मोना-मसूद की जोड़ी से यूपी कांग्रेस का रीसेट, ब्राह्मण-मुस्लिम-OBC-दलित समीकरण साधने की कोशिश
Arohi Raj | Sootr Creatives | Oct 05, 2026, 13:02 IST
कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में प्रदेश संगठन की नई टीम घोषित की है। बता दें आराधना मिश्रा 'मोना' नई प्रदेश अध्यक्ष बनाई गई हैं। वहीं,सांसद इमरान मसूद कार्यकारी अध्यक्ष बने हैं।
यूपी कांग्रेस ने 2027 चुनाव से पहले प्रदेश टीम बदल दी है। बता दें पार्टी ने आराधना मिश्रा को अध्यक्ष बनाया है। इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है। नई टीम में ब्राह्मण, मुस्लिम, ओबीसी और दलित समीकरण साधा गया है। 2022 में कांग्रेस को 403 में से दो सीटें मिली थीं।यह बदलाव महज नए चेहरों तक सीमित नहीं है। इसके पीछे 2027 चुनाव की रणनीति दिखाई देती है।
यह आपसे क्यों जुड़ा है?
पहले क्या था
आराधना मिश्रा ही क्यों?
उन्हें कांग्रेस के प्रमुख ब्राह्मण चेहरों में गिना जाता है। इसलिए उनकी नियुक्ति को ब्राह्मण समुदाय तक पहुंच की कोशिश बताया जा रहा है। हिंदुस्तान टाइम्स ने भी इसे इसी नजर से देखा है। एक और बात है। वे पूर्वी उत्तर प्रदेश से हैं और उनके पास विधानसभा और संगठन, दोनों का अनुभव है।
प्रियंका गांधी वाड्रा से भी उनका पुराना राजनीतिक रिश्ता है। 2022 से पहले वे लड़की हूं, लड़ सकती हूं अभियान में प्रियंका के साथ सक्रिय दिखी थीं।
इमरान मसूद की भूमिका
अब नक्शा देखिए। एक तरफ पूरब की ब्राह्मण नेता, दूसरी तरफ पश्चिम का मुस्लिम चेहरा। इसी वजह से इसे ब्राह्मण-मुस्लिम समीकरण कहा जा रहा है। सीधे बात करें तो यह जोड़ी जाति, धर्म और इलाके, तीनों का संतुलन दिखाती है।
लेकिन असल बात यह है कि पूरी कहानी इतनी ही नहीं है। नई टीम के चार नाम चार अलग संदेश देते हैं। आराधना मिश्रा ब्राह्मण और महिला नेतृत्व का चेहरा हैं। वहीं, इमरान मसूद मुस्लिम प्रतिनिधित्व और पश्चिमी यूपी का। देवेंद्र निषाद को OBC और आलोक प्रसाद को दलित प्रतिनिधित्व से जोड़ा गया है। दोनों वरिष्ठ उपाध्यक्ष हैं।
इसे ऐसे समझिए। जैसे थाली में सिर्फ दाल या सिर्फ सब्जी नहीं परोसी जाती है। वैसे ही कांग्रेस ने एक थाली सजाई है, जिसमें हर स्वाद का थोड़ा हिस्सा है। अब देखना यह है कि मेहमान खाते हैं या नहीं।
इसी वजह से इस फेरबदल की तुलना समाजवादी पार्टी (सपा) के PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फॉर्मूले से भी हो रही है। इंडियन एक्सप्रेस ने भी इस सामाजिक संतुलन को खास तौर पर रेखांकित किया है।
कौन-कौन शामिल है
दूसरी तरफ सपा है। दोनों दल इंडी गठबंधन का हिस्सा हैं। 2027 के लिए सीटों और तालमेल पर आगे बातचीत होनी है।
दोनों पक्षों की बात
वहीं, दूसरा पक्ष सावधान करता है। किसी समुदाय के नेता को पद मिलना एक बात है। उस समुदाय का वोट मिलना बिल्कुल दूसरी बात है। बीच में स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवार और दूसरे दलों की रणनीति आ जाती है। इसलिए इसे सीधे वोटों में बदलने का दावा जल्दबाजी होगी।
अगर संगठन जिला, ब्लॉक और बूथ तक खड़ा नहीं हुआ, तो नई टीम का क्या फायदा? प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति का असर तभी दिखेगा, जब वह नीचे तक पहुंचेंगे। आने वाले महीनों में कांग्रेस की यही सबसे बड़ी परीक्षा होगी।
2027 चुनाव में साफ होगी तस्वीर
सपा के साथ सीट बंटवारे का कोई अंतिम फॉर्मूला अभी सामने नहीं आया है। इसलिए नई नियुक्तियों को सीधे सीट शेयरिंग से जोड़ना फिलहाल अनुमान ही होगा। खुले सवाल कई हैं। क्या यह टीम सपा के साथ मोलभाव में कांग्रेस को मजबूत करेगी? क्या ब्राह्मण और मुस्लिम मतदाता एक साथ इस पर भरोसा करेंगे? इन सवालों के जवाब अभी किसी के पास नहीं हैं।
एक बात जो आप नहीं जानते थे
- अब आप क्या करें: अगले कुछ महीनों में कांग्रेस की जिला और बूथ स्तर की नियुक्तियों पर नजर रखिए।
- क्यों अभी: चेहरे घोषित हो चुके हैं, अब संगठन खड़ा होने की असली परीक्षा शुरू हुई है।
- आगे देखें: कांग्रेस और सपा के बीच सीट बंटवारे की बातचीत और उसका अंतिम फॉर्मूला।
यह खबर क्यों जरूरी है
FAQs
- कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में नई प्रदेश टीम के तहत कौन-कौन सी महत्वपूर्ण नियुक्तियाँ की हैं?
कांग्रेस ने आराधना मिश्रा उर्फ मोना को प्रदेश अध्यक्ष और इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है। देवेंद्र निषाद और आलोक प्रसाद को भी वरिष्ठ उपाध्यक्ष की जिम्मेदारियाँ दी गई हैं। - आराधना मिश्रा की राजनीतिक पृष्ठभूमि क्या है?
आराधना मिश्रा प्रतापगढ़ की रामपुर खास सीट से तीन बार की विधायक हैं और राज्यसभा सांसद प्रमोद तिवारी की बेटी हैं। उन्हें कांग्रेस के प्रमुख ब्राह्मण चेहरों में गिना जाता है। - क्या कांग्रेस की नई टीम का सामाजिक संतुलन मतदाताओं पर प्रभाव डालेगा?
नई टीम में आराधना मिश्रा और इमरान मसूद जैसे नेता शामिल हैं, जो ब्राह्मण और मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिससे सामाजिक संतुलन बनाने का प्रयास किया गया है। हालाँकि, इस संतुलन का वास्तविक वोटिंग में तब्दील होना स्थानीय मुद्दों और चुनावी रणनीतियों पर निर्भर करेगा।
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