फांसी से मौत की सजा जारी रहेगी, गोली मारना, इंजेक्शन या करंट जैसे ऑप्शन अभी नहीं
समझें क्या है पूरा मामला
- सुप्रीम कोर्ट ने फांसी से मौत की सजा वाली याचिका खारिज कर दी।
- वकील ऋषि मल्होत्रा ने फांसी की जगह इंजेक्शन या गोली मांगी थी।
- याचिका में फांसी को दर्दनाक और कैदी की गरिमा के खिलाफ बताया गया।
- कोर्ट ने कहा फांसी पर 1983 का फैसला बदलने की जरूरत नहीं।
- सरकार चाहे तो नई वैज्ञानिक समीक्षा करके तरीका बदल सकती है।
भारत में मौत की सजा फांसी से ही दी जाती रहेगी। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को यह साफ कर दिया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने यह फैसला दिया। बेंच ने एक अहम याचिका खारिज कर दी।
इस याचिका में फांसी की सजा की जगह नए तरीके मांगे गए थे। इसमें इंजेक्शन, गोली और करंट जैसे विकल्प शामिल थे। कोर्ट ने कहा कि अभी फांसी बदलने का ठोस आधार नहीं है। हालांकि कोर्ट ने एक रास्ता भी खुला रखा है। सरकार चाहे तो आगे इस पर वैज्ञानिक तरीके से समीक्षा कर सकती है।
क्या थी याचिका
वरिष्ठ वकील ऋषि मल्होत्रा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। उन्होंने मौत की सजा देने के तरीके पर सवाल उठाया था। याचिका में कहा गया था कि फांसी से कैदी को बहुत दर्द होता है। मौत आने में भी काफी समय लगता है।
मल्होत्रा ने मांग की कि फांसी की जगह कोई और तरीका अपनाया जाए। उन्होंने इंजेक्शन, गोली या करंट का सुझाव दिया। उनका कहना था कि कैदी को खुद तरीका चुनने का विकल्प भी मिलना चाहिए।
संविधान का हवाला दिया
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला दिया गया था। यह अनुच्छेद हर इंसान को गरिमा से जीने का अधिकार देता है। वकील का कहना था कि फांसी इस अधिकार का उल्लंघन करती है। याचिका में यह भी कहा गया कि विज्ञान अब आगे बढ़ चुका है। इसलिए मौत की सजा देने का तरीका भी बदलना चाहिए। साथ ही 1983 के पुराने फैसले पर भी दोबारा विचार की मांग की गई।
साल 1983 में दीना बनाम भारत संघ मामले में एक बड़ा फैसला आया था। तब सुप्रीम कोर्ट ने फांसी को सही ठहराया था। तीन जजों की बेंच ने कहा था कि फांसी संविधान के मुताबिक है। मल्होत्रा चाहते थे कि इस फैसले को बड़ी बेंच के पास भेजा जाए। उनकी दलील थी कि अब हालात बदल चुके हैं। इसलिए पुराने फैसले पर नए सिरे से सोचने की जरूरत है।
जजों ने क्या कहा
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने कहा कि दीना मामले को बड़ी बेंच में भेजने की जरूरत नहीं। यह मौजूदा फैसले के मुताबिक ही सही था। बेंच ने माना कि याचिका में ठोस आधार नहीं मिला। इस वजह से फांसी वाला मौजूदा कानून जारी रहेगा। कोर्ट ने 22 जनवरी 2026 को इस मामले में फैसला सुरक्षित रखा था। मंगलवार को अदालत ने अपना विस्तृत आदेश सुनाया।
सरकार के लिए रास्ता खुला
कोर्ट ने साफ कहा कि यह फैसला आखिरी नहीं है। सरकार चाहे तो फांसी के तरीके की समीक्षा कर सकती है। इसके लिए एक एक्सपर्ट कमेटी बनाई जा सकती है। इसमें कानून, फॉरेंसिक मेडिसिन (Forensic Medicine) और न्यूरोसाइंस के जानकार शामिल हो सकते हैं। क्रिमिनोलॉजी के विशेषज्ञ भी इस कमेटी का हिस्सा बन सकते हैं। मकसद यह देखना होगा कि कोई और तरीका कम दर्द वाला है या नहीं।
पहले क्या हुआ था
यह मामला कोर्ट में लंबे समय से चल रहा था। पिछले साल अक्टूबर में भी इस पर सुनवाई हुई थी। उस समय केंद्र सरकार ने इंजेक्शन वाले तरीके का विरोध किया था। सरकार ने कहा था कि वह अभी नया तरीका अपनाने को तैयार नहीं है। कोर्ट ने पहले भी सरकार से जानकारी मांगी थी। इसमें फांसी के दर्द और मौत में लगने वाले समय की जानकारी शामिल थी।
मौत की सजा पर असर नहीं
कोर्ट ने यह भी साफ किया। यह मामला मौत की सजा खत्म करने से जुड़ा नहीं है। भारत में गंभीर अपराधों में मौत की सजा का प्रावधान अभी भी है। कोर्ट ने सिर्फ सजा देने के तरीके पर सुनवाई की थी। इसलिए मौत की सजा की व्यवस्था पर कोई असर नहीं पड़ेगा। फिलहाल कैदियों को फांसी से ही सजा दी जाती रहेगी।
सरकार का पुराना रुख
पिछले साल अक्टूबर में भी कोर्ट में इस मुद्दे पर बहस हुई थी। तब केंद्र सरकार ने इंजेक्शन वाले तरीके को अपनाने से मना कर दिया था। सरकार का कहना था कि अभी नया तरीका अपनाने की तैयारी नहीं है। कोर्ट ने भी सरकार के इस रुख पर टिप्पणी की थी। मल्होत्रा ने तब कहा था कि कैदी को विकल्प तो मिलना ही चाहिए। उनका सुझाव था कि कैदी खुद तय करे कि उसे फांसी चाहिए या इंजेक्शन। हालांकि सरकार इस सुझाव पर राजी नहीं हुई थी।
आगे क्या हो सकता है
कोर्ट ने कहा कि यह मामला भविष्य में फिर खुल सकता है। इसके लिए नए वैज्ञानिक सबूत सामने आने चाहिए। मेडिकल साइंस अगर कम दर्द वाला तरीका साबित करे तो फायदा होगा। ऐसी स्थिति में कोर्ट दोबारा इस पर विचार कर सकता है। तब तक बीएनएसएस (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita) की धारा 393(5) के तहत फांसी ही तरीका रहेगी। बीएनएसएस का मतलब है भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता। सीआरपीसी (Code Of Criminal Procedure) की धारा 354(5) में भी यही प्रावधान था। सरकार पर अब फैसला करने की जिम्मेदारी बढ़ गई है।
जरूरी FAQ
क्या भारत में अब मौत की सजा फांसी से नहीं दी जाएगी?
नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने फांसी बदलने वाली याचिका खारिज कर दी है। भारत में मौत की सजा अभी भी फांसी से ही दी जाएगी। कोर्ट ने कहा कि 1983 के पुराने फैसले को बदलने का ठोस आधार नहीं मिला। इसलिए मौजूदा कानून जारी रहेगा।
क्या सरकार भविष्य में फांसी की जगह कोई और तरीका अपना सकती है?
हां, सुप्रीम कोर्ट ने इसकी गुंजाइश खुली रखी है। सरकार चाहे तो एक्सपर्ट कमेटी बनाकर वैज्ञानिक और मेडिकल आधार पर समीक्षा कर सकती है। इसमें कानून, फॉरेंसिक मेडिसिन और न्यूरोसाइंस के जानकार शामिल हो सकते हैं। कोर्ट का फैसला इस समीक्षा में रुकावट नहीं बनेगा।
याचिका में फांसी की जगह कौन से तरीके सुझाए गए थे?
याचिका में इंजेक्शन, गोली और करंट जैसे विकल्प सुझाए गए थे। वकील ऋषि मल्होत्रा ने कहा था कि फांसी दर्दनाक है और कैदी की गरिमा के खिलाफ है। उन्होंने यह भी मांग की थी कि कैदी को खुद तरीका चुनने का विकल्प मिले।
ये खबरें भी पढ़ें...
एमपी में 42 डिप्टी कलेक्टरों की पदोन्नति का रास्ता साफ, सुप्रीम कोर्ट की मुहर
भोजशाला केस को लेकर सुप्रीम कोर्ट में 19 अगस्त को सुनवाई, दोनों पक्षों की टिकी नजरें
सुप्रीम कोर्ट से NALSAR छात्रों को बड़ी राहत: वकालत पंजीकरण पर लगी रोक रद्द
कैदी की मौत की सुप्रीम कोर्ट ने CBI को दी जांच,छत्तीसगढ़ डीजीपी को ठहराया अक्षम