अमेरिका-कनाडा में पढ़ाई का क्रेज खत्म, 70% छात्रों ने फेरा मुंह, अब युवाओं की पहली पसंद बना यूरोप

Anjali Dwivedi | Mar 23, 2026, 15:19 IST
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अब छात्र पढ़ाई के लिए अमेरिका-कनाडा के बजाय जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों को चुन रहे हैं। युद्ध के हालात और सख्त वीजा नियमों के चलते विदेशी शिक्षा के पैटर्न में 70% का बड़ा बदलाव आया है।

News In Short

  • अमेरिका की लोकप्रियता में 70% की भारी गिरावट आई है, छात्र अब यूरोप की ओर रुख कर रहे हैं।
  • रूस-यूक्रेन और मिडिल ईस्ट युद्ध के कारण छात्र अब सुरक्षित देशों को चुनना पसंद कर रहे हैं।
  • एमपी से विदेश जाने वाले कुल छात्रों में अकेले भोपाल की हिस्सेदारी करीब दो हजार विद्यार्थियों की है।
  • अब छात्र देश देखकर नहीं बल्कि कोर्स (जैसे जर्मनी के लिए इंजीनियरिंग) देखकर आवेदन कर रहे हैं।
  • अमेरिका-कनाडा की तुलना में यूरोप में पढ़ाई और रहने का खर्च छात्रों के लिए अधिक किफायती साबित हो रहा है।

News In Detail

अब विदेश जाकर पढ़ाई करने का अंदाज पूरी तरह बदल गया है। कभी हायर एजुकेशन के लिए युवाओं की पहली पसंद रहने वाले अमेरिका और कनाडा अब इस रेस में पिछड़ रहे हैं। पिछले दो सालों में यहां के स्टूडेंट्स ने अपनी पसंद में बड़ा बदलाव किया है।



अब छात्र पुराने ढर्रे को छोड़ जर्मनी, फ्रांस, आयरलैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों को ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं। इस बदलाव की बड़ी वजह आसमान छूती फीस, वीजा के कड़े नियम और दुनिया भर में चल रहे युद्ध के हालात हैं।



जानकारों की मानें तो मध्य प्रदेश से हर साल करीब 8 से 10 हजार छात्र बाहर पढ़ने जाते हैं, जिनमें अकेले भोपाल से करीब दो हजार छात्र शामिल हैं। पहले इनमें से 40% बच्चे सिर्फ अमेरिका और कनाडा का ही रुख करते थे।



क्यों फीका पड़ा अमेरिकी सपना?

विदेशी शिक्षा मामलों के एक्सपर्ट्स का मानना है कि वीजा नियमों में बदलाव और अमेरिका की सख्त ट्रंप पॉलिसी के डर ने वहां का क्रेज खत्म कर दिया है। इसी वजह से अब अमेरिका जाने वाले छात्रों की तादाद में 70 फीसदी तक की बड़ी गिरावट आई है।अब छात्र देश नहीं, बल्कि अपने विषय के आधार पर ठिकाना चुन रहे हैं।



  • ऑस्ट्रेलिया: आईटी, नर्सिंग और अकाउंटिंग के लिए हॉटस्पॉट बना है।
  • यूके: बिजनेस मैनेजमेंट, लॉ और मीडिया स्टडीज के लिए पसंद किया जा रहा है।
  • जर्मनी: मैकेनिकल इंजीनियरिंग और रोबोटिक्स के छात्रों की पहली पसंद है।
  • न्यूजीलैंड: एग्रीकल्चर और हॉस्पिटेलिटी के क्षेत्र में उभर रहा है।

सुरक्षा और बजट बना सबसे बड़ा पैमाना

एक्सपर्ट का कहना है, वर्तमान में छात्र और उनके पैरेंट्स सबसे पहले सुरक्षा देख रहे हैं। मिडिल ईस्ट का संघर्ष और रूस-यूक्रेन युद्ध ने सुरक्षित देशों की मांग बढ़ा दी है। इसके अलावा आर्थिक गणित भी एक बड़ा फैक्टर है।



यूरोप के कई देशों (भारतीय छात्रों के लिए विदेश में पढ़ाई) में सालाना ट्यूशन फीस 1.80 लाख से 13.50 लाख के बीच है, जबकि रहने का खर्च 63 हजार से 1.10 लाख प्रतिमाह तक बैठता है। यह अमेरिका के मुकाबले काफी किफायती है।



न्यूजीलैंड और नीदरलैंड जैसे नए विकल्पों का उदय

न्यूजीलैंड सरकार द्वारा वीजा नियमों में ढील दिए जाने के बाद भोपाल से आवेदनों की संख्या तेजी से बढ़ी है। इसके अलावा फ्रांस, नीदरलैंड, पोलैंड, स्वीडन और डेनमार्क की छात्र-मैत्रीपूर्ण नीतियां युवाओं को आकर्षित कर रही हैं।



आंकड़ों की बात करें तो मध्य प्रदेश से हर साल लगभग 8 से 10 हजार छात्र विदेश जाते हैं, जिनमें अकेले भोपाल की हिस्सेदारी करीब 2 हजार छात्रों की है। साल 2025 तक लगभग 7.6 लाख भारतीय छात्र विदेशों में पढ़ रहे थे, जिनमें स्टेम (STEM) और मैनेजमेंट कोर्सेज की सबसे अधिक मांग रही।



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