तीन दशक तक क्यों अटका रहा महिला आरक्षण? पढ़िए देवेगौड़ा-वाजपेयी और मनमोहन सरकार की कहानी
भारतीय राजनीति में महिलाओं की बराबरी की भागीदारी का सवाल कोई नया नहीं है। यह संघर्ष करीब तीन दशकों से लगातार जारी रहा है। कई सरकारें आईं, कई बार संसद में विधेयक आए। जोरदार बहस हुई। विरोध हुआ। हंगामा हुआ, लेकिन हर बार यह मुद्दा किसी न किसी वजह से अटकता चला गया।
फिर साल 2023 में नरेंद्र मोदी सरकार नारी शक्ति वंदन अधिनियम लाई थी। इसके बाद अब इसे जमीन पर उतारने की दिशा में सरकार कदम बढ़ा रही है। 16 अप्रैल को इस अहम मुद्दे पर उच्चस्तरीय बैठक प्रस्तावित है, जिसमें महिला आरक्षण को लागू करने से जुड़े पहलुओं पर विस्तार से चर्चा होगी। इसके बाद इसे लागू कराने के लिए विशेष सत्र बुलाने की तैयारी भी की जा रही है।
साफ संकेत हैं कि सरकार अब इस कानून को कागज से निकालकर हकीकत में बदलने की दिशा में आगे बढ़ रही है। बीजेपी ने केंद्र सरकार की इस कवायद को भुनाने की पूरी तैयारी कर ली है। पूरे देश में बीजेपी शासित राज्यों में इसके लिए माहौल बनाया जा रहा है।
पढ़िए द सूत्र की यह खास खबर...
30 साल का संघर्ष: संसद में बार-बार अटका महिला आरक्षण
भारतीय राजनीति में महिला आरक्षण का मुद्दा तीन दशकों से सत्ता, सहमति और सामाजिक सोच के टकराव की कहानी बना हुआ है। 1990 के दशक में जब यह सवाल पहली बार गंभीरता से उठा कि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की हिस्सेदारी सुनिश्चित की जाए, तब से लेकर वर्ष 2023 तक यह विषय हर सरकार के सामने एक चुनौती बनकर खड़ा रहा। हर बार उम्मीद जगी, हर बार बहस हुई, लेकिन हर बार राजनीति की खींचतान ने इसे रोक दिया।
1. पहली बार: एच. डी. देवेगौड़ा सरकार (1996)
12 सितंबर 1996 को महिला आरक्षण विधेयक पहली बार लोकसभा में पेश हुआ था। इसे 81वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में लाया गया। यह वह समय था, जब देश गठबंधन राजनीति के दौर में प्रवेश कर चुका था और हर बड़े फैसले के लिए व्यापक सहमति जरूरी हो गई थी।
जैसे ही यह विधेयक सदन में आया, वैसे ही इसका विरोध भी तेज हो गया। कई दलों ने इसे सामाजिक संतुलन के नजरिए से अधूरा बताया तो कुछ ने इसमें पिछड़े वर्गों के लिए अलग कोटे की मांग उठाई। स्थिति इतनी जटिल हो गई कि सरकार को इसे संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजना पड़ा।
यहीं से साफ हो गया कि यह मुद्दा महिला सशक्तिकरण का नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक समीकरणों का हिस्सा बन चुका है। यह वह बिंदु था, जहाँ से महिला आरक्षण की लंबी और उलझी हुई यात्रा शुरू हुई।
2. दूसरी बार: अटल बिहारी वाजपेयी सरकार (1998–2003)
1998 से 2003 के बीच का दौर महिला आरक्षण के लिए सबसे ज्यादा राजनीतिक हलचल वाला रहा। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने कई बार इस विधेयक को आगे बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन हर बार यह सियासी असहमति की भेंट चढ़ गया।
- 1998: 12वीं लोकसभा में इसे 84वें संशोधन विधेयक के रूप में पेश किया गया, लेकिन राजनीतिक अस्थिरता के कारण सदन भंग हो गया और विधेयक स्वतः निरस्त हो गया।
- 1999: 13वीं लोकसभा में इसे फिर पेश किया गया। बहस भी हुई, लेकिन सर्वसम्मति नहीं बन सकी।
- 2002 और 2003: सरकार ने एक बार फिर प्रयास किए, लेकिन हर बार विरोध और हंगामे ने रास्ता रोक दिया।
इस दौर में संसद के भीतर कई बार तीखी नोकझोंक और हंगामे की स्थिति बनी। कुछ सांसदों ने विधेयक की प्रतियां तक फाड़ दीं। यह साफ संकेत था कि मुद्दा जितना महत्वपूर्ण था, उतना ही विवादास्पद भी हो चुका था। राजनीतिक दलों के बीच यह सहमति नहीं बन पा रही थी कि आरक्षण का स्वरूप कैसा हो, किन वर्गों को कितना हिस्सा मिले और क्या इसमें अन्य सामाजिक समीकरणों को भी शामिल किया जाए। परिणाम यह हुआ कि बार-बार कोशिशों के बावजूद विधेयक आगे नहीं बढ़ सका।
3. तीसरी बार: मनमोहन सिंह सरकार (2008–2010)
यूपीए सरकार के दौर में महिला आरक्षण को लेकर ठोस प्रगति देखने को मिली। मनमोहन सिंह के नेतृत्व में सरकार ने रणनीति बदली और विधेयक को राज्यसभा में पेश किया। मई 2008 में 108वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में इसे राज्यसभा में पेश किया गया। इस कदम के पीछे सोच यह थी कि राज्यसभा एक स्थायी सदन है, इसलिए लोकसभा भंग होने पर भी विधेयक समाप्त नहीं होगा।
इसके बाद 9 मार्च 2010 को राज्यसभा ने ऐतिहासिक मतदान के बाद इस विधेयक को पारित कर दिया। यह महिला आरक्षण के इतिहास का सबसे बड़ा क्षण था। ऐसा पहली बार हुआ जब यह विधेयक संसद के किसी सदन से पास हुआ, लेकिन इसके बाद भी रास्ता आसान नहीं हुआ। लोकसभा में इसे पेश करने से पहले ही राजनीतिक माहौल बिगड़ गया।
कई दलों का विरोध जारी रहा और सरकार को पर्याप्त समर्थन नहीं मिल सका। आखिरकार यह विधेयक लोकसभा में पेश ही नहीं हो पाया। जब 2014 में लोकसभा भंग हुई, तो यह विधेयक एक बार फिर लैप्स हो गया। यह वह मोड़ था, जहां उम्मीदें सबसे ज्यादा थीं, लेकिन परिणाम फिर अधूरा रह गया।
4. आखिरकार मंजिल: नरेंद्र मोदी सरकार (2023)
करीब 27 साल तक चली राजनीतिक खींचतान, बहस और असहमति के बाद 2023 में महिला आरक्षण विधेयक को उसका मुकाम मिला। नरेंद्र मोदी सरकार ने इसे नए संसद भवन में विशेष सत्र के दौरान पेश किया, जो अपने आप में एक प्रतीकात्मक और ऐतिहासिक कदम था।
- 19 सितंबर 2023: 128वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में पेश।
- 20 सितंबर 2023: लोकसभा में भारी बहुमत (454 पक्ष में, 2 विरोध में) से पारित।
- 21 सितंबर 2023: राज्यसभा ने सर्वसम्मति से मंजूरी दी।
- 29 सितंबर 2023: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हस्ताक्षर के बाद यह 106वां संविधान संशोधन अधिनियम बन गया।
इस बार जो सबसे बड़ा अंतर दिखा, वह था व्यापक राजनीतिक समर्थन। जिन मुद्दों पर पहले सहमति नहीं बन पाती थी, वे इस बार बड़े स्तर पर सुलझते नजर आए। यह एक विधेयक के पारित होने की घटना नहीं थी, बल्कि यह उस लंबी राजनीतिक यात्रा का अंत था, जो 1996 में शुरू हुई थी।
आजादी से अब तक: संसद में महिलाओं की भागीदारी की सच्चाई
भारत की संसद में महिलाओं की मौजूदगी धीरे-धीरे बढ़ी जरूर है, लेकिन यह अब भी संतोषजनक नहीं मानी जाती।
शुरुआती तस्वीर
- 1952 (पहली लोकसभा): 489 सीटों में केवल 22 महिलाएं (4.5%)
- दूसरे और तीसरे कार्यकाल में यह संख्या मामूली बढ़कर 27 और 34 हुई।
प्रमुख आंकड़े
- 1971 (पांचवीं लोकसभा): 22 महिलाएं (4.2%)
- 1989 (नौवीं): 27 महिलाएं (5.2%)
- 1999 (तेरहवीं): 49 महिलाएं (9.1%)
- 2009 (पंद्रहवीं): 59 महिलाएं (10.9%)
- 2019 (सत्रहवीं): 78 महिलाएं (14.4%) – अब तक का सर्वोच्च
- 2024 (अठारहवीं): 74 महिलाएं (13.6%)
सबसे कमजोर दौर
- 1977 (छठी लोकसभा): केवल 19 महिलाएं (3.5%)
बड़ी हकीकत
आखिर क्यों पीछे रहीं महिलाएं?
1952 से 2004 तक महिलाओं का प्रतिनिधित्व कभी 10% के पार नहीं गया। यानी आधी आबादी, लेकिन संसद में हिस्सेदारी बेहद सीमित रही। इतने वर्षों में महिला प्रतिनिधित्व कम रहने के पीछे कई वजहें सामने आती हैं। इनमें सबसे अहम है राजनीतिक दलों की अनिच्छा। पार्टियां महिलाओं को कम टिकट देती हैं।
दूसरा, सामाजिक सोच भी एक बड़ी वजह है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था और रूढ़िवादिता के चलते महिलाओं को वह स्थान नहीं मिला, जिसकी वे हकदार हैं। तीसरी, आर्थिक बाधाएं भी सामने आती हैं। ये सभी कारण मिलकर महिलाओं के लिए राजनीति का रास्ता कठिन बनाते रहे हैं।
अब क्या बदलेगा नारी शक्ति वंदन अधिनियम?
यह अधिनियम महिलाओं की राजनीतिक हिस्सेदारी को सीधे 33% तक पहुंचाने का रास्ता खोलता है।
- लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में 33% आरक्षण मिलेगा।
- अनुसूचित जाति/जनजाति (SC/ST) महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों में अलग हिस्सा होगा।
लागू कब होगा?
यह कानून तुरंत लागू नहीं होगा। इसके लिए दो प्रक्रियाएं जरूरी हैं:
- नई जनगणना
- परिसीमन (Delimitation)
इसी वजह से अनुमान है कि यह व्यवस्था 2029 के लोकसभा चुनाव या उसके बाद लागू हो सकती है।
कितनी बदलेगी तस्वीर?
लागू होने के बाद लोकसभा में महिलाओं की संख्या करीब 181 (33%) तक पहुंच सकती है। यह बदलाव संसद की कार्यशैली और नीति निर्माण दोनों को प्रभावित करेगा।
वैधता: शुरुआत में यह आरक्षण 15 साल के लिए लागू रहेगा। संसद चाहे तो इसे आगे बढ़ा सकती है।
ये खबर भी पढ़िए...
एमपी में परिसीमन अटका तो महिला आरक्षण भी अधर में! पुराने ढांचे पर चुनाव की तैयारी
33 फीसदी महिला आरक्षण के बाद MP, CG और राजस्थान कितना फायदा, जानिए परिसीमन का पूरा गणित
महिला आरक्षण लागू करने लोकसभा में हो सकती हैं 816 सीटें, 2029 चुनाव से लागू करने की तैयारी
दफ्तर में महिला सहकर्मी को घूरने वाले आरोपी को क्लीन चिट, बॉम्बे हाईकोर्ट रद्द की FIR