OBC क्रीमी लेयर पर SC का बड़ा फैसला, अब माता-पिता की सैलरी से तय नहीं होगा आरक्षण का हक
Neel Tiwari | Mar 12, 2026, 11:16 IST
supreme court rules obc creamy layer
1993 में क्रीमी लेयर तय करने के लिए नियम बने थे। उसमें कहा गया था कि क्रीमी लेयर सिर्फ अन्य स्रोतों से होने वाली आय के आधार पर तय किया जाएगा। फिर सरकार ने इन नियमों में बदलाव करते हुए माता-पिता की सैलरी के आधार पर क्रीमी लेयर तय करना शुरू कर दिया।
दिल्ली. अब सुप्रीम कोर्ट ने इस नियम को सिरे से खारिज करते हुए यह साफ कर दिया है कि माता-पिता की सैलरी और खेती से होने वाली आय के जरिए अब ओबीसी वर्ग में क्रीमी लेयर तय नहीं किया जाएगा।
इसका मतलब यह है कि अगर किसी अभ्यर्थी के माता-पिता सरकारी नौकरी, सार्वजनिक उपक्रम (PSU), बैंक या निजी कंपनी में नौकरी करते हैं और उनकी आय सिर्फ वेतन के रूप में है, तो उस वेतन के आधार पर बच्चे को OBC RESERVATION से बाहर नहीं किया जा सकता।
सामाजिक प्रतिष्ठा अब भी क्रीमी लेयर का आधार रहेगी। उदाहरण के तौर पर IAS और IPS जैसे पदों पर यदि माता-पिता कार्यरत हैं तो बच्चे को क्रीमी लेयर का फायदा नहीं मिलेगा।
अदालत के इस फैसले से देशभर के हजारों छात्रों और अभ्यर्थियों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।
OBC आरक्षण में क्रीमी लेयर उस वर्ग को कहा जाता है जो सामाजिक और आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत मजबूत हो चुका है। आरक्षण का उद्देश्य पिछड़े और कमजोर तबकों को आगे लाना है, इसलिए यह तय किया गया कि जो परिवार पहले से आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत हैं, उन्हें OBC आरक्षण का लाभ न दिया जाए।
इसी को क्रीमी लेयर कहा जाता है। सरकार समय-समय पर एक आय सीमा तय करती है। अगर परिवार की कुछ तरह की आय इस सीमा से ऊपर चली जाती है, तो उस परिवार के बच्चों को OBC आरक्षण नहीं मिलता। फिलहाल यह सीमा 8 लाख रुपये सालाना के आसपास मानी जाती है।
पूरा विवाद 2004 में केंद्र सरकार के कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के एक स्पष्टीकरण पत्र से शुरू हुआ। इस पत्र में कहा गया था कि यदि किसी अभ्यर्थी के माता-पिता सार्वजनिक उपक्रमों, बैंकों या निजी कंपनियों में नौकरी करते हैं, तो उनकी सैलरी को भी क्रीमी लेयर की आय में जोड़ा जाएगा।
इस नियम के कारण कई ऐसे छात्र, जिन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं में अच्छी रैंक हासिल की थी, OBC आरक्षण से वंचित हो गए। ऐसा क्योंकि उनके माता-पिता की सैलरी आय सीमा से अधिक मानी गई। इसी फैसले को चुनौती देते हुए कई अभ्यर्थियों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की पीठ ने इसकी सुनवाई की। इस दौरान कहा गया कि केवल वेतन के आधार पर किसी परिवार को क्रीमी लेयर मानना सही नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि 1993 में जारी मूल सरकारी आदेश में साफ था कि क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल “अन्य स्रोतों से आय” के आधार पर किया जाएगा।
बाद में 2004 का जो स्पष्टीकरण पत्र जारी किया गया, वह मूल नियमों के विपरीत था। इसलिए अदालत ने उस पत्र को अवैध और असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद क्रीमी लेयर तय करने का तरीका पहले के मूल नियमों के अनुसार ही माना जाएगा। इसका मतलब यह है कि
इस मामले में कई अभ्यर्थियों ने वर्षों तक कानूनी लड़ाई लड़ी थी। कुछ उम्मीदवारों ने प्रतिष्ठित परीक्षाएं पास करने के बावजूद केवल इसलिए नौकरी नहीं पाई क्योंकि उनके माता-पिता की सैलरी ज्यादा थी।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि ऐसे मामलों की फिर से समीक्षा की जाए और योग्य अभ्यर्थियों को छह महीने के भीतर सेवा आवंटित की जाए। इसके लिए जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त पद भी बनाए जा सकते हैं, ताकि पहले से नियुक्त अधिकारियों की वरिष्ठता प्रभावित न हो।
अगर आपके माता-पिता नौकरी करते हैं और उनकी आय सिर्फ महीने की सैलरी से आती है, तो अब केवल उसी वजह से आपको OBC आरक्षण से बाहर नहीं किया जा सकेगा। क्रीमी लेयर का फैसला अब इस आधार पर होगा कि परिवार के पास अन्य स्रोतों से कितनी आय या संपत्ति है और उनकी सामाजिक स्थिति क्या है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, क्योंकि इससे नौकरीपेशा मध्यम वर्ग के हजारों OBC परिवारों को आरक्षण का लाभ मिलने का रास्ता साफ हो सकता है।
MP में ओबीसी आरक्षण विवाद फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, फैसले में सुधार की मांग; 17 मार्च को ओपन कोर्ट में होगी सुनवाई
ओबीसी आरक्षण की कमांड अब आईएएस कविता बाटला के हाथ: 27% कोटे के मुकदमों की बनीं प्रभारी
ओबीसी आरक्षण केस में 13 फीसदी होल्ड पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, अंतरिम राहत पर फैसला गुरुवार को
सुप्रीम कोर्ट में 27% ओबीसी आरक्षण केस फिर अटका, आज की सुनवाई टली
इसका मतलब यह है कि अगर किसी अभ्यर्थी के माता-पिता सरकारी नौकरी, सार्वजनिक उपक्रम (PSU), बैंक या निजी कंपनी में नौकरी करते हैं और उनकी आय सिर्फ वेतन के रूप में है, तो उस वेतन के आधार पर बच्चे को OBC RESERVATION से बाहर नहीं किया जा सकता।
सामाजिक प्रतिष्ठा अब भी क्रीमी लेयर का आधार रहेगी। उदाहरण के तौर पर IAS और IPS जैसे पदों पर यदि माता-पिता कार्यरत हैं तो बच्चे को क्रीमी लेयर का फायदा नहीं मिलेगा।
अदालत के इस फैसले से देशभर के हजारों छात्रों और अभ्यर्थियों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।
क्रीमी लेयर क्या होता है और इसे क्यों बनाया गया?
इसी को क्रीमी लेयर कहा जाता है। सरकार समय-समय पर एक आय सीमा तय करती है। अगर परिवार की कुछ तरह की आय इस सीमा से ऊपर चली जाती है, तो उस परिवार के बच्चों को OBC आरक्षण नहीं मिलता। फिलहाल यह सीमा 8 लाख रुपये सालाना के आसपास मानी जाती है।
कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद
इस नियम के कारण कई ऐसे छात्र, जिन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं में अच्छी रैंक हासिल की थी, OBC आरक्षण से वंचित हो गए। ऐसा क्योंकि उनके माता-पिता की सैलरी आय सीमा से अधिक मानी गई। इसी फैसले को चुनौती देते हुए कई अभ्यर्थियों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने कहा कि 1993 में जारी मूल सरकारी आदेश में साफ था कि क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल “अन्य स्रोतों से आय” के आधार पर किया जाएगा।
बाद में 2004 का जो स्पष्टीकरण पत्र जारी किया गया, वह मूल नियमों के विपरीत था। इसलिए अदालत ने उस पत्र को अवैध और असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया।
अब क्रीमी लेयर कैसे तय होगी
- माता-पिता की नौकरी की सैलरी को आय सीमा में नहीं जोड़ा जाएगा।
- खेती से होने वाली आय भी क्रीमी लेयर तय करने में नहीं जोड़ी जाएगी।
- लेकिन व्यापार, किराया, निवेश, बड़ी संपत्तियों या अन्य स्रोतों से होने वाली आय को आय सीमा में शामिल किया जाएगा।
- इसके अलावा कुछ उच्च पदों पर कार्यरत लोगों (जैसे उच्च श्रेणी के अधिकारी या उच्च संवैधानिक पद) के बच्चों को भी क्रीमी लेयर माना जा सकता है, चाहे उनकी आय सीमा कुछ भी हो।
छात्रों के लिए क्या है राहत
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि ऐसे मामलों की फिर से समीक्षा की जाए और योग्य अभ्यर्थियों को छह महीने के भीतर सेवा आवंटित की जाए। इसके लिए जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त पद भी बनाए जा सकते हैं, ताकि पहले से नियुक्त अधिकारियों की वरिष्ठता प्रभावित न हो।
आसान भाषा में समझें पूरा फैसला
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, क्योंकि इससे नौकरीपेशा मध्यम वर्ग के हजारों OBC परिवारों को आरक्षण का लाभ मिलने का रास्ता साफ हो सकता है।
ये खबरें भी पढ़ें...
ओबीसी आरक्षण की कमांड अब आईएएस कविता बाटला के हाथ: 27% कोटे के मुकदमों की बनीं प्रभारी
ओबीसी आरक्षण केस में 13 फीसदी होल्ड पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, अंतरिम राहत पर फैसला गुरुवार को
सुप्रीम कोर्ट में 27% ओबीसी आरक्षण केस फिर अटका, आज की सुनवाई टली
MP कर्मचारी प्रमोशन: 10 साल बाद पदोन्नति, अब 4 साल की छूट पर अटका मामला, राज्य कर्मचारी संघ ने सीएम मोहन यादव से की मांग
By Atul Dwivedi
एमपी भाजपा में 30 सितंबर को तीन दिग्गजों की एकसाथ आमद, 236 दिन बाद मिला प्रदेश संगठन महामंत्री
By Ramanand Tiwari
मध्य प्रदेश भाजपा में अब लक्ष्मण रेखा कौन खींचेगा? चंद्रशेखर की होगी असली परीक्षा
By Ramanand Tiwari
मध्य प्रदेश के किसानों को बड़ी राहत: मिनी ट्रैक्टर पर मिलेगी 50 प्रतिशत तक सब्सिडी, ऑनलाइन पोर्टल पर ऐसे करें आवेदन
By Jitendra Shrivastava
mp-top-news: खबरें काम की... ब्राह्मणों ने कभी शासन नहीं किया, नरोत्तम मिश्रा बोले खामोशी को कमजोरी न समझें
By Sanjay Dhiman
झाबुआ संयुक्त कलेक्टर अक्षय सिंह की नौकरी खतरे में, फर्जी जाति प्रमाणपत्र में ऐसे घिरे
By Sanjay Gupta
बस्तर में बाढ़ का जायजा लेने पहुंचे CM साय, प्रभावित परिवारों से मिले, 10 हजार रुपए अतिरिक्त सहायता की घोषणा
By Arun Tiwari