नेहरू-पटेल की वो बहस जिसने सिविल सेवा को दिया जीवनदान, जानें National Civil Services Day की कहानी
National Civil Services Day: क्या आप जानते हैं कि भारत को चलाने वाली असली ताकत कौन है? हमारे देश के सिविल सेवक यानी IAS और IPS अधिकारी प्रशासन की रीढ़ हैं। हर साल 21 अप्रैल को हम नेशनल सिविल सर्विस डे मनाते हैं।
ये दिन उन अधिकारियों के सम्मान में समर्पित है जो दिन-रात काम करते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि आजादी के समय ये सर्विस खत्म होने वाली थी? पंडित नेहरू और सरदार पटेल के बीच इसे लेकर काफी अलग विचार थे। चलिए आज हम इसी दिलचस्प कहानी के बारे में डिटेल से बात करेंगे।
जब नेहरू और पटेल के बीच हुआ मतभेद
आजादी के तुरंत बाद भारत में एडमिनिस्ट्रेटिव स्ट्रक्चर पूरी तरह बिखरा हुआ था। अंग्रेजों के जमाने की इंडियन सिविल सर्विस (ICS) को लेकर नेहरू खुश नहीं थे।
पंडित नेहरू का मानना था कि ये पुरानी व्यवस्था अब खत्म होनी चाहिए। वे चाहते थे कि स्वतंत्र भारत के लिए बिल्कुल नया सिस्टम तैयार किया जाए। नेहरू जी पुरानी ब्यूरोक्रेसी को कोलोनियल मेंटालिटी का एंब्लेम मानते थे।
एमए मथाई की किताब में इस टकराव का जिक्र विस्तार से मिलता है। हालांकि, देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की सोच अलग थी।
पटेल जानते थे कि बिना अनुभवी अफसरों के देश चलाना बहुत मुश्किल होगा। उन्होंने नेहरू के विचार का डटकर विरोध किया और अफसरों का बचाव किया।
21 अप्रैल: सरदार पटेल का स्टील फ्रेम वाला भाषण
साल 1947 में 21 अप्रैल के दिन एक ऐतिहासिक घटना घटी थी। दिल्ली के मेटकॉफ हाउस में सरदार पटेल ने युवा अफसरों को संबोधित किया। उन्होंने सिविल सेवकों को पहली बार भारत का स्टील फ्रेम कहा था।
पटेल (Sardar Vallabhbhai Patel) का मानना था कि अफसर ही देश की एकता को बनाए रखेंगे। उन्होंने अधिकारियों को जनता का सेवक बनकर काम करने की सलाह दी।
इस भाषण की याद में 2006 से यह दिवस मनाया जाने लगा। पटेल के प्रयासों की वजह से ही आज हमारे पास IAS सर्विस है। इसीलिए सरदार पटेल को सिविल सेवा का संरक्षक संत भी कहा जाता है।
सिविल सेवा का इतिहास
भारत में मॉडर्न सिविल सेवा (national civil services day) की नींव वारेन हेस्टिंग्स ने रखी थी। लेकिन इसमें बड़े सुधार करने का श्रेय चार्ल्स कार्नवालिस को जाता है। इसीलिए कार्नवालिस को भारतीय सिविल सेवा का जनक माना जाता है।
पहले ये परीक्षा केवल लंदन में होती थी, जो बहुत कठिन थी। साल 1922 में पहली बार ये परीक्षा भारत में आयोजित की गई थी। रवींद्रनाथ टैगोर के भाई सत्येंद्रनाथ टैगोर पहले भारतीय सिविल सेवक बने थे।
अन्ना जॉर्ज मल्होत्रा भारत की पहली महिला IAS अधिकारी के रूप में चुनी गईं। वहीं, किरण बेदी देश की पहली महिला IPS बनकर इतिहास रच चुकी हैं।
मॉडर्न इंडिया में इसका रोल
साल 1926 में पहली बार संघीय लोक सेवा आयोग (Federal Public Service Commission) का गठन हुआ था। आजादी के बाद इसका नाम बदलकर संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) कर दिया गया।
अब UPSC हर साल कठिन परीक्षा के जरिए योग्य अधिकारी चुनता है। ये संस्था पूरी पारदर्शिता के साथ देश के लिए क्रीम अफसर तलाशती है। सिविल सेवा दिवस पर बेहतरीन काम करने वाले अफसरों को अवॉर्ड मिलते हैं।
प्रधानमंत्री खुद लोक प्रशासन में उत्कृष्टता पुरस्कार (Excellence in Public Administration Award) देकर उन्हें सम्मानित करते हैं। ये दिन अधिकारियों को उनके कर्तव्य और सेवा की याद दिलाता है। राष्ट्र के विकास में इन सिविल सेवकों का योगदान बहुत बड़ा है।
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