एक तरफ बिड़ला का सीमेंट प्लांट, दूसरी तरफ 15 हजार एकड़ खेतों का भविष्य, किसानों की रोजी-रोटी पर संकट

Arun Tiwari | Nov 06, 2026, 13:58 IST
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पेंड्रावन डेम पर संकट: 15 हजार एकड़ खेती की सिंचाई पर मंडराया खतरा
पेंड्रावन डेम पर संकट: 15 हजार एकड़ खेती की सिंचाई पर मंडराया खतरा

अंग्रेजों ने किसानों की खेती और सिंचाई के लिए बांध बनवाया था, ताकि उनकी जमीन को पानी मिलता रहे। लेकिन आजाद भारत में उसी बांध के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा है। रायपुर जिले के पेंड्रावन डेम के आसपास प्रस्तावित अल्ट्राटेक सीमेंट प्लांट और लाइमस्टोन खनन को लेकर किसानों की चिंता बढ़ गई है।

किसानों का कहना है कि यदि डेम के कैचमेंट एरिया में सीमेंट प्लांट और माइनिंग शुरू हुई, तो 15 हजार एकड़ कृषि भूमि की सिंचाई व्यवस्था खत्म हो जाएगी। जिस डेम ने पीढ़ियों से किसानों की खेती को जिंदा रखा, वही डेम अब औद्योगिक परियोजना की भेंट चढ़ रहा है।

पहली कड़ी में हमने बताया था कि पेंड्रावन डेम के कैचमेंट एरिया में कंपनी ने 1700 एकड़ जमीन खरीदी है और जल संसाधन विभाग से एनओसी भी हासिल कर ली है। अब इस दूसरी कड़ी में समझिए कि पेंड्रावन डेम आखिर इतना महत्वपूर्ण क्यों है और इसके कैचमेंट एरिया में सीमेंट प्लांट लगने से किसानों को किस तरह के नुकसान की आशंका है।

125 साल पुराने पेंड्रावन डेम पर सीमेंट प्लांट का खतरा: 1700 एकड़ जमीन पर बिड़ला की तैयारी, किसान कर रहे बड़े आंदोलन की तैयारी | Threat of Cement Plant on 125-Year-Old Pendrawan Dam: Birla's Preparation on 1700 Acres, Farmers Preparing for Major Protest
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By Arun Tiwari
छत्तीसगढ़ में अडानी समूह के बाद अब बिड़ला समूह की कंपनी अल्ट्राटेक सीमेंट को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। रायपुर जिले के करीब 125 साल पुराने पेंड्रावन डेम के कैचमेंट एरिया में कंपनी ने 689 हेक्टेयर यानी करीब 1700 एकड़ जमीन खरीदी है। इस जमीन पर सीमेंट प्लांट लगाने और लाइमस्टोन की माइनिंग की तैयारी है।
छत्तीसगढ़ में अडानी समूह के बाद अब बिड़ला समूह की कंपनी अल्ट्राटेक सीमेंट को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। रायपुर जिले के करीब 125 साल पुराने पेंड्रावन डेम के कैचमेंट एरिया में कंपनी ने 689 हेक्टेयर यानी करीब 1700 एकड़ जमीन खरीदी है। इस जमीन पर सीमेंट प्लांट लगाने और लाइमस्टोन की माइनिंग की तैयारी है।

1909 में बना डेम, 15 हजार एकड़ जमीन को मिलता है पानी

रायपुर से करीब 50 किलोमीटर दूर खरोरा और सारागांव क्षेत्र में स्थित पेंड्रावन डेम का निर्माण वर्ष 1909 में कराया गया था। किसानों के मुताबिक, तत्कालीन महारानी विक्टोरिया के शासनकाल में इस बांध का निर्माण कराया गया था और इसे किसानों की सिंचाई के लिए समर्पित किया गया था।

आज यह डेम आसपास के गांवों के किसानों के लिए जीवनरेखा बना हुआ है। पेंड्रावन सिंचाई परियोजना से करीब 15 हजार एकड़ जमीन की सिंचाई होती है। परियोजना के आंकड़ों के मुताबिक, 2440 किसानों की 3440 हेक्टेयर यानी करीब 8500 एकड़ जमीन को सीधे सिंचाई का लाभ मिलता है।

इसके अलावा आसपास के क्षेत्र में भूजल स्तर के पुनर्भरण में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है। इससे करीब 15 हजार एकड़ जमीन को पानी मिल पाता है।

पेंड्रावन बचाओ संघ के अध्यक्ष और किसान अनिल नायक के मुताबिक, डेम का जलग्रहण क्षेत्र 25.47 वर्ग किलोमीटर है। प्रस्तावित सीमेंट प्लांट और खनन के कारण यह क्षेत्र घटकर करीब 8 वर्ग किलोमीटर रह जाएगा। इसी तरह जलभराव क्षमता पर भी असर पड़ सकता है। किसानों का दावा है कि मौजूदा 85 प्रतिशत जलभराव की स्थिति घटकर महज 32 प्रतिशत रह जाएगी।

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ब्लास्टिंग से डेम के अस्तित्व पर संकट

किसानों की चिंता सिर्फ जमीन पर प्लांट लगने तक सीमित नहीं है। उन्हें आशंका है कि सीमेंट प्लांट के लिए प्रस्तावित लाइमस्टोन माइनिंग के दौरान बड़े पैमाने पर ब्लास्टिंग होगी। इससे डेम के जलग्रहण क्षेत्र और पानी के प्राकृतिक स्रोतों पर असर पड़ेगा।

किसान अनिल नायक का कहना है कि पेंड्रावन डेम में आसपास की जमीन से आने वाले पानी के अलावा ओवरफ्लो के जरिए तीन अन्य डेम भी भरते हैं। ऐसे में यदि खनन और ब्लास्टिंग से पानी के प्राकृतिक प्रवाह के रास्ते प्रभावित हुए, तो डेम में पानी का भराव कम हो सकता है।

उनका दावा है कि प्लांट और खनन शुरू होने के बाद डेम में पानी पहुंचने के प्राकृतिक स्रोत प्रभावित होंगे। इसका सीधा असर सिंचाई पर पड़ेगा। डेम में पानी कम हुआ, तो 15 हजार एकड़ जमीन की खेती संकट में आ जाएगी। किसानों के सामने रोजी-रोटी का सवाल खड़ा हो जाएगा।

अनिल नायक कहते हैं कि अंग्रेजों ने किसानों के हित में डेम बनवाया था। महारानी विक्टोरिया ने इसका लोकार्पण कर इसे किसानों को समर्पित किया था। लेकिन आजाद भारत में हमारी ही सरकार उसी डेम के अस्तित्व को संकट में डाल रही है। किसानों के हितों की अनदेखी कर औद्योगिक परियोजना को प्राथमिकता दी जा रही है।

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सरकार की प्राथमिकता में किसान या उद्योग?

पेंड्रावन डेम के कैचमेंट एरिया में खरीदी गई 1700 एकड़ जमीन पर सीमेंट प्लांट और लाइमस्टोन माइनिंग की तैयारी है। ऐसे में किसानों का सवाल है कि यदि इस क्षेत्र में औद्योगिक गतिविधियां शुरू हुईं, तो उनके हिस्से में क्या बचेगा?

किसानों का कहना है कि वे औद्योगिकीकरण के विरोधी नहीं हैं। सरकार उद्योग लगाए, रोजगार के अवसर पैदा करे और प्रदेश का विकास करे, लेकिन इसकी कीमत किसानों की खेती और सिंचाई व्यवस्था को खत्म करके नहीं चुकाई जानी चाहिए।

उनका सवाल है कि यदि एक तरफ सरकार किसानों की आय बढ़ाने और खेती को मजबूत करने की बात करती है, तो दूसरी तरफ हजारों एकड़ जमीन की सिंचाई के आधार बने डेम के कैचमेंट एरिया में सीमेंट प्लांट की अनुमति कैसे दी जा सकती है?

किसानों का कहना है कि बिड़ला जैसी बड़ी कंपनी के पास संसाधन और ताकत है, लेकिन छोटे और गरीब किसान अपनी जमीन और पानी के लिए आखिर किसके पास जाएंगे? उनके लिए पेंड्रावन डेम सिर्फ एक बांध नहीं, बल्कि पीढ़ियों की आजीविका का आधार है।

अब निगाहें सरकार के फैसले पर टिकी हैं। सवाल यह है कि क्या सरकार किसानों की आशंकाओं को देखते हुए एनओसी पर पुनर्विचार करेगी या फिर 15 हजार एकड़ जमीन की सिंचाई से जुड़े इस सवाल के बीच सीमेंट प्लांट की राह आसान होगी?

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हमारी सरकार उजाड़ रही खेती

1909 में किसानों की खेती को पानी देने के लिए बना पेंड्रावन डेम आज खुद अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। एक तरफ 1700 एकड़ जमीन पर सीमेंट प्लांट और माइनिंग की तैयारी है, तो दूसरी तरफ हजारों किसान अपने खेतों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं।

किसानों का सवाल सीधा है: अंग्रेजों के जमाने में जिस डेम को किसानों के लिए बनाया गया था, क्या आजाद भारत में उसे उद्योग के लिए कुर्बान कर दिया जाएगा?
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