सबरीमाला से मस्जिद तक: सुप्रीम कोर्ट में 50 से ज्यादा याचिकाओं पर चल रही है सुनवाई... जानें आज क्या हुआ
Jitendra Shrivastava | Apr 07, 2026, 18:14 IST
Photograph: (THESOOTR)
NEW DELHI. सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच सबरीमाला में महिला प्रवेश, मस्जिद एंट्री और धार्मिक भेदभाव पर सुनवाई कर रही है। केंद्र ने 2018 के फैसले को गलत बताया।
News In Short
- 9 जजों की बेंच करेगी सबरीमाला पर ऐतिहासिक फैसला।
- केंद्र ने 2018 के फैसले को बताया गलत।
- जस्टिस नागरत्ना ने अनुच्छेद 17 पर उठाए सवाल।
- 5 धार्मिक मुद्दों पर एक साथ होगी सुनवाई।
- 26 साल से अदालतों में पेंडिंग हैं ये मामले।
News In Detail
जस्टिस नागरत्ना ने मासिक धर्म और अनुच्छेद 17 पर तीखे सवाल उठाए। यह सुनवाई धर्म, लैंगिक समानता (Gender Equality) और संविधान के बीच संतुलन की सबसे बड़ी कानूनी परीक्षा है।
केंद्र सरकार का बदला रुख
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट में कहा कि 2018 का फैसला गलत था। उन्होंने मांग की कि मासिक धर्म की आयु वाली महिलाओं पर प्रवेश की रोक बरकरार रखी जाए।
केंद्र का तर्क है कि धार्मिक आस्था के मामलों में अदालत को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। SG मेहता ने कहा कि भगवान अयप्पा की ब्रह्मचर्य परंपरा का सम्मान होना चाहिए। इसका महिलाओं की शुद्धता या गरिमा से कोई सीधा संबंध नहीं है।
जस्टिस नागरत्ना के तीखे सवाल
जस्टिस नागरत्ना ने यह भी कहा कि अगर कोई सामाजिक बुराई धार्मिक प्रथा का रूप ले ले तो अदालत दोनों के बीच अंतर कर सकती है। SG मेहता ने स्पष्ट किया कि यह मासिक धर्म का नहीं, बल्कि एक विशेष आयु वर्ग से जुड़ा मामला है।
आवश्यक धार्मिक प्रथा पर बहस
अदालत को यह तय करने का अधिकार नहीं है कि कोई प्रथा अनिवार्य है या नहीं। जस्टिस बागची ने कहा कि आस्था और मानी गई आस्था में अंतर होता है।
जस्टिस सुंदरेश ने टिप्पणी की कि विज्ञान तर्क पर आधारित है जबकि धर्म आस्था पर। यह बहस संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 की व्याख्या के लिए बेहद अहम है।
संविधान के किन अनुच्छेदों पर बहस?
अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है। अनुच्छेद 26 किसी धार्मिक समूह को अपने धर्म के मामले स्वयं तय करने का अधिकार देता है। इन सभी अनुच्छेदों के बीच संतुलन स्थापित करना ही 9 जजों की बेंच का मुख्य काम है।
सबरीमाला विवाद क्या है?
मंदिर की पौराणिक मान्यता है कि भगवान अयप्पा नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं। इसी आधार पर मासिक धर्म की आयु वाली महिलाओं को प्रवेश नहीं दिया जाता था। यह विवाद 1990 से चला आ रहा है। धीरे-धीरे यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंचा।
2018 में क्या हुआ था?
इस फैसले के बाद देशभर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। 2 जनवरी 2019 को बिंदु कनकदुर्गा (45) और बिंदु अम्मिनी (46) ने पुलिस सुरक्षा में मंदिर में प्रवेश किया। वे मंदिर में प्रवेश करने वाली पहली महिलाएं बनीं। इस घटना ने पूरे देश में बहस छेड़ दी।
9 जजों की बेंच के सामने 5 बड़े मुद्दे...
दूसरा मुद्दा दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला खतना (Female Genital Mutilation) का है, जिसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना जा रहा है। तीसरा मुद्दा मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश है, जहाँ यह तय होगा कि मुस्लिम महिलाओं को नमाज से रोका जा सकता है या नहीं।
चौथा मुद्दा पारसी महिलाओं के अग्निमंदिर में प्रवेश का है। गैर-पारसी से विवाह करने वाली पारसी महिलाओं को धार्मिक स्थलों से बाहर रखा जाता है। पांचवां मुद्दा मुस्लिम पर्सनल लॉ (Muslim Personal Law) में लैंगिक भेदभाव से जुड़ा है।
SABRIMALA
26 साल से लंबित मामला
याचिकाकर्ता 7 से 9 अप्रैल तक और विरोधी पक्ष 14 से 16 अप्रैल तक अपनी दलीलें रखेंगे। यह सुनवाई भारत में धर्म और संविधान के संबंध की सबसे बड़ी परीक्षा मानी जा रही है।
sabarimala (2)
फैसला बरकरार रहा तो क्या?
वहीं अगर 2018 का फैसला पलटा गया तो धार्मिक परंपरा कानून से ऊपर मानी जाएंगी। इससे भविष्य में धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के अधिकारों से जुड़े मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप सीमित हो जाएगा। यह फैसला भारत में लैंगिक समानता (Gender Equality) की दिशा तय करेगा।
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