सानेन बकरी 7 लीटर दूध देती है, एक पाल लो वारे न्यारे कर देगी

Jitendra Shrivastava | Apr 28, 2026, 19:10 IST
Photograph: (THESOOTR)
NEW DELHI. स्विट्जरलैंड की सानेन बकरी फिर भारत आई, जिसे गांधी जी ने 'गरीब की गाय' कहा था। SKUAST-K ने 24 बकरियां मंगाईं, यह 7 लीटर दूध देती है।

News In Short

  • सानेन बकरी रोज 7 लीटर तक दूध देती है।
  • गांधी जी ने इसे 'गरीबों की गाय' कहा था।
  • SKUAST-K ने स्विट्जरलैंड से 24 बकरियां मंगाईं।
  • सानेन का दूध A2 कैटेगरी में आता है।
  • किसानों-युवाओं को रोजगार देना है मकसद।

News In Detail

महात्मा गांधी की 'गरीब आदमी की गाय' कही जाने वाली स्विट्जरलैंड की मशहूर सानेन बकरी एक बार फिर भारत की धरती पर कदम रख चुकी है।



शेर-ए-कश्मीर कृषि विश्वविद्यालय (SKUAST-K) ने किसानों की आय बढ़ाने के लिए यह अहम पहल की है। यह बकरी रोजाना 7 लीटर तक दूध देती है और इसका दूध देसी गाय जितना पौष्टिक माना जाता है।



गांधी जी की 'गरीबों की गाय' लौटी

स्विट्जरलैंड की धरती पर पली-बढ़ी सानेन बकरी (Saanen Goat) का भारत से पुराना नाता है। कहा जाता है कि सबसे पहले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी इस नस्ल को स्विट्जरलैंड से हिंदुस्तान लेकर आए थे।



गाय की तरह प्रतिदिन 7 लीटर दूध देने की क्षमता के कारण गांधी जी ने इसे 'गरीब आदमी की गाय' की संज्ञा दी थी। कम लागत में अधिक दूध उत्पादन (Milk Production) इस बकरी की सबसे बड़ी खूबी है। यही कारण है कि यह बकरी गरीब किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं मानी जाती।



SKUAST-K की ऐतिहासिक पहल

शेर-ए-कश्मीर कृषि विश्वविद्यालय (SKUAST-K) के वैज्ञानिकों ने कश्मीर में दूध उत्पादन बढ़ाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। मुख्य प्रोजेक्ट वैज्ञानिक डॉ. परवेज अहमद रेशी के अनुसार पहले चरण में 7 से 8 महीने की उम्र की 20 मादा और 4 नर सानेन बकरियां सीधे स्विट्जरलैंड से मंगाई गई हैं।



यह पहली बार है जब किसी सरकारी संस्थागत ढांचे में इस विदेशी नस्ल (Foreign Breed) को शामिल किया गया है। यह पहल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने में मील का पत्थर साबित हो सकती है।



जलवायु अध्ययन के बाद मिलेंगी बकरियां

विश्वविद्यालय प्रशासन की योजना है कि इन बकरियों को किसानों और बेरोजगार युवाओं के बीच वितरित किया जाए। लेकिन यह काम चरणबद्ध तरीके से होगा।



पहले जम्मू-कश्मीर की जलवायु (Climate Study) के अनुकूल इन बकरियों की अनुकूलन क्षमता का गहन अध्ययन किया जाएगा। इसके बाद ही इन्हें किसानों के हवाले किया जाएगा। यह सावधानी बरतना इसलिए जरूरी है क्योंकि स्विस जलवायु और कश्मीर की जलवायु में काफी अंतर है।



गाय से सस्ती, दूध उतना ही

सानेन बकरी पालना गाय पालने के मुकाबले कहीं ज्यादा सुलभ और किफायती है। गाय के लिए बड़े स्थान और अधिक चारे की जरूरत होती है, जबकि बकरी को बेहद सीमित जगह और कम खुराक में पाला जा सकता है।



कम निवेश में बेहतर मुनाफा (Better Profit) इसे छोटे किसानों के लिए आदर्श विकल्प बनाता है। खास बात यह है कि सानेन बकरी का दूध A2 श्रेणी में आता है, जो देसी गाय के दूध जितना ही पोषण से भरपूर और बाजार में महंगा बिकता है।



बिना गंध का पौष्टिक A2 दूध

आमतौर पर बकरी के दूध में एक विशेष प्रकार की गंध होती है, जो कई लोगों को पसंद नहीं आती। लेकिन सानेन बकरी का दूध इस खामी से पूरी तरह मुक्त है। इसके दूध में किसी तरह की अजीब गंध नहीं होती।



A2 दूध (A2 Milk) होने के कारण यह स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है। बाजार में इसकी कीमत भी देसी गाय के दूध के बराबर मिलती है, जिससे किसानों को अच्छी आमदनी हो सकती है।



रोजगार और आत्मनिर्भरता की राह

सानेन बकरी पालन (Goat Farming) न केवल किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारेगा, बल्कि बेरोजगार युवाओं के लिए भी स्वरोजगार का नया रास्ता खोलेगा।



SKUAST-K की यह पहल ग्रामीण जम्मू-कश्मीर में दूध की कमी को दूर करने और पशुपालन क्षेत्र को मजबूत बनाने की दिशा में एक सार्थक प्रयास है। आने वाले समय में यह योजना पूरे देश के लिए एक मॉडल बन सकती है।



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