सुप्रीम कोर्ट ने कहा- शराब पर प्रतिबंध लगाना नुकसानदायक, गिनाए कारण

Amresh Kushwaha | Sept 20, 2026, 10:25 IST
शराबबंदी पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि शराबबंदी से नशे की लत और जहरीली शराब से मौतें नहीं रुकतीं। कोर्ट ने महाराष्ट्र के मेथनॉल नियम रद्द किए। साथ ही, गुजरात और मध्यप्रदेश की जहरीली शराब घटनाओं का हवाला देते हुए सरकारों को कई निर्देश भी दिए हैं।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • सुप्रीम कोर्ट ने शराबबंदी को लेकर बड़ी टिप्पणी की है।
  • कोर्ट ने कहा कि बैन से जहरीली शराब से मौतें नहीं रुकतीं।
  • जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच ने महाराष्ट्र के मेथनॉल नियम रद्द किए।
  • गुजरात और मध्यप्रदेश की हालिया घटनाओं का जिक्र किया गया।
  • कोर्ट ने सरकारों को अवैध शराब रोकने के निर्देश भी दिए हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने शराबबंदी को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि शराब पर पूरी तरह रोक लगाना समस्या का हल नहीं है। कोर्ट के मुताबिक शराबबंदी से नशे की लत खत्म नहीं होती। जहरीली शराब से होने वाली मौतें भी इससे नहीं रुकतीं।



गुजरात के उदाहरण से समझाई बात

जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच ने अपनी बात गुजरात के उदाहरण से समझाई। कोर्ट ने कहा कि गुजरात में दशकों से शराबबंदी लागू है। इसके बावजूद जहरीली शराब से मौतें नहीं रुकीं। कोर्ट ने बताया कि मेथनॉल मिली शराब से जुड़े 10 बड़े हादसों में 600 से ज्यादा लोगों की जान गई है। यह आंकड़ा साफ दिखाता है कि सिर्फ बैन लगाने से हालात नहीं सुधरते।



किस मामले में आया यह फैसला

यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने 18 सितंबर को एक अहम फैसले के दौरान की। कोर्ट ने महाराष्ट्र पॉइजन्स रूल्स 1972 के नियम 18A और 18B को रद्द कर दिया। इन नियमों के तहत मेथनॉल खरीदने और रखने पर सख्त नियंत्रण था।



नियमों में यह भी जरूरी था कि गैर-दवा निर्माता मेथनॉल बेचने से पहले उसमें रंग और कड़वा पदार्थ मिलाएं। कोर्ट ने इन नियमों को असंवैधानिक और मनमाना बताया। कोर्ट के मुताबिक इन नियमों से उद्योगों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ा। लेकिन ये नियम असली समस्या का समाधान नहीं कर पाए।



1991 की घटना से जुड़ा है इतिहास

ये नियम अचानक नहीं बने थे। इनकी जड़ 1991 की एक बड़ी घटना से जुड़ी है। उस साल मुंबई के छाया बार से नकली शराब खरीदी गई थी। इसे पीने के बाद कई लोगों की जान चली गई थी। कुल 250 लोगों ने वह शराब पी थी।



इनमें से 93 लोगों की मौत हो गई थी। बाद में पता चला कि लोगों ने मेथनॉल पी लिया था। मेथनॉल एक ऐसा रसायन है, जो जहर जितना ही खतरनाक होता है। इसी घटना के बाद सख्त नियम बनाए गए थे, लेकिन दशकों बाद भी असली समस्या खत्म नहीं हो पाई।



भावनगर और सागर की घटनाओं का जिक्र

कोर्ट ने अपने फैसले में हाल की दो बड़ी घटनाओं का भी जिक्र किया। इनमें गुजरात के भावनगर और मध्यप्रदेश के सागर की घटनाएं शामिल हैं। भावनगर में जहरीली शराब से करीब 13 लोगों की मौत हुई थी। वहीं सागर में यह आंकड़ा करीब 15 लोगों तक पहुंचा।



कोर्ट ने अपने फैसले में लिखा कि ये घटनाएं अधिकारियों को फिर से सचेत करने की याद दिलाती हैं। कोर्ट का मानना है कि ऐसी घटनाएं बार-बार होने के बावजूद सिस्टम में जरूरी सुधार नहीं हो पा रहे।



बैन से अंडरग्राउंड हो जाता है कारोबार

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने एक बड़ी बात कही। कोर्ट ने कहा कि शराब पर पूरी तरह रोक लगाने से कारोबार अंडरग्राउंड हो जाता है। यानी शराब बनना और बिकना बंद नहीं होता, बल्कि यह छिपकर होने लगता है। इससे तस्करी और अवैध कारोबार को बढ़ावा मिलता है।



कोर्ट के मुताबिक इसी वजह से जहरीली शराब का चलन भी बढ़ जाता है। साथ में पुलिस और आबकारी विभाग में भ्रष्टाचार बढ़ने की आशंका भी बनी रहती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इससे सरकार को शराब पर मिलने वाला राजस्व भी बंद हो जाता है, जबकि प्रशासनिक खर्च बढ़ जाता है।



सरकारों को दिए गए अहम निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ टिप्पणी तक बात सीमित नहीं रखी। बेंच ने सरकारों को कुछ जरूरी निर्देश भी दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि शराब की सप्लाई और मांग की कड़ी को तोड़ना जरूरी है। अवैध रूप से शराब ले जाने पर रोक के लिए अंतरराज्यीय सीमाओं पर निगरानी बढ़ाने को कहा गया है।



कोर्ट ने यह भी बताया कि नगर निगम के कई स्कूल परिसर खुले मैदान की तरह होते हैं। इनका इस्तेमाल अक्सर अवैध शराब छिपाने के लिए किया जाता है। इसलिए ऐसी जगहों पर भी निगरानी बढ़ाने की सलाह दी गई है।



मेथनॉल की निगरानी पर जोर

कोर्ट ने केमिकल सॉल्वेंट बनाने वाली औद्योगिक इकाइयों पर भी ध्यान देने को कहा है। कोर्ट के मुताबिक कई बार ऐसी इकाइयां सॉल्वेंट अवैध शराब बनाने वालों को बेच देती हैं। इसी वजह से जहरीली शराब का खतरा बढ़ जाता है।



कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि मेथनॉल की ढुलाई अलग टैंकरों या कंटेनरों में होनी चाहिए। इससे मेथनॉल की चोरी रुकेगी। साथ ही उसकी जगह कोई दूसरा खतरनाक पदार्थ भरे जाने की आशंका भी कम होगी। कोर्ट का मानना है कि इन कदमों से जहरीली शराब से होने वाली मौतें कुछ हद तक रोकी जा सकती हैं।



आगे क्या होगा

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला शराबबंदी की नीति पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि सिर्फ बैन लगाने से समस्या हल नहीं होगी। अब राज्यों को सप्लाई चेन पर नियंत्रण, निगरानी और सख्त निगरानी व्यवस्था पर काम करना होगा।



मेथनॉल जैसे खतरनाक रसायनों की ट्रैकिंग को भी मजबूत करना जरूरी होगा। आने वाले समय में राज्य सरकारें इस फैसले के आधार पर अपनी नीतियों में बदलाव कर सकती हैं। देखना होगा कि जहरीली शराब से जुड़ी घटनाओं को रोकने के लिए अब कौन से ठोस कदम उठाए जाते हैं।



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