मेंस्ट्रुअल लीव पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कानून बना तो महिलाओं को नौकरी मिलना हो सकता है मुश्किल

Anjali Dwivedi | Mar 13, 2026, 18:56 IST
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सुप्रीम कोर्ट ने मेंस्ट्रुअल लीव की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि यह कानून महिलाओं के रोजगार को प्रभावित कर सकता है। केंद्र सरकार को इस पर नई नीति बनाने का निर्देश दिया गया है।

देशभर में महिलाओं के लिए मासिक धर्म अवकाश (Menstrual Leave) को अनिवार्य करने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद खास रुख अपनाया है। शुक्रवार 13 मार्च को इस संबंध में दायर याचिका का समाधान करते हुए अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह इस संवेदनशील मुद्दे पर एक व्यापक नीति बनाने पर विचार करे। हालांकि, अदालत ने इसे अनिवार्य कानून बनाने के प्रति आगाह भी किया है।



मेंस्ट्रुअल लीव पर क्या बोले CJI

सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान एक गंभीर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि यदि मेंस्ट्रुअल लीव को कानून बनाकर अनिवार्य कर दिया गया, तो इसका महिलाओं के रोजगार पर उल्टा असर पड़ सकता है।



कोर्ट का मानना है कि ऐसे में निजी क्षेत्र के नियोक्ता (Employers) महिलाओं को नौकरी देने या उन्हें जिम्मेदार पद सौंपने से हिचक सकते हैं। इससे वर्कफोर्स में महिलाओं की भागीदारी और उनके करियर के विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।



तीसरी बार अदालत पहुंचा मामला

यह इस मुद्दे पर याचिकाकर्ता शैलेंद्र मणी त्रिपाठी द्वारा दायर की गई तीसरी याचिका थी। इससे पहले फरवरी 2023 और जुलाई 2024 में भी अदालत ने इस पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को नीतिगत निर्णय लेने का सुझाव दिया था।



सुनवाई के दौरान बेंच ने याचिकाकर्ता की लोकस स्टैंडी (Locus Standi - याचिका दायर करने का अधिकार) पर भी सवाल उठाया और टिप्पणी की कि इस विषय पर सीधे तौर पर कोई महिला अदालत के सामने नहीं आई है।



याचिका में स्वास्थ्य समस्याओं का हवाला

याचिका में मांग की गई थी कि महिलाओं को पीरियड्स के दौरान होने वाली गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं, जैसे डिसमेनोरिया और एंडोमेट्रियोसिस को ध्यान में रखते हुए राहत दी जाए।



याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का हवाला देते हुए केंद्र और राज्यों को उचित नीति बनाने के निर्देश देने की अपील की थी।



दलील दी गई कि पीरियड्स के दौरान होने वाला दर्द किसी अन्य बीमारी की तरह ही असहनीय होता है और कामकाजी महिलाओं व छात्राओं को इसके लिए स्पेशल छुट्टी मिलना चाहिए।



कई राज्यों ने पहले ही पेश की है मिसाल

सुनवाई के दौरान यह बात भी सामने आई कि कई राज्यों ने अपने स्तर पर इसे लागू किया है। सीनियर एडवोकेट एम.आर. शमशाद ने बताया कि कर्नाटक सरकार ने हाल ही में इसे लेकर नीति बनाई है। आंकड़ों के मुताबिक-



बिहार: 1992 से महिला कर्मचारियों को हर महीने 2 दिन का विशेष अवकाश मिलता है।



केरल: 2023 से विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में छात्राओं के लिए छुट्टी की व्यवस्था है।



ओडिशा: 2024 में महिलाओं को 1 दिन की छुट्टी का विकल्प दिया गया।



कर्नाटक: 2025 में हर महीने 1 दिन की पेड लीव का प्रावधान किया गया।



सरकार अब सभी हितधारकों से करेगी सलाह

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को यह कहते हुए हल किया कि यह पूरी तरह से एक नीतिगत मामला है। अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता के प्रतिनिधित्व (Representation) पर विचार करे और सभी हितधारकों से परामर्श करके एक संतुलित नीति (मेंस्ट्रूअल लीव पॉलिसी लागू) बनाने की संभावना तलाशे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्वेच्छा से ऐसी सुविधा देना सराहनीय है, लेकिन इसे कानूनी मजबूरी बनाना महिलाओं के रोजगार की राह में रोड़ा बन सकता है।



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