सेहत का घूंट या बीमारी की खुराक? दूध में मिला माइक्रोप्लास्टिक, जानें कितना है खतरा

Amresh Kushwaha | Sept 17, 2026, 12:40 IST
दूध में मिला माइक्रोप्लास्टिक
भारत में बिकने वाले पैकेट और फार्म के कच्चे दूध दोनों में माइक्रोप्लास्टिक पाया गया है। जानिए विशेषज्ञों की राय, स्वास्थ्य जोखिम और क्या आपको पैकेट वाला दूध पीना बंद कर देना चाहिए?

समझें क्या है पूरा मामला...

  • भारत में बिकने वाले दूध में माइक्रोप्लास्टिक पाया गया है।
  • पैकेट और फार्म के कच्चे दूध दोनों में यह मिला है।
  • पैकेट वाले दूध में माइक्रोप्लास्टिक ज्यादा मात्रा में पाया गया है।
  • प्लास्टिक पैकेजिंग को इसकी बड़ी वजह बताया जा रहा है।
  • विशेषज्ञों ने अभी दूध पीना बंद करने से मना किया है।

दूध भारत में रोज पीई जाने वाली चीजों का अहम हिस्सा है। एक नई रिसर्च में सामने आया है कि इसी दूध के जरिए माइक्रोप्लास्टिक भी हमारे शरीर में पहुंच सकता है। यह बात सुनकर लोगों के मन में सवाल उठना लाजमी है। सितंबर में जर्नल ऑफ फूड कंपोजिशन एंड एनालिसिस में एक स्टडी छपी है। इसमें भारत में बिकने वाले पैकेट के दूध और फार्म के कच्चे दूध दोनों की जांच की गई। दोनों ही तरह के दूध में माइक्रोप्लास्टिक मिला है।



स्टडी में क्या मिला

शोधकर्ताओं ने कुल नौ सैंपल की जांच की। इन सैंपल में माइक्रोप्लास्टिक के 66 कण पाए गए। एक लीटर दूध में इन कणों की संख्या तीन से 30 तक रही। ज्यादातर कण फाइबर या बहुत छोटे टुकड़ों के रूप में मिले। लैब जांच में पॉलीएथिलीन और पॉलीप्रोपाइलीन नाम के प्लास्टिक भी पाए गए।



पैकेजिंग में इन दोनों प्लास्टिक का खूब इस्तेमाल होता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि पैकेजिंग के संपर्क से दूध में माइक्रोप्लास्टिक पहुंच सकता है। हालांकि हैरानी की बात यह है कि कच्चे दूध में भी यह पाया गया।



पहले भी आई थी चेतावनी

यह पहली बार नहीं है जब दूध में माइक्रोप्लास्टिक मिला हो। इस साल जनवरी में भी एक स्टडी सामने आई थी। यह स्टडी फूड एंड केमिकल टॉक्सिकोलॉजी जर्नल में प्रकाशित हुई थी। इसे गुजरात की नेशनल फॉरेंसिक साइंसेज यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने किया था। इस स्टडी में पैकेट वाले दूध के छह ब्रांड जांचे गए थे। साथ ही फार्म से सीधे मिलने वाला दूध भी जांचा गया था। इस रिसर्च ने भी पैकेजिंग को माइक्रोप्लास्टिक की बड़ी वजह बताया था।



पैकेट के दूध में ज्यादा मात्रा

गुजरात की इस स्टडी के नतीजे चौंकाने वाले रहे। फार्म के दूध में एक लीटर में करीब 17.8 माइक्रोप्लास्टिक कण मिले। वहीं पैकेट वाले दूध में यह संख्या 37.8 से 71.1 तक पाई गई। यानी पैकेट के दूध में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा फार्म के दूध से चार गुना तक ज्यादा थी। पैकेट के सैंपल में लो-डेंसिटी पॉलीएथिलीन सबसे ज्यादा पाया गया। दूध की पैकेजिंग में यह प्लास्टिक आमतौर पर इस्तेमाल होता है।



कहां से आता है प्लास्टिक

शोधकर्ताओं के मुताबिक दूध में प्लास्टिक कई अलग-अलग जगहों से पहुंच सकता है। इनमें पशुओं के चारे के बैग शामिल हैं। दूध निकालने वाली मशीनें भी इसका एक कारण हो सकती हैं। फिल्टर और दूध तैयार करने में इस्तेमाल होने वाला सामान भी इसमें शामिल है। इसके अलावा पैकेजिंग के दौरान भी दूध में माइक्रोप्लास्टिक मिल सकता है। यानी दूध के उत्पादन से लेकर पैकिंग तक हर चरण पर खतरा बना रहता है।



सेहत पर क्या हो सकता है असर

स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता सिर्फ यह नहीं है कि ये कण शरीर में जा रहे हैं। असली चिंता यह है कि सालों तक इनके संपर्क में रहने से शरीर पर क्या असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि माइक्रोप्लास्टिक के असर को समझने के लिए रिसर्च अभी जारी है।



सिर्फ माइक्रोप्लास्टिक मिलना यह साबित नहीं करता कि दूध पीने से बीमारी हो जाएगी। कितनी मात्रा में दूध पीने से खतरा बढ़ सकता है, यह अभी साबित नहीं हुआ है। फिर भी जानवरों और लैब में हुई स्टडी में कुछ असर जरूर देखे गए हैं। इनमें इंफ्लेमेशन, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और शरीर के टिश्यू को नुकसान जैसे असर शामिल हैं।



बड़ी बीमारियों से जुड़ाव की आशंका

एनवायरनमेंटल साइंस एंड टेक्नोलॉजी जर्नल में छपी एक रिसर्च में कुछ गंभीर संकेत मिले हैं। इसमें डाइजेस्टिव, रिप्रोडक्टिव और रेस्पिरेटरी हेल्थ पर असर की आशंका जताई गई है। लंबे समय तक आंतों में सूजन रहने का खतरा बताया गया है।



बीमारियों से लड़ने की शरीर की क्षमता में बदलाव भी देखा गया है। स्पर्म क्वालिटी में कमी और रिप्रोडक्टिव हार्मोन में बदलाव के भी संकेत मिले हैं। हालांकि यह सभी नतीजे अभी शुरुआती स्तर पर हैं।



शरीर के कई हिस्सों में मिला माइक्रोप्लास्टिक

चिंता की बात सिर्फ दूध तक सीमित नहीं है। माइक्रोप्लास्टिक इंसानों के खून में भी पाया जा चुका है। यह लिवर और कोलन में भी मिल चुका है। सीमन और ब्रेस्ट मिल्क में भी इसकी मौजूदगी दर्ज की गई है।



इससे साफ पता चलता है कि कुछ कण डाइजेस्टिव ट्रैक्ट से आगे बढ़कर शरीर के दूसरे हिस्सों तक भी पहुंच रहे हैं। शोधकर्ताओं का खास ध्यान अब नैनोप्लास्टिक पर है। यह माइक्रोप्लास्टिक से भी बहुत छोटे कण होते हैं। छोटे आकार के कारण ये शरीर की सुरक्षा परतों को आसानी से पार कर सकते हैं।



बच्चों पर ज्यादा असर की आशंका

गुजरात की स्टडी में एक और अहम बात सामने आई। पैकेट वाले दूध से रोज शरीर में जाने वाला माइक्रोप्लास्टिक फार्म के दूध से ज्यादा हो सकता है। स्टडी में यह भी बताया गया कि बच्चों के शरीर के हिसाब से उनमें संपर्क ज्यादा हो सकता है। दूध रोज पिया जाता है और अक्सर बचपन से ही पीना शुरू हो जाता है। इसलिए यह मामला सिर्फ किसी एक खराब पैकेट तक सीमित नहीं रह जाता।



दूध पीना बंद न करें, विशेषज्ञों की सलाह

विशेषज्ञों का साफ कहना है कि अभी दूध पीना बंद करना कोई समाधान नहीं है। दूध आज भी प्रोटीन और जरूरी पोषक तत्वों का बड़ा स्रोत बना हुआ है। इसके बजाय उत्पादन और पैकेजिंग में प्लास्टिक का अनावश्यक इस्तेमाल कम करने की जरूरत है।



खाद्य सुरक्षा से जुड़े अधिकारियों के सामने अब एक बड़ा सवाल है। यह सवाल सिर्फ यह नहीं है कि माइक्रोप्लास्टिक खाने-पीने का हिस्सा बना है या नहीं। असली सवाल यह है कि इसके संपर्क को कैसे और कितना कम किया जा सकता है।



आगे की रिसर्च पर टिकी नजर

वैज्ञानिक अब यह भी देख रहे हैं कि क्या माइक्रोप्लास्टिक से दिल और मेटाबॉलिज्म की बीमारियां बढ़ सकती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इंसानों में यह संबंध अभी पक्के तौर पर साबित नहीं हुआ है। इसलिए आगे और बड़ी और गहरी रिसर्च की जरूरत बताई जा रही है। तब तक जागरूकता और सावधानी ही सबसे जरूरी उपाय मानी जा रही है।



यह खबर क्यों जरूरी है

यह खबर हर उस व्यक्ति से जुड़ी है, जो रोज दूध पीता है। खाने-पीने की चीजों में मिलावट या संदूषण की जानकारी जनता का अधिकार है। संविधान नागरिकों को स्वच्छ और सुरक्षित खाद्य पदार्थ पाने का अधिकार देता है।



यह खबर किसी ब्रांड या कंपनी को निशाना नहीं बनाती, बल्कि वैज्ञानिक स्टडी के तथ्य सामने रखती है। इससे लोग सतर्क हो सकते हैं और पैकेजिंग से जुड़े खतरों को समझ सकते हैं। साथ ही यह भी साफ करती है कि अभी घबराने की जगह जागरूक रहने की जरूरत है। यह रिपोर्टिंग वैज्ञानिक शोध और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है, इसलिए संतुलित और भरोसेमंद है।



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