जनहित याचिका खत्म करने की मांग: सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की दलील, PIL के दुरुपयोग पर उठे सवाल

Pawan Modiya | Apr 09, 2026, 17:53 IST
Photograph: (the sootr)
जनहित याचिका (PIL) को खत्म करने की मांग सुप्रीम कोर्ट में उठी। केंद्र सरकार ने कहा कि PIL का दुरुपयोग बढ़ रहा है और अब इसकी जरूरत कम हो गई है।

भारत की न्यायिक व्यवस्था में लंबे समय से महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली जनहित याचिका (Public Interest Litigation – PIL) को लेकर अब बड़ा संवैधानिक सवाल खड़ा हो गया है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है कि जनहित याचिका के ढांचे की समीक्षा की जाए और आवश्यकता पड़ने पर इसे पूरी तरह समाप्त करने पर विचार किया जाए।



सरकार का कहना है कि जिस उद्देश्य से PIL की शुरुआत की गई थी, वह अब काफी हद तक पूरा हो चुका है और वर्तमान समय में इसका दुरुपयोग (Misuse of PIL) अधिक देखने को मिल रहा है। यह महत्वपूर्ण दलील सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 9 जजों की संविधान पीठ के समक्ष रखी।



जनहित याचिका (PIL) क्या है और क्यों शुरू हुई थी?

जनहित याचिका का उद्देश्य

जनहित याचिका (Public Interest Litigation – PIL) भारतीय न्याय प्रणाली का एक महत्वपूर्ण उपकरण है। इसे मुख्य रूप से उन लोगों के लिए शुरू किया गया था जो सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर (Socially and Economically Weaker Sections) हैं।



इसका उद्देश्य यह था कि गरीब, अशिक्षित, विकलांग, सामाजिक रूप से वंचित लोग यदि किसी कारण से खुद अदालत नहीं जा सकते, तो कोई तीसरा व्यक्ति या संस्था उनकी ओर से अदालत में याचिका दायर कर सके।



जनहित याचिका की शुरूआत

भारत में पहली प्रभावी जनहित याचिका (PIL) मानी जाती है Hussainara Khatoon v. State of Bihar। यह मामला बिहार की जेलों में बंद हजारों अंडरट्रायल कैदियों से जुड़ा था, जो बिना सुनवाई के कई सालों से जेल में थे। इस पर Supreme Court of India ने सुनवाई करते हुए कहा कि हर नागरिक को तेज सुनवाई (Speedy Trial) का अधिकार है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार है। कोर्ट के आदेश के बाद हजारों कैदियों को रिहा किया गया। इस फैसले ने भारत में PIL प्रणाली की मजबूत शुरुआत की और गरीब व कमजोर लोगों को न्याय दिलाने का रास्ता खोला।



ऐतिहासिक मामले

वैसे भारत में जनहित याचिका को लोकप्रिय बनाने वाले मामलों में बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ (Bandhua Mukti Morcha vs Union of India) जैसे मामले महत्वपूर्ण रहे हैं। इन मामलों में अदालत ने समाज के कमजोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए सक्रिय भूमिका निभाई।



सुप्रीम कोर्ट में क्या हुई बहस?

सरकार की दलील

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि पिछले पांच दशकों (Five Decades) में परिस्थितियां काफी बदल चुकी हैं।



उन्होंने अदालत के सामने कई महत्वपूर्ण बिंदु रखे:



  • अब न्याय व्यवस्था पहले की तुलना में अधिक सुलभ (Accessible Justice System) हो गई है
  • गरीब और जरूरतमंद लोगों को मुफ्त कानूनी सहायता (Free Legal Aid) मिल रही है
  • डिजिटल तकनीक के कारण अदालत तक पहुंच आसान हो गई है

उनका कहना था कि अब PIL की आवश्यकता पहले जैसी नहीं रह गई है।



न्याय प्रणाली अब अधिक सुलभ: सरकार का तर्क

सरकार ने अदालत को बताया कि आज के समय में कई संस्थाएं जरूरतमंद लोगों की सहायता कर रही हैं।



प्रमुख संस्थाएं

  1. राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA – National Legal Services Authority)
  2. जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DALSA – District Legal Services Authority)

ये संस्थाएं गरीब और जरूरतमंद लोगों को मुफ्त कानूनी सलाह, अदालत में प्रतिनिधित्व, न्यायिक सहायता प्रदान करती हैं।



ई-फाइलिंग से आसान हुई अदालत तक पहुंच

सरकार ने यह भी कहा कि ई-फाइलिंग (E-Filing System) की वजह से अदालत तक पहुंच पहले से काफी आसान हो गई है। अब ऑनलाइन याचिका दायर की जा सकती है। डिजिटल दस्तावेज भेजे जा सकते हैं। यहां तक कि एक पत्र (Letter Petition) भी अदालत तक पहुंच सकता है, इसलिए किसी तीसरे व्यक्ति द्वारा PIL दाखिल करने की आवश्यकता कम हो गई है।



PIL के दुरुपयोग पर सरकार की चिंता

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने यह भी कहा कि आजकल दायर होने वाली अधिकांश जनहित याचिकाएं प्रेरित (Motivated PILs) होती हैं। सरकार का कहना है कि कई PIL के पीछे छिपे हुए एजेंडे (Hidden Agenda) होते हैं। कुछ मामलों में राजनीतिक या व्यक्तिगत हित जुड़े होते हैं। पर्दे के पीछे से कोई और व्यक्ति या संस्था इन्हें नियंत्रित करती है। ऐसी स्थिति में अदालत का समय भी व्यर्थ होता है और न्याय प्रक्रिया प्रभावित होती है।



सबरीमाला केस से जुड़ा बड़ा सवाल

सुप्रीम कोर्ट की यह 9 जजों की संविधान पीठ एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल पर भी विचार कर रही है।



मुख्य प्रश्न

क्या कोई ऐसा व्यक्ति जो किसी विशेष धार्मिक समूह का हिस्सा नहीं है, वह जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से उस धर्म की प्रथाओं को चुनौती दे सकता है?



यह सवाल सबरीमाला मंदिर विवाद (Sabarimala Temple Case) से जुड़े पुनर्विचार के दौरान सामने आया।



संविधान पीठ में कौन-कौन से जज शामिल हैं?

इस मामले की सुनवाई 9 जजों की संविधान पीठ (Constitution Bench) कर रही है।



इसमें शामिल हैं:



  • CJI सूर्यकांत
  • जस्टिस बीवी नागरत्ना
  • जस्टिस एमएम सुंदरेश
  • जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह
  • जस्टिस अरविंद कुमार
  • जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
  • जस्टिस प्रसन्ना बी वराले
  • जस्टिस आर महादेवन
  • जस्टिस जॉयमाल्या बागची

CJI सूर्यकांत की प्रतिक्रिया

सरकार की चिंताओं पर प्रतिक्रिया देते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि अदालतें अब PIL को लेकर पहले से अधिक सतर्क हो गई हैं।



CJI ने कहा कि अब अदालतें PIL स्वीकार करने से पहले गहन जांच (Detailed Scrutiny) करती हैं। केवल उन्हीं मामलों में नोटिस जारी किया जाता है जिनमें ठोस आधार (Strong Grounds) होते हैं। अदालत यह भी देखती है कि याचिका के पीछे कोई छिपा एजेंडा तो नहीं है। उन्होंने कहा कि 2006 से 2026 तक के दो दशकों में स्थिति काफी बदल गई है।



क्या PIL खत्म हो सकती है?

यह सवाल अब कानूनी विशेषज्ञों और न्यायविदों के बीच चर्चा का विषय बन गया है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि PIL ने भारतीय न्याय व्यवस्था को मजबूत किया है। कई ऐतिहासिक फैसले इसी के माध्यम से आए हैं। हालांकि कुछ लोग यह भी मानते हैं कि PIL के दुरुपयोग को रोकने के लिए कड़े नियम जरूरी हैं।



जनहित याचिका से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य

शुरुआत: 1980 के दशक में


उद्देश्य: कमजोर वर्गों को न्याय दिलाना


कौन दायर कर सकता है: कोई भी व्यक्ति या संस्था


मुख्य समस्या: हाल के वर्षों में बढ़ता दुरुपयोग


वर्तमान बहस: PIL को खत्म किया जाए या सुधार किया जाए



FAQs

1. जनहित याचिका (PIL) क्या होती है?

जनहित याचिका (Public Interest Litigation – PIL) वह याचिका होती है जो समाज के व्यापक हित में अदालत में दायर की जाती है। इसका उद्देश्य उन लोगों के अधिकारों की रक्षा करना है जो खुद अदालत नहीं जा सकते।



2. सरकार ने जनहित याचिका खत्म करने की मांग क्यों की?

केंद्र सरकार का कहना है कि अब न्याय व्यवस्था अधिक सुलभ हो गई है और कई संस्थाएं गरीबों को मुफ्त कानूनी सहायता देती हैं। इसलिए PIL की जरूरत कम हो गई है और इसका दुरुपयोग बढ़ गया है।



3. सुप्रीम कोर्ट में PIL पर क्या फैसला हो सकता है?

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ इस मुद्दे पर विचार कर रही है। अदालत यह तय करेगी कि PIL को समाप्त किया जाए, इसमें सुधार किया जाए या मौजूदा व्यवस्था जारी रखी जाए।



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