माता-पिता की सैलरी से तय नहीं होगी क्रीमी लेयर, सुप्रीम कोर्ट ने ठुकराई केंद्र सरकार की याचिका
Harrison Masih | Nov 06, 2026, 14:38 IST
ओबीसी आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: माता-पिता की सैलरी नहीं बनेगी क्रीमी लेयर का आधार
OBC आरक्षण का लाभ पाने के लिए अब माता-पिता की सैलरी को ही क्रीमी लेयर का आधार नहीं बनाया जा सकेगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने केंद्र की अर्जी खारिज कर अपने पुराने फैसले को बरकरार रखा है।
इस फैसले से उन OBC अभ्यर्थियों को राहत मिलेगी, जिन्होंने सिविल सेवा परीक्षा पास की थी। लेकिन माता-पिता की सैलरी के आधार पर उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं दिया गया। कोर्ट ने केंद्र सरकार को ऐसे पात्र उम्मीदवारों को नियुक्ति देने का निर्देश भी दिया है। इनमें IAS, IPS और IRS जैसी सेवाओं के लिए चयनित अभ्यर्थी शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने यह फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कहा कि OBC क्रीमी लेयर तय करने के लिए माता-पिता की सैलरी और कृषि से होने वाली आय को अकेले आधार नहीं बनाया जा सकता।
केंद्र सरकार ने कोर्ट से 11 मार्च 2026 के फैसले में बदलाव और स्पष्टीकरण देने की मांग की थी। सरकार चाहती थी कि पुराने मामलों पर इस फैसले का असर सीमित रखा जाए। लेकिन अदालत ने सरकार की मांग खारिज कर दी।
कोर्ट ने अपने पुराने आदेश को बरकरार रखा है। इसके साथ ही पात्र अभ्यर्थियों को नियुक्ति देने का रास्ता भी साफ हो गया है।
इस फैसले का सबसे ज्यादा फायदा उन OBC उम्मीदवारों को मिलेगा, जिन्होंने UPSC सिविल सेवा परीक्षा पास की थी। लेकिन उन्हें OBC नॉन-क्रीमी लेयर का लाभ नहीं मिला।
इन अभ्यर्थियों के माता-पिता PSU, बैंक और निजी संस्थानों में काम करते थे। विभाग ने माता-पिता की सैलरी और आय को आधार बनाकर उन्हें क्रीमी लेयर में मान लिया था।
इस वजह से कई उम्मीदवारों को OBC आरक्षण के तहत सेवा आवंटित नहीं की गई। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ऐसे उम्मीदवारों को राहत मिल सकती है।
अदालत ने केंद्र को निर्देश दिया है कि निर्धारित नियमों के तहत पात्र पाए जाने वाले उम्मीदवारों को नियुक्ति दी जाए। जरूरत पड़ने पर उनके लिए अतिरिक्त यानी सुपरन्यूमेरेरी पद भी बनाए जा सकते हैं।
दरअसल, विवाद OBC आरक्षण में क्रीमी लेयर तय करने के नियमों को लेकर शुरू हुआ था।
कुछ अभ्यर्थियों ने सिविल सेवा परीक्षा पास की थी। वे OBC वर्ग से आते थे। लेकिन उनके माता-पिता की सैलरी के आधार पर उन्हें क्रीमी लेयर में शामिल कर दिया गया।
इनमें कई उम्मीदवारों के माता-पिता सरकारी विभागों के बजाय PSU, बैंकों और निजी संस्थानों में नौकरी करते थे।
DoPT यानी कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने उनकी सैलरी और आय को आधार बनाकर क्रीमी लेयर तय की थी। इसके कारण उम्मीदवारों को OBC नॉन-क्रीमी लेयर का लाभ नहीं मिला।
इसके बाद अभ्यर्थियों ने इस फैसले को चुनौती दी। केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) और मद्रास, दिल्ली तथा केरल हाईकोर्ट से उन्हें राहत मिली। केंद्र सरकार ने इन फैसलों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहित नाथन मामले में केंद्र सरकार की अपील खारिज कर दी थी।
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने कहा था कि OBC क्रीमी लेयर का फैसला केवल आय देखकर नहीं किया जा सकता।
अदालत ने 1993 के सरकारी कार्यालय ज्ञापन और 2004 के स्पष्टीकरण पत्र का भी जिक्र किया था।
कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि माता-पिता की सैलरी और कृषि भूमि से होने वाली आय को दूसरी आय के साथ जोड़कर सीधे क्रीमी लेयर तय नहीं की जा सकती।
अदालत ने यह भी कहा था कि माता-पिता का पद और उनकी सेवा श्रेणी महत्वपूर्ण है। सरकारी कर्मचारियों, PSU और निजी क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के बच्चों के लिए अलग-अलग मानक अपनाकर समान स्थिति वाले उम्मीदवारों के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता।
11 मार्च के फैसले के बाद केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्पष्टीकरण और बदलाव के लिए अर्जी लगाई थी।
सरकार का कहना था कि इस फैसले को पुराने मामलों और पहले से पूरी हो चुकी नियुक्तियों पर लागू करने से परेशानी हो सकती है।
इससे सेवा आवंटन, कैडर और वरिष्ठता जैसे मामलों में प्रशासनिक दिक्कतें आ सकती हैं। केंद्र ने फैसले को लागू करने के लिए अतिरिक्त समय भी मांगा था।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने अपनी पुरानी व्यवस्था को बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश से IAS, IPS, IRS समेत अन्य केंद्रीय सेवाओं के पात्र उम्मीदवारों को फायदा मिल सकता है।
अदालत ने कहा है कि जिन उम्मीदवारों को गलत तरीके से OBC नॉन-क्रीमी लेयर का लाभ देने से रोका गया, उन्हें निर्धारित नियमों के अनुसार नियुक्ति दी जाए।
इसके लिए अन्य जरूरी पात्रता शर्तों को पूरा करना भी अनिवार्य होगा।
जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त पद बनाए जा सकते हैं। इससे पहले चयनित और पात्र उम्मीदवारों को समायोजित करने में मदद मिलेगी।
यह फैसला OBC आरक्षण के नियमों को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे उन उम्मीदवारों को राहत मिलने की उम्मीद है, जो परीक्षा पास करने के बावजूद क्रीमी लेयर के गलत निर्धारण के कारण अपने अधिकार से वंचित रह गए थे।
मामले में पैरवी कर रहे वकील शशांक रत्नू ने इसे OBC वर्ग की बड़ी जीत बताया है। उन्होंने कहा कि इससे करीब एक दशक से चले आ रहे अन्याय का अंत हुआ है।
अब केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार पात्र उम्मीदवारों की नियुक्ति की प्रक्रिया आगे बढ़ानी होगी।.
OBC आरक्षण से जुड़े फैसले सीधे लाखों युवाओं के सरकारी नौकरी के अवसर से जुड़े हैं। सिविल सेवा में चयन के बाद भी नियुक्ति न मिलना अभ्यर्थियों और उनके परिवारों के लिए बड़ा झटका होता है। यह फैसला बताता है कि आरक्षण की पात्रता तय करते समय आय के साथ पद, सेवा और सामाजिक स्थिति भी देखी जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की अर्जी खारिज की
केंद्र सरकार ने कोर्ट से 11 मार्च 2026 के फैसले में बदलाव और स्पष्टीकरण देने की मांग की थी। सरकार चाहती थी कि पुराने मामलों पर इस फैसले का असर सीमित रखा जाए। लेकिन अदालत ने सरकार की मांग खारिज कर दी।
कोर्ट ने अपने पुराने आदेश को बरकरार रखा है। इसके साथ ही पात्र अभ्यर्थियों को नियुक्ति देने का रास्ता भी साफ हो गया है।
किन अभ्यर्थियों को मिलेगा फैसले का फायदा?
इन अभ्यर्थियों के माता-पिता PSU, बैंक और निजी संस्थानों में काम करते थे। विभाग ने माता-पिता की सैलरी और आय को आधार बनाकर उन्हें क्रीमी लेयर में मान लिया था।
इस वजह से कई उम्मीदवारों को OBC आरक्षण के तहत सेवा आवंटित नहीं की गई। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ऐसे उम्मीदवारों को राहत मिल सकती है।
अदालत ने केंद्र को निर्देश दिया है कि निर्धारित नियमों के तहत पात्र पाए जाने वाले उम्मीदवारों को नियुक्ति दी जाए। जरूरत पड़ने पर उनके लिए अतिरिक्त यानी सुपरन्यूमेरेरी पद भी बनाए जा सकते हैं।
क्या था पूरा मामला?
कुछ अभ्यर्थियों ने सिविल सेवा परीक्षा पास की थी। वे OBC वर्ग से आते थे। लेकिन उनके माता-पिता की सैलरी के आधार पर उन्हें क्रीमी लेयर में शामिल कर दिया गया।
इनमें कई उम्मीदवारों के माता-पिता सरकारी विभागों के बजाय PSU, बैंकों और निजी संस्थानों में नौकरी करते थे।
DoPT यानी कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने उनकी सैलरी और आय को आधार बनाकर क्रीमी लेयर तय की थी। इसके कारण उम्मीदवारों को OBC नॉन-क्रीमी लेयर का लाभ नहीं मिला।
इसके बाद अभ्यर्थियों ने इस फैसले को चुनौती दी। केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) और मद्रास, दिल्ली तथा केरल हाईकोर्ट से उन्हें राहत मिली। केंद्र सरकार ने इन फैसलों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने कहा था कि OBC क्रीमी लेयर का फैसला केवल आय देखकर नहीं किया जा सकता।
अदालत ने 1993 के सरकारी कार्यालय ज्ञापन और 2004 के स्पष्टीकरण पत्र का भी जिक्र किया था।
कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि माता-पिता की सैलरी और कृषि भूमि से होने वाली आय को दूसरी आय के साथ जोड़कर सीधे क्रीमी लेयर तय नहीं की जा सकती।
अदालत ने यह भी कहा था कि माता-पिता का पद और उनकी सेवा श्रेणी महत्वपूर्ण है। सरकारी कर्मचारियों, PSU और निजी क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के बच्चों के लिए अलग-अलग मानक अपनाकर समान स्थिति वाले उम्मीदवारों के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता।
केंद्र सरकार ने दोबारा कोर्ट का दरवाजा क्यों खटखटाया?
सरकार का कहना था कि इस फैसले को पुराने मामलों और पहले से पूरी हो चुकी नियुक्तियों पर लागू करने से परेशानी हो सकती है।
इससे सेवा आवंटन, कैडर और वरिष्ठता जैसे मामलों में प्रशासनिक दिक्कतें आ सकती हैं। केंद्र ने फैसले को लागू करने के लिए अतिरिक्त समय भी मांगा था।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने अपनी पुरानी व्यवस्था को बरकरार रखा।
IAS, IPS और IRS बनने वाले उम्मीदवारों को राहत
अदालत ने कहा है कि जिन उम्मीदवारों को गलत तरीके से OBC नॉन-क्रीमी लेयर का लाभ देने से रोका गया, उन्हें निर्धारित नियमों के अनुसार नियुक्ति दी जाए।
इसके लिए अन्य जरूरी पात्रता शर्तों को पूरा करना भी अनिवार्य होगा।
जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त पद बनाए जा सकते हैं। इससे पहले चयनित और पात्र उम्मीदवारों को समायोजित करने में मदद मिलेगी।
OBC अभ्यर्थियों के लिए क्यों अहम है फैसला?
मामले में पैरवी कर रहे वकील शशांक रत्नू ने इसे OBC वर्ग की बड़ी जीत बताया है। उन्होंने कहा कि इससे करीब एक दशक से चले आ रहे अन्याय का अंत हुआ है।
अब केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार पात्र उम्मीदवारों की नियुक्ति की प्रक्रिया आगे बढ़ानी होगी।.
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