है।



इसके चलते नए आवेदकों को अपना कार्ड पाने के लिए कई सालों या दशकों तक लंबा इंतजार करना पड़ता है। एक मशहूर संस्था की रिपोर्ट के मुताबिक, इसमें कुल 18 लाख मामले पेंडिंग हैं।



इन कुल मामलों में से 11 लाख से ज्यादा केस केवल भारतीयों के हैं। इसका सीधा मतलब है कि कुल बैकलॉग में भारतीयों की हिस्सेदारी लगभग 63 फीसदी है।



इस भारी भीड़ के कारण नए भारतीय आवेदकों के लिए इंतजार बहुत लंबा हो गया है। अब ग्रीन कार्ड पाने का वेटिंग पीरियड बढ़कर 10 से 15 साल हो चुका है।



पिछले 5 सालों के आंकड़ों को देखें तो कुल 49.97 लाख ग्रीन कार्ड जारी हुए हैं। इनमें से 29.32 लाख लोग अमेरिका में रहकर ही यह कार्ड हासिल कर पाए थे।



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मुश्किल वक्त में जोहो के फाउंडर ने क्या सलाह दी

इस संकट के समय भारतीय प्रोफेशनल्स के बीच घबराहट का माहौल साफ देखा जा सकता है। लोगों को बच्चों की पढ़ाई छूटने और होम लोन डूबने का डर सता रहा है।



इस गंभीर स्थिति को देखते हुए सॉफ्टवेयर कंपनी जोहो के फाउंडर श्रीधर वेम्बू आगे आए हैं। श्रीधर वेम्बू भारत की मशहूर टेक कंपनी Zoho Corporation के फाउंडर और सीईओ (CEO) हैं।



वे अपनी सादगी और गांव से काम करने के अनोखे आइडिया के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने हमेशा भारतीय इंजीनियर्स को अपने देश लौटकर इंडिपेंडेंट मैन्युफैक्चरिंग इंडिया में योगदान देने के लिए इंस्पायर्ड किया है।



उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए संकट में फंसे भारतीयों से एक भावुक अपील की है। श्रीधर वेम्बु ने कहा कि सभी प्रभावित इंजीनियर्स को अब भारत वापस लौट आना चाहिए।



भले ही ये फैसला शुरुआत में एक बड़े त्याग जैसा महसूस हो सकता है। उन्होंने लोगों से अपनी आत्मा की आवाज सुनने और स्वदेश में काम करने को कहा है। भारत का बढ़ता टेक बाजार अब इन प्रोफेशनल्स को नए अवसर दे सकता है।



सोर्स क्रेडिट:



  • वॉशिंगटन ब्यूरो विशेष समाचार रिपोर्ट (सैयद एम काजमी रिपोर्ट)।
  • अमेरिकी इमिग्रेशन विभाग (USCIS) एवं केटो संस्था (Cato Institute) के आधिकारिक आंकड़े।

FAQ

  1. अमेरिका में H1B वीजा धारक की नौकरी जाने पर देश छोड़ने के लिए कितना समय मिलता है?
    अमेरिका के इमिग्रेशन नियमों में यदि किसी H1B वीसा धारक कर्मचारी की छंटनी हो जाती है, तो उसे कानूनी रूप से नया वीसा स्पॉन्सर या नई नौकरी खोजने के लिए केवल 60 दिनों का ग्रेस पीरियड मिलता है। इस 60 दिनों की समय सीमा के भीतर कर्मचारी को किसी ऐसी कंपनी में नौकरी ढूंढनी होती है जो उसका वीसा ट्रांसफर और स्पॉन्सर करने के लिए तैयार हो। यदि तय समय में नया एम्प्लॉयर नहीं मिलता है, तो कर्मचारी का वीसा स्टेटस अवैध हो जाता है और उसे अनिवार्य रूप से अमेरिका छोड़ना पड़ता है।
  2. ट्रंप प्रशासन द्वारा ग्रीन कार्ड आवेदन की प्रक्रिया में क्या सख्त बदलाव किए गए हैं?
    ट्रंप प्रशासन की नई इमिग्रेशन नीति के तहत अब ग्रीन कार्ड आवेदन की प्रक्रिया को अत्यधिक सख्त कर दिया गया है। नए नियमों के मुताबिकर, अब आवेदकों को ग्रीन कार्ड की अंतिम प्रक्रिया पूरी करने और आवेदन करने के लिए अपने गृह देश (जैसे भारत) वापस लौटना होगा।
  3. अभी जॉब बेस्ड ग्रीन कार्ड बैकलॉग में भारतीयों की क्या स्थिति है?
    अमेरिकी केटो संस्था की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, कुल 18 लाख जॉब बेस्ड ग्रीन कार्ड बैकलॉग में से लगभग 11 लाख केस अकेले भारतीय नागरिकों के हैं। इस भारी पेंडेंसी और कोटा सिस्टम के कारण नए भारतीय आवेदकों के लिए ग्रीन कार्ड मिलने का वेटिंग पीरियड बढ़कर 10 से 15 साल हो चुका है। यही कारण है कि छंटनी का शिकार हुए भारतीयों के लिए अमेरिका में स्थाई रूप से बसना अब बेहद चुनौतीपूर्ण हो गया है।

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