प्रदर्शन के दौरान ज्यां द्रेज से पूछा गया आप कौन हैं
ज्यां द्रेज कौन हैं? जानें जंतर-मंतर पर आप कौन हैं के सवाल से वायरल हुए दिग्गज अर्थशास्त्री की कहानी
Manya Jain | Sootr Creatives | Oct 20, 2026, 08:08 IST
जानिए ज्यां द्रेज कौन हैं, मनरेगा में उनकी भूमिका क्या रही और जंतर-मंतर पर हिरासत के वायरल वीडियो से लेकर 2026 के ग्लोबल अवॉर्ड तक का सफर।
बेल्जियम में जन्मे अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज जंतर-मंतर पर हिरासत में लिए जाने के दौरान वायरल हुए वीडियो से चर्चा में हैं। जानिए 1979 से भारत में रह रहे इस झोले वाले अर्थशास्त्री की कहानी, नरेगा कानून में उनकी भूमिका और 2026 में मिले ग्लोबल अवॉर्ड तक का सफर।
आप कौन हैं? कहां से आए हैं?
जिन्होंने नरेगा कानून का मसौदा तैयार करने में अहम भूमिका निभाई, उनसे परिचय पूछा गया। वीडियो वायरल हो गया। इसके बाद सोशल मीडिया पर सवाल उठने लगे कि आखिर ये बुजुर्ग कौन हैं?
ज्यां द्रेज: एक नजर में
द्रेज 1979 से भारत में रह रहे हैं। वर्ष 2002 में उन्होंने भारतीय नागरिकता ली। उन्होंने एसेक्स विश्वविद्यालय में गणितीय अर्थशास्त्र की पढ़ाई की। भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) से पीएचडी पूरी की।
उनकी पत्नी बेला भाटिया भी जमीनी स्तर पर सामाजिक कार्य करती हैं। उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पीएचडी की है।
ज्यां द्रेज एक बड़े अर्थशास्त्री हैं।
इस हफ्ते चर्चा में क्यों हैं ज्यां द्रेज?
प्रदर्शनकारी मतदाता सूची की समीक्षा पर सवाल उठा रहे थे। उनका आरोप था कि इससे सत्ताधारी दल को फायदा हो रहा है। दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी। पुलिस ने कम समय की सूचना और कानून-व्यवस्था का हवाला दिया था। रिपोर्ट के मुताबिक, उस दिन कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया।
अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज भी प्रदर्शन में शामिल हुए थे। रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने पुलिस की तैनाती को जरूरत से ज्यादा बताया था। उनका कहना था कि वहां हिंसा या सुरक्षा का कोई खतरा नहीं था। इसके बावजूद पुलिस ने जरूरत से ज्यादा सख्ती दिखाई।
इसके बाद एक ऐसी घटना हुई, जिसने उन्हें सुर्खियों में ला दिया। पुलिस उन्हें हिरासत में लेकर जा रही थी। तभी एक रिपोर्टर ने उनसे पूछा, "आप कौन हैं?" आउटलुक के मुताबिक, इस सवाल पर सोशल मीडिया में आलोचना होने लगी। लोगों ने सवाल उठाया कि देश के इतने जाने-माने अर्थशास्त्री को पहचाना क्यों नहीं गया।
पुलिस उन्हें चार घंटे बाद छोड़ने को तैयार थी। लेकिन ज्यां द्रेज ने अकेले जाने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि वे बाकी प्रदर्शनकारियों के साथ ही बाहर जाएंगे। जब दूसरे हिरासत में लिए गए लोग छूटे, तब वे भी बाहर निकले। इस दौरान उन्हें करीब 11 घंटे इंतजार करना पड़ा। हिरासत में रहते हुए भी उन्होंने अपने साथियों का साथ नहीं छोड़ा।
बेल्जियम से भारत तक का सफर
लेकिन द्रेज की जिंदगी ने एक अलग मोड़ लिया। साल 1979 में वे सिर्फ 20 साल की उम्र में भारत आए। वे यहां एक रिसर्च प्रोग्राम के सिलसिले में पहुंचे थे। इस दौरान उन्होंने गांवों और आदिवासी इलाकों में गरीबी देखी। उन्होंने लोगों को भूख से जूझते हुए भी करीब से देखा।
इसके बाद द्रेज ने भारत में रहने का फैसला किया। उन्होंने भूख और गरीबी के खिलाफ काम करने की ठानी। उन्होंने ISI से पीएचडी की। इसके बाद भारत से उनका जुड़ाव लगातार गहरा होता गया।
यूरोप की सुविधाजनक जिंदगी छोड़कर वे दिल्ली की झुग्गी बस्ती में रहने लगे। रिपोर्ट के मुताबिक, वे अपना खाना खुद बनाते थे। वे बोरी पर सोकर गुजारा करते थे। कुछ साल पहले भी झारखंड में उन्हें हिरासत में लिया गया था। उस समय योगेंद्र यादव ने उन्हें 'संत-अर्थशास्त्री' कहा था।
द्रेज ने झारखंड और छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में काम किया। उन्होंने शिक्षा और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में भी योगदान दिया। वे लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पढ़ा चुके हैं। उन्होंने दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में भी पढ़ाया है। इसके अलावा, वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मानद चेयर प्रोफेसर भी रहे हैं।
नरेगा: काम मांगने का अधिकार
यानी काम मांगना अब सिर्फ गुहार नहीं, कानूनी अधिकार था। जानकारी के मुताबिक ज्यां द्रेज सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (NAC) के सदस्य थे। सूचना का अधिकार कानून और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के निर्माण में भी उन्होंने सलाह दी है।
यह सब आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े मुद्दे हैं। राशन, जॉब कार्ड और भोजन के अधिकार से जुड़ी बहसें इसी सिलसिले का हिस्सा हैं।
उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन के साथ अकाल और भूख पर किताबें लिखीं हैं। निकोलस स्टर्न और एंगस डीटन के साथ भी उन्होंने लेखन कार्य किया है। उनके निबंधों का कलेक्शन "सेंस एंड सॉलिडैरिटी" नाम से प्रकाशित हुआ था।
हालांकि, नरेगा के क्रियान्वयन पर सवाल भी उठते रहे हैं। आलोचक मजदूरी भुगतान और फंड जारी होने में देरी का मुद्दा उठाते रहे हैं।
झोले वाले अर्थशास्त्री
अब जरा उनके पुराने दिनों पर नजर डालते हैं। ज्यां द्रेज पढ़ाई के दौरान लंदन में बेघर लोगों के साथ रहे। साल 1988 में उन्होंने इन लोगों को अपना आंदोलन खड़ा करने में मदद की थी। इस अनुभव पर उन्होंने "नंबर 1 क्लैपम रोड: द डायरी ऑफ अ स्क्वैट" लिखी।
1990-91 के खाड़ी युद्ध के दौरान वे एक शांति शिविर में शामिल हुए थे। यह शिविर इराक-कुवैत सीमा पर लगा था। बाद में उन्होंने युद्ध के बाद इराक में भूख और गरीबी पर किताब लिखी थी।
बेला भाटिया से उनकी मुलाकात दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के दिनों में हुई। सामाजिक बदलाव के साझा जुनून ने दोनों को करीब ला दिया। शादी के बाद दोनों ने झुग्गी बस्ती के एक कमरे में गृहस्थी शुरू की।
पैरिस में मिला GiRA अवॉर्ड
यह अवॉर्ड वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब और साइंसेज पो के एक केंद्र ने मिलकर शुरू किया था। साल 2024 में पहला अवॉर्ड बीना अग्रवाल और जेम्स के. बॉयस को मिला था। द्रेज इसके दूसरे संस्करण के विजेता हैं।
उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि केवल उनकी नहीं है। उनका काम उन लोगों और समूहों के सहयोग से संभव हुआ है, जो सामाजिक बदलाव के लिए जुटे हैं।
द्रेज के मुताबिक डॉ. आंबेडकर ने भारत को "असमानता का संग्रहालय" कहा था। यहां आर्थिक असमानता के साथ जाति और लिंग आधारित भेदभाव भी मौजूद है। हालांकि, वे यह भी मानते हैं कि असमानता के खिलाफ आंदोलनों की परंपरा समृद्ध रही है।
VB-G RAM G से भी जुड़ा द्रेज का नाम
इस कानून को नरेगा की जगह लाने का प्रावधान किया गया था। सरकार ने इसे 1 जुलाई 2026 से लागू करने की घोषणा की थी। इसमें साल में 125 दिन के रोजगार का प्रावधान बताया गया है।
सरकार का कहना है कि इससे ग्रामीण रोजगार का ढांचा आधुनिक और टिकाऊ बनेगा। आलोचकों का तर्क है कि रोजगार की गारंटी अब मांग के बजाय तय आवंटन पर निर्भर होगी। द्रेज ने इसे रोजगार गारंटी पर बेहद सख्त प्रहार बताया था।
युवाओं के लिए करियर के रास्ते
ज्यां द्रेज की रिसर्च भूख, लैंगिक असमानता, बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा पर केंद्रित रही है। इन विषयों में सर्वे और डेटा विश्लेषण करने वाले युवाओं के लिए भी मौके हैं। शुरुआत के लिए गणित और सांख्यिकी की मजबूत समझ उपयोगी होती है।
भारत इस कहानी से क्या सीखे?
दूसरी सीख: रोजगार की गारंटी तभी सार्थक है, जब मजदूरी का समय पर भुगतान हो। पंचायत स्तर पर मजदूरी भुगतान में देरी के आंकड़े सार्वजनिक किए जा सकते हैं।
तीसरी सीख: बहस नारों से नहीं, आंकड़ों से होनी चाहिए। रोजगार के 125 दिन के वादे पर सरकार और आलोचकों को आंकड़े सामने रखने चाहिए। कुछ कार्यकर्ताओं का दावा है कि बजट से सिर्फ 42 दिन का काम मिल सकेगा। हालांकि, इस आंकड़े की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। सरकार भी आधिकारिक आंकड़ों के साथ स्थिति स्पष्ट कर सकती है।
ज्यां द्रेज से जुड़ी अनसुनी बातें
सैद्धांतिक अर्थशास्त्र से शुरू हुआ उनका सफर गांवों की जमीनी समस्याओं तक पहुंचा।
FAQ
ज्यां द्रेज कौन हैं ?
ज्यां द्रेज बेल्जियम में जन्मे भारतीय अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। वे 1979 से भारत में रह रहे हैं और 2002 में भारतीय नागरिकता प्राप्त की। उन्होंने नरेगा कानून के मसौदे में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।- ज्यां द्रेज इस हफ्ते चर्चा में क्यों हैं?
ज्यां द्रेज 10 अक्टूबर 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए गए। उस समय एक रिपोर्टर के "आप कौन हैं?" सवाल का वीडियो वायरल हो गया, जिससे वे सुर्खियों में आ गए। - ज्यां द्रेज ने नरेगा में क्या योगदान दिया है?
ज्यां द्रेज ने 2005 में बने नरेगा कानून का मसौदा तैयार करने में अहम भूमिका निभाई, जिसने ग्रामीण परिवारों को साल में 100 दिन के रोजगार की कानूनी गारंटी प्रदान की।
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