OBC क्रीमी लेयर पर SC का बड़ा फैसला, अब माता-पिता की सैलरी से तय नहीं होगा आरक्षण का हक
दिल्ली. अब सुप्रीम कोर्ट ने इस नियम को सिरे से खारिज करते हुए यह साफ कर दिया है कि माता-पिता की सैलरी और खेती से होने वाली आय के जरिए अब ओबीसी वर्ग में क्रीमी लेयर तय नहीं किया जाएगा।
इसका मतलब यह है कि अगर किसी अभ्यर्थी के माता-पिता सरकारी नौकरी, सार्वजनिक उपक्रम (PSU), बैंक या निजी कंपनी में नौकरी करते हैं और उनकी आय सिर्फ वेतन के रूप में है, तो उस वेतन के आधार पर बच्चे को OBC RESERVATION से बाहर नहीं किया जा सकता।
सामाजिक प्रतिष्ठा अब भी क्रीमी लेयर का आधार रहेगी। उदाहरण के तौर पर IAS और IPS जैसे पदों पर यदि माता-पिता कार्यरत हैं तो बच्चे को क्रीमी लेयर का फायदा नहीं मिलेगा।
अदालत के इस फैसले से देशभर के हजारों छात्रों और अभ्यर्थियों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।
क्रीमी लेयर क्या होता है और इसे क्यों बनाया गया?
OBC आरक्षण में क्रीमी लेयर उस वर्ग को कहा जाता है जो सामाजिक और आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत मजबूत हो चुका है। आरक्षण का उद्देश्य पिछड़े और कमजोर तबकों को आगे लाना है, इसलिए यह तय किया गया कि जो परिवार पहले से आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत हैं, उन्हें OBC आरक्षण का लाभ न दिया जाए।
इसी को क्रीमी लेयर कहा जाता है। सरकार समय-समय पर एक आय सीमा तय करती है। अगर परिवार की कुछ तरह की आय इस सीमा से ऊपर चली जाती है, तो उस परिवार के बच्चों को OBC आरक्षण नहीं मिलता। फिलहाल यह सीमा 8 लाख रुपये सालाना के आसपास मानी जाती है।
कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद
पूरा विवाद 2004 में केंद्र सरकार के कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के एक स्पष्टीकरण पत्र से शुरू हुआ। इस पत्र में कहा गया था कि यदि किसी अभ्यर्थी के माता-पिता सार्वजनिक उपक्रमों, बैंकों या निजी कंपनियों में नौकरी करते हैं, तो उनकी सैलरी को भी क्रीमी लेयर की आय में जोड़ा जाएगा।
इस नियम के कारण कई ऐसे छात्र, जिन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं में अच्छी रैंक हासिल की थी, OBC आरक्षण से वंचित हो गए। ऐसा क्योंकि उनके माता-पिता की सैलरी आय सीमा से अधिक मानी गई। इसी फैसले को चुनौती देते हुए कई अभ्यर्थियों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की पीठ ने इसकी सुनवाई की। इस दौरान कहा गया कि केवल वेतन के आधार पर किसी परिवार को क्रीमी लेयर मानना सही नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि 1993 में जारी मूल सरकारी आदेश में साफ था कि क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल “अन्य स्रोतों से आय” के आधार पर किया जाएगा।
बाद में 2004 का जो स्पष्टीकरण पत्र जारी किया गया, वह मूल नियमों के विपरीत था। इसलिए अदालत ने उस पत्र को अवैध और असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया।
अब क्रीमी लेयर कैसे तय होगी
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद क्रीमी लेयर तय करने का तरीका पहले के मूल नियमों के अनुसार ही माना जाएगा। इसका मतलब यह है कि
- माता-पिता की नौकरी की सैलरी को आय सीमा में नहीं जोड़ा जाएगा।
- खेती से होने वाली आय भी क्रीमी लेयर तय करने में नहीं जोड़ी जाएगी।
- लेकिन व्यापार, किराया, निवेश, बड़ी संपत्तियों या अन्य स्रोतों से होने वाली आय को आय सीमा में शामिल किया जाएगा।
- इसके अलावा कुछ उच्च पदों पर कार्यरत लोगों (जैसे उच्च श्रेणी के अधिकारी या उच्च संवैधानिक पद) के बच्चों को भी क्रीमी लेयर माना जा सकता है, चाहे उनकी आय सीमा कुछ भी हो।
इस तरह क्रीमी लेयर का फैसला सिर्फ आय के आधार पर नहीं बल्कि परिवार की सामाजिक स्थिति और आर्थिक स्रोतों को देखकर किया जाएगा।
छात्रों के लिए क्या है राहत
इस मामले में कई अभ्यर्थियों ने वर्षों तक कानूनी लड़ाई लड़ी थी। कुछ उम्मीदवारों ने प्रतिष्ठित परीक्षाएं पास करने के बावजूद केवल इसलिए नौकरी नहीं पाई क्योंकि उनके माता-पिता की सैलरी ज्यादा थी।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि ऐसे मामलों की फिर से समीक्षा की जाए और योग्य अभ्यर्थियों को छह महीने के भीतर सेवा आवंटित की जाए। इसके लिए जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त पद भी बनाए जा सकते हैं, ताकि पहले से नियुक्त अधिकारियों की वरिष्ठता प्रभावित न हो।
आसान भाषा में समझें पूरा फैसला
अगर आपके माता-पिता नौकरी करते हैं और उनकी आय सिर्फ महीने की सैलरी से आती है, तो अब केवल उसी वजह से आपको OBC आरक्षण से बाहर नहीं किया जा सकेगा। क्रीमी लेयर का फैसला अब इस आधार पर होगा कि परिवार के पास अन्य स्रोतों से कितनी आय या संपत्ति है और उनकी सामाजिक स्थिति क्या है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, क्योंकि इससे नौकरीपेशा मध्यम वर्ग के हजारों OBC परिवारों को आरक्षण का लाभ मिलने का रास्ता साफ हो सकता है।
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