NCERT किताब विवाद: SC ने 3 शिक्षाविदों पर बैन वापस लिया, अपना ही आदेश बदला
समझें क्या है पूरा मामला
- NCERT की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान किताब में न्यायपालिका पर एक विवादित चैप्टर था।
- सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2026 में उस पूरी किताब पर प्रतिबंध लगाते हुए सभी प्रतियां जब्त करने का आदेश दिया था।
- 11 मार्च 2026 को 3 शिक्षाविदों को सरकारी और सार्वजनिक शैक्षणिक संस्थानों के शैक्षणिक कार्यों से अलग करने का आदेश दिया गया था।
- 22 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने वह प्रतिबंध आदेश वापस ले लिया और आपत्तिजनक टिप्पणियां भी हटा दीं।
- अदालत ने माना कि चैप्टर सामूहिक प्रयास का नतीजा था, किसी एक व्यक्ति का नहीं।
शुरुआत कहां से हुई
फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट की नजर NCERT (National Council of Educational Research and Training) की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान किताब पर पड़ी। इस किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर एक चैप्टर था। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत CJI Surya Kant की अध्यक्षता वाली पीठ ने इसे अत्यंत आपत्तिजनक माना। कोर्ट ने कहा कि यह अदालत को बदनाम करने की एक सोची-समझी कोशिश लगती है।
26 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने उस किताब पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया। सभी भौतिक प्रतियां जब्त करने और डिजिटल संस्करण हटाने का आदेश दिया गया। NCERT के निदेशक और स्कूल शिक्षा सचिव को कारण बताओ नोटिस भी जारी हुए। NCERT ने सफाई दी कि किताब में जो भी आया, वह बिल्कुल अनजाने में था।
11 मार्च 2026 का कड़ा आदेश
मामले की अगली सुनवाई 11 मार्च 2026 को हुई। इस बार पीठ ने तीन शिक्षाविदों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया। प्रोफेसर मिशेल दानिनो, सुपर्णा दीवाकर और अलोक प्रसन्न कुमार को केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, विश्वविद्यालयों और सरकारी वित्तपोषित संस्थानों के सभी शैक्षणिक कार्यों से अलग रहने का निर्देश दिया गया।
कोर्ट ने उस आदेश में यह भी दर्ज किया कि इन तीनों ने जानबूझकर और सोच-समझकर तथ्यों को तोड़-मरोड़ा तथा कक्षा 8 के छात्रों के मन में न्यायपालिका की नकारात्मक छवि बनाने की कोशिश की। यह टिप्पणी तीनों के पेशेवर जीवन के लिए बेहद गंभीर थी।
तीनों शिक्षाविद सुप्रीम कोर्ट पहुंचे
मार्च के आदेश के बाद अप्रैल 2026 में तीनों शिक्षाविदों ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की। उन्होंने कहा कि उन्हें सुने बिना यह आदेश पास किया गया। वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने प्रोफेसर मिशेल दानिनो की ओर से दलील दी कि यह किसी एक व्यक्ति का काम नहीं था। यह पूरी तरह एक सामूहिक प्रक्रिया थी।
वरिष्ठ अधिवक्ता जे. साई दीपक ने सुपर्णा दीवाकर की ओर से बताया कि उनका इस काम में बहुत सीमित योगदान था। कोर्ट के आदेश से उनकी आजीविका का अधिकार प्रभावित हो रहा था। अदालत ने तब उनकी अर्जी रिकॉर्ड में लेते हुए दो हफ्ते बाद सुनवाई की बात कही।
22 मई को बड़ी राहत
22 मई 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ ने फैसला सुनाया। पीठ ने 11 मार्च के उस हिस्से को वापस ले लिया, जिसमें तीनों पर प्रतिबंध लगाया गया था। साथ ही वह टिप्पणी भी हटा दी, जिसमें कहा गया था कि इन्होंने जानबूझकर तथ्य तोड़े।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, केंद्र शासित प्रदेश और सरकारी वित्तपोषित संस्थाएं इन तीनों शिक्षाविदों को भविष्य में किसी भी शैक्षणिक कार्य से जोड़ने के बारे में अपना स्वतंत्र निर्णय ले सकती हैं। यानी अब कोर्ट का कोई प्रतिबंध उन पर नहीं रहा।
वकीलों ने क्या कहा
वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने मिशेल दानिनो की ओर से कहा कि मार्च का आदेश उन्हें सुने बिना पास हुआ था। यह बात कोर्ट ने स्वीकार की। वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अलोक प्रसन्न कुमार की ओर दलील दी कि कक्षा 8 का चैप्टर दरअसल कक्षा 6 और 7 के चैप्टरों की अगली कड़ी था। उन्होंने यह भी कहा कि जब मीडिया में न्यायपालिका की खामियों पर खुलकर चर्चा होती है, तो छात्रों को भी व्यवस्था की सही समझ मिलनी चाहिए।
न्यायमूर्ति बागची ने हालांकि यह जरूर कहा कि किताब में भ्रष्टाचार को केवल न्यायपालिका की समस्या के रूप में दिखाया गया था। उन्होंने कहा कि किताब में कानूनी सहायता और न्यायपालिका की सकारात्मक भूमिका के बारे में कुछ नहीं था। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि चैप्टर की सामग्री उचित नहीं थी, लेकिन अब यह माना गया कि इसके पीछे कोई बुरी नीयत नहीं थी।
किताब पर प्रतिबंध अभी भी जारी
यह ध्यान रखना जरूरी है कि शिक्षाविदों पर लगे प्रतिबंध को वापस लेना और किताब पर लगे बैन, ये दो अलग बातें हैं। किताब पर 26 फरवरी 2026 को लगाया गया प्रतिबंध अभी भी लागू है। किताब की समीक्षा के लिए पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस इंदु मल्होत्रा, पूर्व अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल और गढ़वाल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रकाश सिंह की एक समिति बनाई गई है। यह समिति भोपाल के राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (National Judicial Academy) के साथ मिलकर काम करेगी।
यह खबर क्यों जरूरी है?
यह खबर कई स्तरों पर बेहद महत्वपूर्ण है। पहली बात, किसी को भी बिना सुने दंडित करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने खुद यह गलती सुधारी, जो एक स्वस्थ न्यायिक परंपरा का उदाहरण है। दूसरी बात, यह मामला शिक्षा के अधिकार और शैक्षणिक स्वायत्तता से जुड़ा है। स्कूल की किताबों में न्यायपालिका समेत किसी भी संस्था की आलोचनात्मक समझ देना और उसे नकारात्मक प्रचार कहना, इन दोनों के बीच की रेखा कहां है, यह प्रश्न पूरे देश की शिक्षा नीति के लिए अहम है। तीसरी बात, इस घटनाक्रम ने यह दिखाया कि पेशेवर प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए न्यायिक समीक्षा की प्रक्रिया काम करती है। NCERT की पाठ्यपुस्तकें करोड़ों बच्चों को पढ़ाई जाती हैं, इसलिए उनकी सामग्री का संतुलित होना डिजिटल और सामाजिक नैतिकता दोनों की कसौटी पर जरूरी है।
जरूरी FAQ
सुप्रीम कोर्ट ने NCERT की कक्षा 8 की किताब पर प्रतिबंध क्यों लगाया था?
फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट को NCERT की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर एक चैप्टर आपत्तिजनक लगा। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यह न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाने और उसे बदनाम करने की सोची-समझी कोशिश है। अदालत ने आदेश दिया कि सभी भौतिक प्रतियां जब्त हों और डिजिटल संस्करण हटाया जाए। NCERT ने इसे अनजाने में हुई गलती बताया। किताब पर यह प्रतिबंध अभी भी जारी है।
22 मई के आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने तीन शिक्षाविदों के बारे में क्या बदला?
22 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 के आदेश में दो बड़े बदलाव किए। पहला, तीनों शिक्षाविदों प्रोफेसर मिशेल दानिनो, सुपर्णा दीवाकर और अलोक प्रसन्न कुमार पर जो प्रतिबंध लगाया गया था कि ये सरकारी और सार्वजनिक शैक्षणिक संस्थाओं के किसी काम में भाग नहीं ले सकते, वह वापस ले लिया गया। दूसरा, मार्च के आदेश में जो टिप्पणी दर्ज थी कि इन्होंने जानबूझकर तथ्यों को तोड़-मरोड़ा, वह भी हटा दी गई। अदालत ने माना कि इनकी बात सुने बिना यह आदेश पास किया गया था और चैप्टर एक सामूहिक प्रयास था।
NCERT की किताब की समीक्षा के लिए कौन सी समिति बनाई गई है?
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर एक तीन सदस्यीय समिति बनाई गई है जो NCERT की कक्षा 8 की विवादित किताब के संशोधित चैप्टर की समीक्षा करेगी। इसमें पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस इंदु मल्होत्रा, पूर्व अटॉर्नी जनरल (Attorney General) के.के. वेणुगोपाल और गढ़वाल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रकाश सिंह शामिल हैं। यह समिति भोपाल स्थित राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी के साथ समन्वय में काम करेगी, जिसके प्रमुख पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस अनिरुद्ध बोस हैं।
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