रेलवे की 1068 हेक्टेयर जमीन पर कब्जा, इतनी की 42 मोदी स्टेडियम बना जाएं
समझें क्या है पूरा मामला...
- रेलवे की जमीन पर कब्जा, 5 साल में 32% बढ़ा।
- 42 मोदी स्टेडियम जितनी जमीन पर अवैध कब्जा।
- रेलवे की जमीन हटाने में सरकार नाकाम क्यों?
- सिर्फ 98 हेक्टेयर जमीन ही हो सकी खाली।
- रेलवे के पास 25 साल का डेटा तक नहीं।
रेलवे बोर्ड को एक RTI (Right to Information) का जवाब मिला है। इसमें बड़ा खुलासा हुआ है। मार्च 2025 तक रेलवे की 1,068.54 हेक्टेयर जमीन पर अवैध कब्जा था। पांच साल में यह कब्जा 32 प्रतिशत बढ़ गया है। जमीन खाली कराने में रेलवे को बहुत कम सफलता मिली है।
रेलवे की जमीन पर कब्जे का बड़ा खेल
देश में जमीन की कीमत लगातार बढ़ रही है। शहर हो या गांव, हर जगह जमीन महंगी हो गई है। लेकिन रेलवे अपनी जमीन बचाने में नाकाम दिख रहा है। हजारों बीघा जमीन पर अतिक्रमण हो चुका है। पिछले पांच साल के आंकड़े देखें तो हालात और चिंताजनक लगते हैं।
5,345 बीघा जमीन कब्जा
रेलवे बोर्ड ने RTI के जवाब में बताया है कि मार्च 2025 तक करीब 5,345 बीघा जमीन पर कब्जा था। यह आवेदन इंडिया टुडे ने दायर किया था। उन्होंने 25 साल का डेटा मांगा था।
लेकिन रेलवे बोर्ड ने सिर्फ पांच साल का डेटा दिया। साल 2020-21 में यह कब्जा 810.31 हेक्टेयर था। 2024-25 में यह बढ़कर 1,068.54 हेक्टेयर हो गया। यानी करीब 32 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।
42 स्टेडियम जितनी जमीन
इतनी बड़ी संख्या को समझना आसान नहीं है। इसलिए एक उदाहरण लेते हैं। अहमदाबाद का नरेंद्र मोदी स्टेडियम करीब 25.5 हेक्टेयर में फैला है। यह दुनिया का सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम है।
रेलवे की जितनी जमीन पर कब्जा है, उसमें करीब 42 ऐसे स्टेडियम बन सकते हैं। फुटबॉल के हिसाब से देखें तो यह जमीन करीब 1,496 फीफा मैदानों जितनी है। यह तुलना सिर्फ खेल के मैदान की है। दर्शक दीर्घा और पार्किंग की जगह इसमें शामिल नहीं है।
हाल के सालों में तेजी से बढ़ा कब्जा
रेलवे बोर्ड में जमीन देखने के लिए एक अलग विभाग है। इसका नाम भूमि एवं सुविधा निदेशालय है। फिर भी अतिक्रमण नहीं रुक रहा। साल 2021-22 में कब्जा थोड़ा घटकर 782.81 हेक्टेयर हुआ था। लेकिन इसके बाद तेजी से बढ़ोतरी हुई।
2023-24 में यह 1,078.55 हेक्टेयर तक पहुंच गया। सिर्फ एक साल में करीब 268 हेक्टेयर की बढ़ोतरी हुई। यह पांच साल की सबसे बड़ी छलांग थी। 2024-25 में थोड़ी गिरावट जरूर आई। लेकिन कुल रुझान अब भी ऊपर की तरफ है।
कब्जा हटाने में मिली सीमित सफलता
रेलवे ने कब्जा हटाने की कोशिश तो की है। लेकिन नतीजे बहुत कमजोर रहे हैं। पांच साल में सिर्फ 98.02 हेक्टेयर जमीन ही खाली कराई जा सकी। जबकि अभी भी 1,068 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन कब्जे में है। यानी हर साल औसतन बहुत कम जमीन ही वापस मिल रही है।
खाली हुई जमीन का क्या होता है
सरकार ने संसद में इसकी जानकारी दी है। पांच साल में 98.02 हेक्टेयर जमीन वापस ली गई है। इस जमीन पर रेलवे प्रोजेक्ट लगाए जाते हैं। इनमें मल्टी ट्रैकिंग वर्क, वर्कशॉप और टर्मिनल शामिल हैं।
जो जमीन तुरंत काम की नहीं होती, उसे रेल भूमि विकास प्राधिकरण यानी RLDA को दे दिया जाता है। इसके बाद वहां कॉमर्शियल डेवलपमेंट होता है। इससे रेलवे को अच्छी कमाई भी होती है।
रेलवे के पास पूरा डेटा भी नहीं
इस RTI का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा कुछ और है। रेलवे बोर्ड ने 25 साल का डेटा देने से मना कर दिया। बोर्ड का कहना है कि उसके पास सिर्फ पांच साल का डेटा है। यानी दशकों में अतिक्रमण कैसे बढ़ा, इसका कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं है।
किन राज्यों में सबसे ज्यादा कब्जा है, यह जानकारी भी नहीं दी गई। बोर्ड ने कहा कि स्थानवार रिकॉर्ड उसके पास नहीं रहता। इसके लिए अलग-अलग जोनल रेलवे से संपर्क करने को कहा गया है।
किस राज्य में सबसे ज्यादा अतिक्रमण
भारतीय रेलवे के अनुसार, सबसे ज्यादा रेलवे की जमीन पर अतिक्रमण उत्तर रेलवे (Northern Railway) जोन में है, जिसमें उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और उत्तराखंड जैसे राज्य आते हैं। राज्यवार आंकड़ों की बात करें तो उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और राजस्थान में अक्सर रेलवे की जमीन पर सबसे ज्यादा अवैध कब्जों (Encroachments) की पुष्टि होती है।
आगे क्या होगा
यह मामला सिर्फ आंकड़ों का नहीं है। यह सरकारी जमीन की सुरक्षा से जुड़ा सवाल भी है। जब तक ठोस डेटा और सख्त निगरानी नहीं होगी, अतिक्रमण रुकना मुश्किल लगता है।
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