कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए भारत-चीन हमारी जमीन का इस्तेमाल बंद करें: नेपाल
News in Short
- नेपाल ने लिपुलेख दर्रे के इस्तेमाल पर भारत और चीन से कड़ा विरोध जताया।
- नेपाल का दावा है कि लिपुलेख नेपाली सीमा का हिस्सा है।
- भारत और चीन के बीच 2015 में समझौता हुआ था, जिसमें नेपाल को बाहर रखा गया।
- नेपाल ने कूटनीतिक तरीके से इस मुद्दे को सुलझाने की अपील की है।
- 2026 कैलाश मानसरोवर यात्रा पर नेपाल का विरोध फिर से सामने आया।
News in Detail
नेपाल ने भारत और चीन से कड़ा विरोध जताया है। उन्होंने कहा है कि लिपुलेख दर्रा का इस्तेमाल कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए बंद किया जाए। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने इस मुद्दे पर काठमांडू से एक औपचारिक बयान जारी किया। बयान में कहा गया कि लिपुलेख दर्रा नेपाली भूमि पर स्थित है और इसे काठमांडू की सहमति के बिना भारत और चीन द्वारा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
लिपुलेख नेपाली सीमा का हिस्सा
नेपाल के विदेश मंत्रालय ने कहा कि लिपुलेख दर्रा नेपाल की पश्चिमी सीमा है। इसकी सीमा महाकाली नदी के स्रोत से तय की गई थी। नेपाल का दावा 1816 की सुगौली संधि पर आधारित है। इस संधि में इस क्षेत्र को नेपाल के हिस्से के रूप में माना गया था। नेपाल का कहना है कि लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख नेपाल की संप्रभुता के तहत आते हैं। यह भूमि नेपाल-भारत के त्रिकोणीय जंक्शन पर स्थित है।
इमेज से समझिए से कहां पर है नेपाल कर विरोध
भारत-चीन का साझा समझौता
भारत और चीन ने 2015 में लिपुलेख दर्रे को कैलाश मानसरोवर यात्रा के मार्ग के रूप में खोलने का समझौता किया था। इसमें नेपाल को कोई प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया था। नेपाल ने इस समझौते का विरोध किया और कहा कि भारत और चीन के बीच कोई भी द्विपक्षीय समझौता, बिना नेपाल की अनुमति के, नेपाली क्षेत्र के उपयोग को वैध नहीं बना सकता।
नेपाल का कूटनीतिक दृष्टिकोण
नेपाल के विदेश मंत्रालय का बयान सधा हुआ और कूटनीतिक है। मंत्रालय ने भारत और चीन से इस मुद्दे को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने की अपील की है। मंत्रालय ने यह भी कहा कि वे राजनयिक माध्यमों से भारत और चीन का ध्यान आकर्षित कर चुके हैं। नेपाल का बयान यह दर्शाता है कि वे अपनी संप्रभुता को लेकर दृढ़ हैं, लेकिन संवाद और शांति के साथ समाधान की ओर अग्रसर हैं।
नेपाल और भारत के बीच बढ़ते विवाद
2020 में भारत द्वारा लिपुलेख से जोड़ने वाली एक सड़क का उद्घाटन हुआ था, जो नेपाल के लिए बड़ा उकसावा साबित हुआ। इस सड़क के निर्माण से विवाद बढ़ा और नेपाल ने भारत के खिलाफ आधिकारिक विरोध दर्ज कराया। नेपाल ने नया सीमा मानचित्र जारी किया, जिसमें लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को नेपाल के हिस्से के रूप में दर्शाया गया। यह कदम नेपाल में राष्ट्रवाद की लहर को बढ़ावा देने में मददगार साबित हुआ।
टालमटोल भरी प्रतिक्रिया
नेपाल और भारत के बीच चीन इस मुद्दे पर मध्यस्थता नहीं कर रहा है। 2025 में, जब भारत और चीन के बीच लिपुलेख दर्रे को फिर से खोलने पर सहमति बनी, नेपाल ने फिर से विरोध जताया। नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री केपी ओली ने यह मुद्दा चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सामने रखा, लेकिन चीन ने न तो नेपाल के दावे को चुनौती दी और न ही समर्थन दिया। यह मामला अभी भी बिना समाधान के लटका हुआ है।
भारत-चीन की तीर्थयात्रा पर नेपाल का विरोध
अब, 2026 की कैलाश मानसरोवर यात्रा की घोषणा के साथ नेपाल का विरोध फिर से चर्चा में है। नेपाल का कहना है कि भारत और चीन के साथ हो रही इस यात्रा की योजना से उन्हें बाहर रखा जा रहा है, जबकि यह नेपाली क्षेत्र है। नेपाल ने यह स्पष्ट किया है कि वे इस मुद्दे को कूटनीतिक माध्यम से आगे बढ़ाएंगे और अपनी संप्रभुता की रक्षा करेंगे।
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