RBI का नया नियम, डिफॉल्टर और रिश्तेदार अब नहीं खरीद पाएंगे जब्त प्रॉपर्टी
RBI New Loan Rules: अगर आपने बैंक से लोन लिया है तो यह खबर आपके लिए बहुत जरूरी है। रिजर्व बैंक ने कर्ज वसूली से जुड़ा नया नियम जारी किया है। अब बैंक जब्त प्रॉपर्टी डिफॉल्टर को वापस नहीं बेच सकेंगे। करीबी रिश्तेदार भी नीलामी में हिस्सा नहीं ले पाएंगे। यह नियम एक अक्टूबर 2026 से पूरे देश में लागू होगा।
संपत्ति की कीमत दो इंडिपेंडेंट वलुएर मिलकर तय करेंगे। अगर आपने बैंक से लोन लिया और नहीं चुकाया, तो बैंक आपकी गिरवी प्रॉपर्टी जब्त कर सकता है। अब तक कई मामलों में यही प्रॉपर्टी नीलामी के जरिए उसी कर्जदार को वापस बिक जाती थी। आइए इस पूरे नए नियम को डिटेल से समझते हैं।
क्या है RBI का नया नियम
रिजर्व बैंक ने 16 जुलाई को इससे जुड़े अंतिम दिशा-निर्देश जारी किए। ये नियम स्ट्रेस्ड एसेट्स रिजॉल्यूशन डायरेक्शंस, 2025 में तीसरा संशोधन है। इसके तहत ऐसी जब्त संपत्तियों को अब स्पेसिफाइड नॉन-फाइनेंशियल एसेट यानी SNFA कहा जाएगा। बैंक, NBFC, स्मॉल फाइनेंस बैंक और सहकारी बैंक सभी पर यह नियम लागू होगा।
किसे मिलेगा नीलामी से बाहर
नए नियम के मुताबिक कोई भी जब्त संपत्ति उसी डिफॉल्टर कर्जदार को वापस नहीं बेची जा सकेगी। कर्जदार के करीबी रिश्तेदार भी इस नीलामी से बाहर रहेंगे। रिश्तेदारों की परिभाषा इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड, 2016 के मुताबिक तय होगी। यह पाबंदी तब भी लागू रहेगी, जब संपत्ति बाद में SNFA की श्रेणी से बाहर हो जाए। RBI का मानना है कि पुरानी व्यवस्था से कर्ज अनुशासन कमजोर होता था।
कैसे तय होगी प्रॉपर्टी की कीमत
जब्त संपत्ति की कीमत तय करने का तरीका भी अब बदल गया है। संपत्ति दर्ज होगी बकाया कर्ज की नेट बुक वैल्यू और डिस्ट्रेस्ड सेल वैल्यू में से जो भी कम हो।
यह डिस्ट्रेस्ड वैल्यू कम से कम दो स्वतंत्र वैल्यूअर मिलकर तय करेंगे। हर दो साल में इस संपत्ति की दोबारा वैल्यूएशन करना जरूरी होगा। अगर संपत्ति की कीमत घटती है, तो यह नुकसान तुरंत बैंक के मुनाफे में दर्ज करना होगा।
नीलामी की प्रक्रिया और समय सीमा
बैंकों को यह संपत्ति सार्वजनिक नीलामी के जरिए बेचनी होगी। इसके लिए SARFAESI कानून (Securitisation and Reconstruction of Financial Assets and Enforcement of Security Interest) के सिद्धांतों का पालन करना होगा। संपत्ति बेचने की अधिकतम समय सीमा सात साल तय की गई है। बैंकों को इसके लिए बोर्ड से मंजूर नीति भी बनानी होगी। इस नीति में संपत्ति की सीमा, पात्रता और वसूली के प्रयास जैसे नियम शामिल होंगे।
कब से लागू होगा नियम
यह नियम एक अक्टूबर 2026 से पूरे देश में लागू होगा। जो जब्त संपत्तियां 30 सितंबर 2026 तक बैंकों के पास हैं, उन्हें एक साल का समय मिलेगा। ऐसी पुरानी संपत्तियों को 30 सितंबर 2027 तक नए नियम के दायरे में लाना होगा। इससे बैंकों को अपनी प्रक्रिया बदलने के लिए पर्याप्त समय मिल जाएगा।
बैंकों के लिए क्या बदलेगा
इन संपत्तियों को अब बैंक की ग्रॉस या नेट एनपीए में नहीं गिना जाएगा। इन्हें बैलेंस शीट में अलग से दिखाना होगा। बैंकों को RBI के CIMS पोर्टल पर भी इसकी जानकारी देनी होगी। इससे संपत्तियों की पारदर्शिता बढ़ेगी और निवेशकों को साफ तस्वीर मिलेगी।
क्यों जरूरी है यह बदलाव
भारतीय रिजर्व बैंक ने मई में इस पर मसौदा जारी कर सुझाव मांगे थे। कुछ पक्षों ने सुझाव दिया था कि डिफॉल्टर को संपत्ति वापस खरीदने का मौका मिलना चाहिए। RBI ने इस सुझाव को खारिज कर दिया। बैंक का कहना है कि इससे कर्ज न चुकाने की आदत को बढ़ावा मिलता।
साफ नियम (Home Loan) से आम खरीदारों को भी नीलामी में बराबर मौका मिलेगा। रिजर्व बैंक ने अपने आधिकारिक निर्देश में साफ कहा है कि जब्त प्रॉपर्टी बोरोअर या उसके संबंधित पक्षों को वापस नहीं बेची जाएगी। यह बयान सीधे RBI की तीसरी संशोधित दिशा-निर्देश डॉक्यूमेंट से लिया गया है।
FAQ
- आरबीआई के नए नियम के अनुसार क्या लोन डिफॉल्टर अपनी जब्त प्रॉपर्टी दोबारा खरीद सकता है?
नहीं, रिजर्व बैंक के नए नियम के मुताबिक अब कोई भी लोन डिफॉल्टर या बकाएदार बैंक द्वारा जब्त की गई अपनी प्रॉपर्टी को दोबारा नहीं खरीद पाएगा। यहां तक कि उसके करीबी रिश्तेदारों को भी इस नीलामी प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर रखा जाएगा। - बैंक को डिफॉल्टर से जब्त की गई प्रॉपर्टी को कितने समय के भीतर बेचना होगा?
नए नियमों के अनुसार बैंकों को बकाएदारों से जब्त की गई अचल संपत्ति या प्रॉपर्टी को अपने कब्जे में लेने के बाद अधिकतम 7 साल के भीतर बेचना होगा। यह बिक्री पूरी तरह से सार्वजनिक नीलामी के माध्यम से की जाएगी। - नीलामी के दौरान जब्त प्रॉपर्टी की कीमत तय करने का नया फॉर्मूला क्या है?
प्रॉपर्टी की कीमत तय करने के दो तरीके हैं। पहला बकाया कर्ज की बुक वैल्यू और दूसरा दो स्वतंत्र वैल्यूअर द्वारा तय की गई डिस्ट्रेस सेल वैल्यू। बैलेंस शीट में इन दोनों में से जो भी राशि कम होगी उसे ही दर्ज किया जाएगा।
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