भारत का विभाजन करने वालों का होगा विभाजन? UK में लगी बंटवारे की चिंगारी
समझें क्या है पूरा मामला...
- भारत का विभाजन करने वाला ब्रिटेन अब खुद टूटने की कगार पर है।
- स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड ब्रिटेन से आजादी चाहते हैं।
- तीनों देशों के नेताओं ने कार्डिफ में ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं।
- समझौते में जनमत संग्रह कराने का अधिकार मांगा गया है।
- अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के बयान ने इस मांग को हवा दी है।
जिस ब्रिटेन ने भारत समेत दुनिया के कई देशों का बंटवारा किया, वही आज खुद बिखरने की स्थिति में पहुंच गया है। यूनाइटेड किंगडम चार देशों से मिलकर बना है, इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड। पहली बार इंग्लैंड को छोड़कर बाकी तीनों देशों में ऐसी सरकारें हैं, जो ब्रिटेन से अलग होना चाहती हैं। यह मामला अब राजनीतिक तूफान की शक्ल ले चुका है।
कार्डिफ में हुई ऐतिहासिक बैठक
वेल्स की राजधानी कार्डिफ में सोमवार यानी 14 सितंबर 2026 को एक बड़ी बैठक हुई है। इस बैठक में स्कॉटलैंड के फर्स्ट मिनिस्टर जॉन स्विनी शामिल हुए। वेल्स के फर्स्ट मिनिस्टर रून एप इओरवेर्थ और उत्तरी आयरलैंड की नेता मिशेल ओ नील भी मौजूद रहीं। आयरलैंड की विपक्ष नेता और सिन फेन प्रमुख मैरी लू मैकडॉनल्ड भी इसमें चौथी हस्ताक्षरकर्ता बनीं।
इन चारों नेताओं ने एक साझा समझौता ज्ञापन यानी एमओयू (Memorandum Of Understanding) पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते में साफ कहा गया कि उनके देशों को खुद फैसला लेने का अधिकार है। नेताओं ने यह भी कहा कि किसी भी वेस्टमिंस्टर सरकार को लोकतंत्र रोकने का अधिकार नहीं है।
क्या कहता है समझौता ज्ञापन
समझौते में सीधे ब्रिटिश संसद की तरफ इशारा किया गया है। इसमें कहा गया कि वेस्टमिंस्टर यानी ब्रिटिश संसद का वक्त अब खत्म हो चुका है। नेताओं ने यह संदेश पूरी दुनिया को देने की कोशिश की है। समझौते के मुताबिक हर देश को अपना भविष्य खुद तय करने का हक है।
मई में हुए वेल्स संसद चुनाव ने भी बड़ा बदलाव लाया था। इन चुनावों में प्लाइड सिमरू पार्टी जीती थी। इससे साल 1999 के बाद पहली बार वेल्स सरकार पर लेबर पार्टी का पूरा नियंत्रण खत्म हुआ। यह जीत आजादी समर्थक राजनीति के लिए बड़ा मोड़ मानी जा रही है।
ट्रंप के बयान ने भड़काई आग
यह ऐलान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक बयान के करीब 48 घंटे बाद आया है। ट्रंप उस वक्त आयरलैंड के दौरे पर थे। डबलिन में उन्होंने कहा था कि वे उत्तरी आयरलैंड और आयरलैंड को एक देश के रूप में देखना पसंद करेंगे।
यह बयान बेहद संवेदनशील राजनीतिक मुद्दे पर था। आमतौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति दूसरे देशों के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी करने से बचते हैं, लेकिन ट्रंप ने इस परंपरा को तोड़ा। उनके इस बयान ने स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड की आजादी की मांग को नई ताकत दे दी।
तीनों देशों की सत्ताधारी पार्टियां क्या चाहती हैं
स्कॉटलैंड की सत्ताधारी पार्टी एसएनपी यानी SNP (Scottish National Party) स्कॉटलैंड को स्वतंत्र देश बनाना चाहती है। वेल्स की सत्ताधारी पार्टी प्लाइड भी वेल्स को अलग देश बनाने और ज्यादा अधिकार पाने की मांग कर रही है।
उत्तरी आयरलैंड की सत्ताधारी पार्टी सिन फेन यूके से अलग होकर आयरलैंड के साथ जुड़ना चाहती है। यह पहला मौका है जब तीनों देशों में एक साथ ऐसी सरकारें हैं, जो ब्रिटेन से आजादी के पक्ष में हैं। साल 1970 के दशक से ही यह मांग उठती रही है, लेकिन इतना मजबूत मौका पहले कभी नहीं आया।
319 साल पुराना है यूनाइटेड किंगडम
यूनाइटेड किंगडम की स्थापना 319 साल पहले 1707 में हुई थी। तब किंगडम ऑफ स्कॉटलैंड और किंगडम ऑफ इंग्लैंड-वेल्स ने मिलकर एक संघ बनाया था। इसके 225 साल बाद आयरलैंड भी इसमें जुड़ गया। फिर 104 साल पहले आयरलैंड का एक बड़ा हिस्सा अलग हो गया था।
इसके बाद पिछले 104 सालों में यूनाइटेड किंगडम का नक्शा नहीं बदला, लेकिन अब हालात अलग हैं। यदि तीनों देश अलग हो गए, तो यूनाइटेड किंगडम सिर्फ इंग्लैंड तक सिमट जाएगा।
अलग होने पर कितना बचेगा ब्रिटेन
क्षेत्रफल के हिसाब से इंग्लैंड यूनाइटेड किंगडम का सबसे बड़ा हिस्सा है। यह करीब 53 प्रतिशत क्षेत्रफल रखता है, जहां 84 प्रतिशत आबादी रहती है। विभाजन होने पर यही हिस्सा इंग्लैंड के पास बचेगा। दुनिया के कुल क्षेत्रफल में अभी यूनाइटेड किंगडम की हिस्सेदारी 0.16 प्रतिशत है।
बंटवारे के बाद यह घटकर सिर्फ 0.09 प्रतिशत रह जाएगी। यह वही ब्रिटेन है, जिसने कभी करीब 100 देशों पर राज किया था। एक समय था जब कहा जाता था कि ब्रिटिश साम्राज्य में सूरज कभी अस्त नहीं होता। आज वही ब्रिटेन अपने घर को संभालने में मुश्किल महसूस कर रहा है।
बर्नहम और विपक्ष की प्रतिक्रिया
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम के प्रवक्ता ने विभाजन के खतरे को सीधे तौर पर खारिज किया है। प्रवक्ता का कहना है कि प्रधानमंत्री यूरोपीय संघ यानी EU (European Union) से जुड़े मसलों पर पूरा भरोसा रखते हैं। उनका ध्यान संवैधानिक बहस से ज्यादा जीवन यापन की बढ़ती लागत कम करने पर है।
वहीं कंजर्वेटिव पार्टी की स्कॉटिश शैडो सेक्रेटरी हैरियट क्रॉस ने इस बैठक को अलगाववादी शिखर सम्मेलन बताया। उन्होंने इसे सिर्फ दिखावटी फोटो सेशन करार दिया। इससे साफ है कि ब्रिटेन की मौजूदा सरकार अभी इस मुद्दे को गंभीरता से लेने से बच रही है।
50 साल पुरानी भविष्यवाणी सच होती दिख रही
साल 1977 में स्कॉटिश दार्शनिक टॉम नायरन ने एक बड़ी भविष्यवाणी की थी। उन्होंने अपनी किताब द ब्रेकअप ऑफ ब्रिटेन में लिखा था कि यह साम्राज्य एक दिन बिखर जाएगा। नायरन ने कहा था कि इंग्लैंड की असमान आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था के कारण बाकी देश खुद को अलग कर लेंगे।
आज करीब पांच दशक बाद यह भविष्यवाणी सच होती दिख रही है। स्कॉटलैंड के फर्स्ट मिनिस्टर जॉन स्विनी ने भी बड़ा बयान दिया है। उनका कहना है कि मौजूदा प्रधानमंत्री यूनाइटेड किंगडम के आखिरी प्रधानमंत्री साबित हो सकते हैं।
यह खबर क्यों जरूरी है
यह खबर वैश्विक राजनीति और इतिहास के नजरिए से भारत के लिए भी अहम है। जिस ब्रिटेन ने भारत का विभाजन किया, उसका अपना अनुभव अब उलट दिशा में जा रहा है। यह घटना लोकतंत्र, आत्मनिर्णय के अधिकार और औपनिवेशिक इतिहास को समझने में मदद करती है। किसी भी देश की जनता को अपना भविष्य खुद तय करने का अधिकार लोकतांत्रिक मूल्यों का हिस्सा है।
यह खबर अंतरराष्ट्रीय राजनीति, कूटनीति और वैश्विक शक्ति संतुलन पर भी असर डाल सकती है। भारतीय पाठकों के लिए यह इतिहास और वर्तमान भूराजनीति को जोड़कर समझने का अच्छा मौका है। इसलिए यह विषय शिक्षा और जागरूकता दोनों नजरिए से महत्वपूर्ण है।
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